झारखंड की सांस्कृतिक विरासत को संजोती ‘बैद्यनाथ पेंटिंग’, बाबा धाम से जुड़े हैं इस अनोखी कला के तार

Author Rupali das
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Baidyanath Painting: बाबा नगरी की प्रसिद्ध “बैद्यनाथ पेंटिंग” झारखंड की सांस्कृतिक विरासत और धरोहर को संजोती अनोखी कला है. इसके जनक प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट और चित्रकार नरेंद्र पंजियारा हैं. इस कला में पौराणिक कथाओं और आस्था के रंगों को समेटा जाता है.

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Baidyanath Painting: झारखंड के देवघर जिले को बाबा नगरी के नाम से जाना जाता है. यहां स्थित भगवान शिव का पवित्र धाम, बैद्यनाथ धाम विश्व विख्यात है. इसी बाबा नगरी की लोककथाओं को जीवंत करती संताल परगना की एक आकर्षक कला है, बैद्यनाथ चित्रकला. जो झारखंड की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर है. इस अनूठी कला के जनक हैं, झारखंड के प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट और चित्रकार नरेंद्र पंजियारा, जिन्होंने अपनी कला में पौराणिक कथाओं और आस्था के रंगों में समेटा है. इस लेख में आप बैद्यनाथ कथा से जुड़े रोचक और अनसुने किस्सों के बारे में जानेंगे.

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बैद्यनाथ नाम के पीछे क्या है राज

बैद्यनाथ पेंटिंग

झारखंड में बैद्यनाथ चित्रकला का तेजी से विकास हो रहा है. इस चित्रकला (पेंटिंग) का केंद्र झारखंड का सांस्कृतिक शहर देवघर है, जो बाबा नगरी के नाम से प्रसिद्ध है. यहां स्थित विश्व विख्यात बाबा बैद्यनाथ धाम के नाम पर ही इस पेंटिंग का नाम बैद्यनाथ चित्रकला पड़ा. कहते हैं, इस चित्रकला शैली का नामकरण ‘बैद्यनाथ पेंटिंग’ करने का आधार- इसका सृजन स्थल, संदर्भ, विषय और इसके प्रतीकों का सांस्कृतिक-शास्त्रीय मूल्य है. यह पेंटिंग झारखंड से बाहर भी राज्य की पहचान और संस्कृति को जीवंत रखने का साधन है.

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कालीघाट पेंटिंग से है एक समानता

ऐसा माना जाता है कि बैद्यनाथ पेंटिंग और प्रसिद्ध कालीघाट पेंटिंग में एक समानता है. इन दोनों ही पेंटिंग का उद्भव प्राचीन देव मंदिरों को केंद्र में रख कर हुआ है. हालांकि, दोनों ही पेंटिंग की चित्रांकन शैली, मूल विषय, रंग-संयोजन और प्रतीक अलग है. बैद्यनाथ पेंटिंग पटचित्र (स्क्रॉल पेंटिंग) नहीं है. इसका स्वरूप मौलिक है.

क्या है बैद्यनाथ पेंटिंग का विषय

बैद्यनाथ चित्रकला में बाबा मंदिर का जिक्र

बता दें कि बैद्यनाथ पेंटिंग के विषय द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक बाबा बैद्यनाथ मंदिर, वहां की पूजा पद्धति, शास्त्रीय एवं लोकथाएं व मान्यताएं, मंदिर से जुड़े धार्मिक-तांत्रिक कर्मकांड एवं गतिविधियां और मंदिर में संपन्न होने वाले संस्कारों पर केंद्रित हैं. बैद्यनाथ चित्रकला में इन विषयों को अलग-अलग कागज और कैनवास पर विशिष्ट शैली में उकेरा जाता है. इस पेंटिंग की पूरी श्रृंखला 108 चित्रों की होती है. इसमें बाबा मंदिर, बड़ा घंट (घंटा), शिव बारात, ढोल-बजना, कांवर यात्रा, बाबा-शृंगार (पूजन), रुद्राभिषेक, जलार्पण, गठबंधन (शिव और पार्वती के मंदिरों के शीर्ष के बीच), बिल्लव-पत्र प्रदर्शनी, चूड़ाकरण, उपनयन, विवाह, पंजी-प्रथा आदि चित्रित किये गये हैं.

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दो श्रेणी में बांटे गये हैं पेंटिंग के विषय

बैद्यनाथ चित्रकला- झारखंड की लोककथाओं को सहेजती है

बताया गया कि बैद्यनाथ चित्रकला की शैली को विषय के आधार पर दो श्रेणियों में बांटा गया है. इनमें से एक, देवघर-मंदिर और वहां के प्रतीकात्मक अवयव पर केंद्रित पेंटिंग है. जबकि दूसरी इनसे जुड़ी अन्य प्रक्रियात्मक गतिविधियों की विशिष्ट रैखिक अभिव्यक्ति है. दूसरी श्रेणी की पेंटिंग में शहर के सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभावों को देखा जा सकता है. इनमें देवघर सहित देश के विभिन्न प्रदेशों-क्षेत्रों से यहां आने वाले अलग-अलग जनसमूहों के स्थानीय सांस्कृतिक व्यवहारों के भी दर्शन होते हैं. इनमें मिथिलांचल की लोक संस्कृति प्रमुख है.

रंगों पर रखा जाता है खास ध्यान

बैद्यनाथ चित्रकला- पटचित्र से अलग है

चित्रकार बैद्यनाथ शैली के चित्रों में बेसिक कलर का प्रयोग करते हैं. इसमें प्रयास होता है कि रंगों के मूल स्वभाव से पात्रों के स्वभाव एवं परिवेश के महत्व को अभिव्यंजित किया जाये. ऐसा करने के पीछे कलाकार की इस बात को लेकर सतर्कता है कि बैद्यनाथधाम तीर्थस्थल है और इसका धार्मिक-पौराणिक महत्व है. इसके साथ ही यहां शक्तिपीठ भी है. इस तरह बैद्यनाथधाम सात्विक स्थल है. ऐसे में कलाकार इस तथ्य को ध्यान में रख कर रंगों के स्वभाव को इसके अनुकूल रखने के प्रति पूरी सतर्कता बरतते हैं. यह पेंटिंग देवघर और बैद्यनाथ मंदिर के महत्व और सांस्कृतिक विरासत को संजोने का अनोखा माध्यम है.

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