दुमका : मसानजोर डैम के विस्थापितों को उसका हक दिलाने को लेकर कुमड़ाबाद-बाजार रहमतगंज का एक शख्स अपनी कानूनी लड़ाई पिछले आठ साल से जारी रखे हुए है, पर कानूनी दांव-पेच उसे अब तक सफल होने नही दे रही है. हालांकि आठ साल की उसकी लंबी लड़ाई ने यह जरूर साबित कर दिया है कि पश्चिम बंगाल की सरकार हो, या फिर तत्कालीन बिहार सरकार, या फिर झारखंड सरकार. पर सब की नीति विस्थापितों के हक-हकूक को लेकर उपेक्षापूर्ण ही बनी हुई है.
कुमड़ाबाद-बाजार रहमतगंज के अभिजीत दास ने 2010-11 में तीनों राज्यों वे सूचनाधिकार के तहत मसानजोर डैम के एकरारनामा की कॉपी प्राप्त करने की गुहार लगा चुके हैं. झारखंड सरकार ने दो टूक उन्हें जवाब दे दिया है कि मसानजोर डैम से जुड़े दस्तावेज या एकरारनामा की प्रति झारखंड राज्य के कार्यालयों में उपलब्ध नही है. अलबत्ता इसके लिए बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग से उन्हें सूचना मांगने की नसीहत जरुर दे दी गयी.
झारखंड-बिहार के पास…
बिहार ने भी झाड़ा पल्ला
बिहार से जब उन्होंने 1950-51 में डैम से जुड़े एकरारनामा की प्रति सूचनाधिकार में मांगी, तो उन्हें 1978 में तत्कालीन बिहार व पश्चिम बंगाल सरकार के बीच हुए एकरानामे की प्रति उपलब्ध करा दी गयी. अभिजीत झारखंड की तरह बिहार में भी अपीलीय प्राधिकार तक की लड़ाई लड़ी. वहां भी राज्य सूचना आयोग का कई दफा चक्कर काटा. अंत में उन्हें यही लिखकर दे दिया गया कि एकरारनामा की प्रति केंद्रीय अभिलेखागार से प्राप्त करने का प्रयास किया गया, परंतु वहां से भी उसकी प्रति नहीं मिल पायी. डैम का डीपीआर झारखंड को भेजा गया है, लेकिन डीपीआर के साथ एकरारनामा की प्रति संलग्न नहीं थी. इस डैम के बाबत कितना जमीन भू अर्जन हुआ था, उसके संदर्भ में भी यही कह दिया गया कि भू अर्जन जिला भू अर्जन कार्यालय से होता है, इसलिए जो झारखंड में स्थानीय कार्यालय है, वहीं उसका अभिलेख संधारित होगा.
बंगाल सरकार ने नहीं दी जानकारी
वहीं पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के विशेष भू अर्जन पदाधिकारी ने अभिजीत दास द्वारा सूचनाधिकार के तहत मांगी गयी सूचना के अनुरुप डैम के एकरारनामा की प्रति को यह कहकर देने से इंकार कर दिया कि सूचनाधिकार का कानून 8(3) यह कहता है कि मांगी गयी जानकारी अगर बीस साल से अधिक पुरानी है, तो वह नहीं दी जा सकती. मसानजोर डैम का यह मामला तब पचास साल से अधिक पुराना हो चुका था. अभिजीत मामले को केंद्रीय सूचना आयोग तक ले जा चुके हैं और अब वे इस मामले में उच्च न्यायालय की शरण में जाने का मन बना रहे हैं.
मसानजोर डैम को लेकर लंबी लड़ाई जारी रखे हुए हैं कुमड़ाबाद के अभिजीत दास
झारखंड सरकार ने कहा: राज्य के संबंधित कार्यालयों में नहीं है एकरारनामा की प्रति
बिहार ने कहा: केंद्रीय अभिलेखागार से प्राप्त करने की हुई कोशिश, पर नहीं मिली प्रति
पश्चिम बंगाल ने कहा: नहीं दे सकते जानकारी, मांगी गयी सूचना 20 साल से अधिक पुरानी
कोई तो बताये कि एकरारनामा की शर्तों का हुआ पालन : अभिजीत
अभिजीत का कहना है कि वे खुद विस्थापित है. ऐसे गांव से विस्थापित हैं, जहां दुमका का पुराना शहर बसा करता था. डैम ने उनका सबकुछ उजाड़ दिया. गांव के लोगों की खेती-बाड़ी चली गयी. खेत का जो मुआवजा मिला, वह बीस साल का गिनकर दिया गया. सूचनाधिकार के तहत जो वे लड़ाई लड़ रहे हैं, ताकि पता तो चले कि आखिर एकरारनामा क्या था. जो उन्होंने सुना है कि बिजली-पानी सबका लाभ विस्थापितों को मिलना था. कुछ लाभ नहीं मिल रहा. आज मयुराक्षी विस्थापित दंश झेल रहे हैं. गांव से दर्जनों पढ़े-लिखे युवक शहर में जाकर दूसरे के दुकानों में दिहाड़ी मजदूरी करते हैं. लौटते हैं तो घर में चूल्हा जलता है.
नेताजी से जुड़ीं सूचनाएं की गयी सार्वजनिक, तो मसानजोर का एकरारनामा क्यों नहीं ?
मसानजोर डैम के एकरारनामा की सूचना देने से इंकार किये जाने पर अभिजीत दास ने आश्यर्च जताया है कि जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़ीं 1945 की सूचनाएं सार्वजनिक की गयी, तो मसानजोर डैम से संबंधित एकरारनामा को सूचनाधिकार के तहत क्यों नहीं दी जा सकती. सिउड़ी वीरभूम के विशेष भू अर्जन पदाधिकारी द्वारा यह कहकर सूचना देने से इंकार कर दिया गया था कि आरटीआई की धारा 8(3) यह कहता है कि 20 साल से अधिक पुरानी सूचनाएं नहीं दी जा सकती.