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कभी व्यक्तिगत कार्य में एके राय नहीं करते थे विश्वास

Updated at : 15 Jun 2024 1:34 AM (IST)
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कभी व्यक्तिगत कार्य में एके राय नहीं करते थे विश्वास

जयंती पर विशेष : विचारधारा अलग थी, पर मुझे अनुज की तरह मानते थे राय दा

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पशुपति नाथ सिंह,

दिग्गज वाम नेता एके राय साहब से मेरी राजनीतिक विचारधारा भले ही अलग थी, लेकिन व्यक्तिगत संबंध हमेशा बहुत अच्छे रहे. राय साहब हमेशा मुझे छोटे भाई की तरह मानते थे. जहां भी मिलते थे, तो अनुज कह कर ही बुलाते थे. वह पूर्णरुपेण एक राजनेता थे. कभी भी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया. एके राय साहब से मेरी पहली मुलाकात वर्ष 1967 में पटना में हुई थी. विधानसभा देखने की ललक से मैं वहां गया था. पता चला कि अंदर जाने के लिए किसी विधायक की अनुशंसा जरूरी है. अचानक किसी ने बताया कि सामने से आ रहे व्यक्ति सिंदरी के विधायक हैं. यह जान कर उनके पास जा कर बताया कि मैं धनबाद से आया हूं. विधानसभा देखना चाहता हूं. यह सुन कर बिना किसी पूछताछ के उन्होंने मेरे पास के आवेदन पर हस्ताक्षर कर दिया. राजनीति में आने के बाद 1977 के लोकसभा चुनाव में मैंने एके राय के लिए प्रचार किया था. एक दिन उनके घर गया, तो देखा कि घर के अंदर कार्ल मार्क्स, बुद्ध व महात्मा गांधी की मूर्ति रखी हुई है. वहां मौजूद जय प्रकाश नारायण ने बताया कि राय साहब मार्क्स से शुरुआत करते हैं और गांधी के रास्ते पर चल कर अंत करते हैं. वह लड़ाकू व्यक्ति थे. कभी किसी के बच्चे के एडमिशन, नौकरी की पैरवी नहीं करते थे. सामूहिक विकास के काम पर विश्वास करते थे. गरीबों के हितैषी थे. गरीबों के लिए खूब काम करते थे.

तमाम प्रयासों के बावजूद नहीं गये जमसं कार्यालय :

वर्ष 1989 के लोकसभा चुनाव के दौरान जनता दल ने एके राय को समर्थन किया था. उस वक्त झरिया के विधायक सूर्यदेव सिंह भी जनता दल में ही थे. चिन्मय मुखर्जी, एसके बक्शी सहित कई नेताओं ने राय साहब से कहा कि सूर्यदेव सिंह के कार्यालय में चलें. तीन दिन तक धनसार स्थित मेरे आवास पर बैठक हुई, लेकिन राय दा ने कहा कि वे कतरास मोड़ स्थित जमसं कार्यालय नहीं जायेंगे.

धर्म विरोधी नहीं थे, छठ पूजा में भी होते थे शामिल :

यह धारणा थी कि एके राय धर्म विरोधी थे, पर वास्तव में ऐसा नहीं था. हर वर्ष पुराना बाजार में छठ पूजा में शामिल होते थे. छठ पूजा के पक्ष में भाषण भी देते थे. मैं भी उनके साथ रहता था. जयप्रकाश नारायण की जयंती व पुण्यतिथि पर कई बार साथ में कार्यक्रम में शामिल होते थे. हमेशा मुझे अनुज ही कह कर बुलाते थे.

लेखक धनबाद के पूर्व सांसद हैंB

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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