झारखंड में इन 30 गांवों में डिजिटल इंडिया फेल, पेड़-पहाड़ पर चढ़कर मोबाइल चलाते हैं लोग

Updated at : 25 Mar 2026 8:27 AM (IST)
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कुंदा प्रखंड के गांव में पेड़ पर चढ़कर बात करता युवक (बाएं) और पेड़ पर लटका स्मार्टफोन. फोटो: प्रभात खबर

Digital India: झारखंड के चतरा जिले के कुंदा प्रखंड के कई गांव आज भी मोबाइल नेटवर्क से वंचित हैं. लोग पेड़ और पहाड़ पर चढ़कर बात करते हैं. डिजिटल इंडिया अभियान के बावजूद यहां इंटरनेट और कनेक्टिविटी बड़ी समस्या बनी हुई है, जिससे शिक्षा और सरकारी सेवाएं प्रभावित हो रही हैं. इससे संबंधित पूरी रोचक खबर नीचे पढ़ें.

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प्रतापपुर से धर्मेंद्र गुप्ता, दीनबंधू और तस्लीम की रिपोर्ट

Digital India: केंद्र सरकार का ‘डिजिटल इंडिया’ अभियान देश को तकनीकी रूप से सशक्त बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जाता है. लेकिन झारखंड के चतरा जिले के कुंदा प्रखंड में इसकी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है. यहां के 78 गांवों में से करीब 30 गांव आज भी मोबाइल नेटवर्क से कोसों दूर हैं. इंटरनेट और मोबाइल कनेक्टिविटी जैसी बुनियादी सुविधाएं यहां के लोगों के लिए अब भी सपना बनी हुई हैं. आलम यह है कि मोबाइल से बात करने के लिए इन गांवों के लोगों को पेड़ और ऊंचे स्थानों (पहाड़) पर चढ़ना पड़ता है.

पेड़ और पहाड़ बने मोबाइल टॉवर

नेटवर्क की समस्या इतनी गंभीर है कि ग्रामीणों को मोबाइल चलाने के लिए पेड़ों और पहाड़ों पर चढ़ना पड़ता है. किसी रिश्तेदार से बात करनी हो या जरूरी जानकारी लेनी हो, लोग घंटों ऊंचाई पर खड़े रहकर सिग्नल का इंतजार करते हैं. कई बार तो ग्रामीण फोन को पेड़ पर लटका कर कॉल आने का इंतजार करते हैं. यह तस्वीर आज के डिजिटल युग में भी ग्रामीण इलाकों की बदहाल स्थिति को उजागर करती है.

शिक्षा और सरकारी कामकाज पर असर

मोबाइल नेटवर्क नहीं होने का सीधा असर शिक्षा और सरकारी कामकाज पर पड़ रहा है. स्कूलों में शिक्षकों को बायोमेट्रिक सिस्टम से उपस्थिति दर्ज करने में दिक्कत होती है. वहीं पंचायत स्तर पर बैंकिंग सेवाएं, सीएसपी (कस्टमर सर्विस प्वाइंट), प्रज्ञा केंद्र और राशन वितरण जैसी सेवाएं भी प्रभावित हो रही हैं. ई-पॉश मशीन से राशन वितरण में नेटवर्क की कमी बड़ी बाधा बन रही है.

इन गांवों में सबसे ज्यादा परेशानी

कुंदा प्रखंड के कुटिल, मरगड़ा, एकता, खुशियाला, लोटवा, कामत, फुलवरिया, लकड़मंदा, दारी, गारो, बलही, करिलगड़वा, हारूल, चितवतारी, सिंदरी, नवादा, उलवार, मेदवाडीह, गेन्द्रा, लुकुईया, बंठा, सोहरलाठ, साबानु, रेगनिया तरी, बैलगाड़ा, ललिमाटी, सरजामातु, लेवाड़, नावाडीह और कुशुम्भा जैसे कई गांवों में नेटवर्क की स्थिति बेहद खराब है. इन गांवों के लोग डिजिटल सुविधाओं से पूरी तरह वंचित हैं.

शोपीस बना बीएसएनएल का टॉवर

ग्रामीणों की परेशानी को और बढ़ाने वाली बात यह है कि कई गांवों में बीएसएनएल के टॉवर तो लगाए गए हैं, लेकिन उन्हें अब तक चालू नहीं किया गया है. ये टॉवर केवल शोभा की वस्तु बनकर रह गए हैं. अगर इन टॉवरों को चालू कर दिया जाए, तो काफी हद तक समस्या का समाधान हो सकता है. लेकिन अब तक इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हुई है.

ग्रामीणों की जुबानी दर्द

कुटिल गांव के प्रज्ञा केंद्र और सीएसपी संचालक राजकुमार बताते हैं कि उन्हें रोजाना लैपटॉप और मोबाइल लेकर पेड़ों और पहाड़ों पर चढ़कर काम करना पड़ता है. यह न केवल समय की बर्बादी है, बल्कि जोखिम भरा भी है. दारी गांव के अजय यादव का कहना है कि उनके गांव में आज तक नेटवर्क की सुविधा नहीं मिली है. रिश्तेदारों से बात करने के लिए भी उन्हें पेड़ पर चढ़ना पड़ता है. यह स्थिति बेहद परेशान करने वाली है.

प्रशासन से लगातार मांग, फिर भी समाधान नहीं

ग्रामीणों ने कई बार सांसद, विधायक और जिला प्रशासन से नेटवर्क सुविधा उपलब्ध कराने की मांग की है. लेकिन अब तक उनकी समस्याओं पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है. डिजिटल इंडिया के इस दौर में भी इन गांवों का तकनीकी रूप से पिछड़ा रहना कई सवाल खड़े करता है.

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डिजिटल गैप को पाटने की जरूरत

कुंदा प्रखंड के इन गांवों की स्थिति साफ दिखाती है कि डिजिटल इंडिया का सपना अभी अधूरा है. जब तक देश के हर गांव तक मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट नहीं पहुंचेगा, तब तक डिजिटल विकास की बात अधूरी ही रहेगी. सरकार और प्रशासन को चाहिए कि इस दिशा में जल्द ठोस कदम उठाएं, ताकि ग्रामीणों को भी डिजिटल सुविधाओं का पूरा लाभ मिल सके.

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KumarVishwat Sen

लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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