हालात में काफी बदलाव भी आया. विद्यार्थियों को उम्मीद होने लगी थी कि कॉलेजों का उतरोत्तर विकास होगा. बुनियादी जरूरतों को पूरा करते हुए कॉलेजों में गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई संभव हो पायेगी. लेकिन, लगातार चुनाव के नाम पर आश्वासन मिलने से विकास का ग्राफ तेजी से गिरता चला गया. आज हालात यह है कि छात्रों की समस्याओं के प्रति न तो कॉलेज प्रशासन न ही विश्वविद्यालय प्रशासन गंभीर है.
कुछ छात्र संगठन को छोड़ दें तो कोई भी संगठन छात्रों की समस्याओं के समाधान के लिए आगे नहीं आ रहे हैं. वर्ष 2007 में जब पहली बार कॉलेजों एवं स्नातकोत्तर विभागों में प्रत्यक्ष रूप से चुनाव हुआ था तो चुनाव मैदान में उतरने वाले सभी प्रत्याशियों को किसी न किसी राजनीतिक पार्टियों का प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से समर्थन प्राप्त था. चुनाव मैदान में मुख्य रूप से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, एनएसयूआइ, आजसू, झारखंड छात्र मोरचा, झारखंड विकास छात्र मोरचा, आदिवासी छात्र संघ, आदिवासी-मूलवासी छात्र गंठबंधन, अनुसूचित जाति छात्र संघ, झारखंड छात्र जन मोरचा आदि संगठनों ने अपने-अपने प्रत्याशियों को चुनाव में जीत दिलाने की पूरजोर मशक्कत किया था.

