Chaibasa News : इस्लामी हिजरी वर्ष पैगंबर मोहम्मद के हिजरत से शुरू हुआ था

Published by : ATUL PATHAK Updated At : 27 Jun 2025 11:46 PM

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इस्लामी कैलेंडर वर्ष की शुरुआत पैगम्बर मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हिजरत से जुड़ा ऐतिहासिक वाक्या

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चक्रधरपुर. इस्लामी कैलेंडर वर्ष की शुरुआत पैगम्बर मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हिजरत से जुड़ा ऐतिहासिक वाक्या है. पैगंबर मोहम्मद (स.) मक्का में जन्म लिये और 53 वर्ष तक वहीं रहे. 53 वर्ष की आयु में अल्लाह के हुक्म से उन्हें मक्का छोड़कर मदीने की हिजरत करनी पड़ी. फिर जीवन के 10 साल मदीना में ही गुजारे. मक्का से मदीना तक का यह सफर इस्लाम का इतिहास है. 622 ईस्वी में इस्लामी इतिहास में एक क्रांतिकारी मोड़ तब आया जब पैगम्बर हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मक्का से मदीना की ओर हिजरत (प्रवास) किया. यह घटना न केवल इस्लामी सभ्यता की एक नयी शुरुआत थी, बल्कि इसी ऐतिहासिक पल को इस्लामी हिजरी कैलेंडर की शुरुआत का आधार भी बनाया गया.

हिजरी वर्ष की पृष्ठभूमि

हिजरी कैलेंडर की नींव उस समय पड़ी जब खलीफा हजरत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु के समय इस्लामी प्रशासन को एक आधिकारिक कैलेंडर की आवश्यकता महसूस हुई. सलाह-मशवरे के बाद तय हुआ कि इस्लामी कैलेंडर की शुरुआत उस घटना से होनी चाहिए जो इस्लाम के फैलाव में निर्णायक साबित हुई. हिजरत, यानी पैग़म्बर मोहम्मद (स.) का मक्का से मदीना जाना था. पैग़म्बर मोहम्मद (स.) जब इस्लाम की शिक्षा मक्का में फैलाने लगे तो वहां के क़ुरैश सरदारों को यह पसंद नहीं आया. मुसलमानों पर अत्याचार किया गया जो लगातार बढ़ता गया. स्थिति यहां तक पहुंच गयी कि पैग़म्बर के अनुयायियों को जान बचाने के लिए हबशा (आज का इथियोपिया) तक हिजरत करनी पड़ी.हालात इतने खराब हो गए कि अल्लाह के हुक्म से पैग़म्बर मोहम्मद (स.) ने मक्का छोड़कर मदीना जाने का फैसला किया. यह सफर कोई आम यात्रा नहीं थी. जान का खतरा हर कदम पर मंडरा रहा था.

कुरैश की साज़िश और गुफा-ए-सौर

मक्का के कुरैशियों ने यह तय किया कि वे पैग़म्बर (स.) को शहीद कर देंगे. वे रात के अंधेरे में उनके घर को घेरकर खड़े हो गए. लेकिन पैग़म्बर (स.) ने अपने चचेरे भाई हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु को अपनी जगह सुला दिये और खुद हज़रत अबू बक्र रज़ियल्लाहु अन्हु के साथ गुप्त रूप से मक्का से निकल गए. दोनों को तीन दिन तक ग़ार-ए-सौर (सौर पहाड़ी की गुफा) में छुपकर रहना पड़ा. दुश्मनों ने उन्हें ढूंढने की पूरी कोशिश की, लेकिन अल्लाह ने उन्हें महफूज़ रखा. फिर वे एक विश्वस्त मार्गदर्शक के साथ मदीना की ओर रवाना हुए.

मदीना में ऐतिहासिक स्वागत

मदीना के लोगों ने पैग़म्बर (स.) और उनके साथियों का दिल खोलकर स्वागत किया. बच्चे-बूढ़े, औरत-मर्द सब ””””तलअल बद्रु अलैना…”””” की प्यारी नज़्म गाते हुए उनका इस्तकबाल कर रहे थे. यह एक ऐतिहासिक क्षण था, जिसने इस्लामी राज्य की स्थापना की बुनियाद रखी.

हिजरी कैलेंडर की शुरुआत

हिजरत की इस घटना को इस्लामी तारीख का ‘मील का पत्थर’ मानते हुए, हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु ने 17 हिजरी में इसे इस्लामी कैलेंडर की शुरुआत घोषित किया. पहला हिजरी वर्ष 1 मुहर्रम 622 ई. से शुरू होता है. अब 1447 हिजरी में पहुंच गए हैं और इस्लामी हिजरी नव वर्ष शुक्रवार 27 जून से शुरू हुआ है.इस प्रकार इस्लाम में हिजरत का वाकया केवल एक स्थान परिवर्तन नहीं था, यह एक वैचारिक क्रांति थी. यह त्याग, साहस, ईमान और अल्लाह पर भरोसे की मिसाल है और आज भी हर हिजरी साल की शुरुआत इसी यादगार घटना से जुड़ी हुई है. हिजरत ने इस्लाम को एक नयी जमीन दी और मदीना से इस्लाम का मजबूत जुड़ाव हुआ.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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