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गिरिडीह विधान सभा : 1990 के बाद जीत से वंचित रही कांग्रेस, एक वक्त था दबदबा

Updated at : 19 Nov 2019 9:52 AM (IST)
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गिरिडीह विधान सभा : 1990 के बाद जीत से वंचित रही कांग्रेस, एक वक्त था दबदबा

सूरज/अमरनाथ 1990 के चुनाव में कांग्रेस से ज्योतिंद्र प्रसाद ने हासिल की थी जीत गिरिडीह : गिरिडीह विधान सभा क्षेत्र में वर्ष 1990 के विधान सभा चुनाव के बाद कांग्रेस जीत से वंचित रही. एक वक्त था जब कांग्रेस का यहां दबदबा था. गिरिडीह लोकसभा चुनाव से लेकर गिरिडीह विस चुनाव तक में कांग्रेस प्रत्याशी […]

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सूरज/अमरनाथ

1990 के चुनाव में कांग्रेस से ज्योतिंद्र प्रसाद ने हासिल की थी जीत
गिरिडीह : गिरिडीह विधान सभा क्षेत्र में वर्ष 1990 के विधान सभा चुनाव के बाद कांग्रेस जीत से वंचित रही. एक वक्त था जब कांग्रेस का यहां दबदबा था. गिरिडीह लोकसभा चुनाव से लेकर गिरिडीह विस चुनाव तक में कांग्रेस प्रत्याशी ही जीतते थे. हालांकि बदलते राजनीतिक हालात और गठबंधन की राजनीति ने गिरिडीह विस क्षेत्र में कांग्रेस पर खासा प्रभाव डाला है. शुरुआती दौर में वर्ष 1952 में सर्वप्रथम केबी सहाय ने कांग्रेस की टिकट से जीत हासिल की थी.

गठबंधन की भेंट चढ़ी उम्मीदवारी : पहले विस चुनाव के बाद 1962 में कांग्रेस के टिकट से रघुनंदन राम व 1967 में कांग्रेस से आर राम ने जीत दर्ज की. इसके बाद वर्ष 1981 के उप चुनाव में उर्मिला देवी कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़ी और जीती. वर्ष 1990 के चुनाव में कांग्रेस से ज्योतिंद्र प्रसाद चुनाव ने भी जीत हासिल की. इसके बाद ज्योतिंद्र प्रसाद पुन: 1995 में चुनाव लड़े, पर भाजपा के चंद्रमोहन प्रसाद से हार गये. बाद के चुनावों में गठबंधन के तहत सहयोगी दलों के खाते में यह सीट जाती रही. कभी झामुमो तो कभी झाविमो के साथ कांग्रेस का गठबंधन हुआ. फलत: गिरिडीह विस क्षेत्र से कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार नहीं दिया. ऐसे में कांग्रेस कार्यकर्ता सहयोगी दलों के लिए कार्य करते रहे. इस दौरान गिरिडीह सीट से झामुमो व झाविमो और बाद में भाजपा प्रत्याशियों की जीत हुई. हालांकि वर्ष 2014 के चुनाव में कांग्रेस ने रूमा सिंह को उम्मीदवार तो बनाया, लेकिन वह जमानत भी नहीं बचा पायी.

शिफ्ट होते रहे सदस्य : बदलते राजनीतिक हालात में गठबंधन व भीतरघात की वजह से गिरिडीह विस क्षेत्र में कांग्रेस सिमटती चली गयी. साथ ही वोट प्रतिशत में भी कमी आती गयी. गठबंधन की वजह से कांग्रेस के कार्यकर्ता झामुमो और झाविमो की ओर शिफ्ट होते चले गये. वर्ष 2005 के विस चुनाव में झामुमो के टिकट से मुन्ना लाल ने जीत हासिल की. 2009 के चुनाव में झाविमो के टिकट से निर्भय कुमार शाहाबादी चुनावी दंगल में उतरे और जीत का परचम लहराया.
सीपीआइ से सीधी टक्कर
1952 से 1984 के दौरान यहां कांग्रेस का वर्चस्व था और सीपीआइ से सीधी टक्कर होती थी. शहर से ग्रामीण इलाकों तक पार्टी का फैलाव था. इसी क्रम में भाजपा भी संगठन का विस्तार कर रही थी. चुनाव के दौरान कई बार झंडा लगाने के सवाल पर इन दलों के कार्यकर्ताओं के बीच तनातानी होती थी.
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