गुस्से में क्यों हैं गजराज, झारखंड में इंसानी बस्ती में तांडव का क्या है राज?

Updated at : 09 Feb 2026 4:34 PM (IST)
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Elephant Attack

बोकारो के पेटरवार और गोमिया में हाथियों के हमले बढ़े. एआई जेनरेटेड फोटो

Elephant Attack: झारखंड में गजराज के बढ़ते हमले इंसानी बस्तियों के लिए बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं. बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि आखिर, जंगल में मस्त रहने वाले गजराज को अचानक इंसानी बस्तियों में भटकने की जरूरत क्यों पड़ी? जंगल से निकलकर उनका उग्र होने के पीछे कारण क्या हैं? आखिर, क्या कारण है कि बरसों से गजराज और इंसानों के बीच जंग हो रही है? प्रभात खबर ने इन सवालों का जवाब तलाशने की कोशिश की है? आइए, इसे विस्तार से जानते हैं.

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बोकारो से सीपी सिंह की रिपोर्ट

Elephant Attack: झारखंड में गजराज गुस्से में हैं. राज्य विभिन्न जिलों की इंसानी बस्ती में उनके द्वारा मचाया तांडव हमेशा सुर्खियां बनता रहता है. उनके तांडव से लोगों को जानमाल का नुकसान हो जाता है. पिछले कुछ सालों में उन्होंने इंसानी बस्ती पर अपने हमले तेज कर दिए हैं. खासकर, अभी हाल के दिनों में बोकारो जिले के गोमिया और पेटरवार क्षेत्र में गजराज के हमले अधिक तेज हो गए हैं. आदमी उनके हमलों से त्राहिमाम कर रहा है. लेकिन, उनके इस गुस्से को कोई समझने की कोशिश नहीं कर रहा है?

बोकारो में हाथियों का तांडव, दहशत में लोग

बोकारो के पेटरवार और गोमिया क्षेत्र में गजराज का हमला बीते कुछ महीनों में बेहद भयावह हो गया है. पिछले दो दिनों में ही हाथियों ने घरों से खींचकर पांच लोगों की जान ले ली, जबकि चार लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं. 05 फरवरी की रात तीन लोगों की मौत हुई, एक घायल हुआ. इसके अगले दिन यानी 06 फरवरी को दो और लोगों की जान चली गई. इससे पहले 18 जनवरी को एक व्यक्ति की मौत और 11 नवंबर 2025 को हुए हमले में दो लोगों की जान गई थी. इन आंकड़ों ने साफ कर दिया है कि यह कोई छिटपुट घटना नहीं, बल्कि लगातार बढ़ने वाला संकट है. डर इस बात का भी है कि अब गजराज उन इलाकों में भी पहुंच रहे हैं, जहां उनका पहले कभी आना-जाना नहीं था.

क्यों भटक रहे हैं गजराज?

जंगल संरक्षण और दामोदर बचाओ अभियान से जुड़े गुलाब चंद्र बताते हैं कि हाथियों का भटकाव कोई बेतरतीब प्रक्रिया नहीं है. उनका एक निश्चित पारंपरिक रास्ता होता है. मौसम के अनुसार, वे साल में दो बार इन्हीं रास्तों से गुजरते हैं. बोकारो से रांची जाने के दौरान रामगढ़ की सिकिदरी घाटी में सड़क किनारे लगे बोर्ड “हाथी विचरण क्षेत्र” इसी सच्चाई की याद दिलाते हैं. हाथियों की याददाश्त बेहद तेज होती है. वे दशकों पुराने रास्तों को भी नहीं भूलते और उसी के सहारे विचरण करते हैं.

बंद होते हाथी कॉरिडोर

समस्या तब शुरू होती है, जब इन पारंपरिक रास्तों में इंसानी दखल बढ़ जाती है. जानकारों के मुताबिक, झारखंड में खनन, सड़क निर्माण और अन्य विकास कार्यों ने हाथियों के कई पुराने रास्ते बंद कर दिए हैं. रास्ता बंद होने पर हाथी अपने मूल निवास की ओर लौट नहीं पाते और भटक जाते हैं. मजबूरी में गांवों, खेतों और कस्बों की ओर बढ़ जाते हैं. यही भटकाव बाद में इंसा-–हाथी संघर्ष का रूप ले लेता है.

झारखंड के तीन प्रमुख हाथी रूट

विशेषज्ञों के अनुसार, झारखंड में हाथियों का विचरण मुख्य रूप से तीन रूट से होता है. पहला रूट चतरा से लातेहार होते हुए दलमा अभयारण्य तक जाता है. दूसरा रूट हजारीबाग से घाटो, गोला और सिल्ली होते हुए दलमा अभयारण्य तक पहुंचता है. तीसरा रूट हजारीबाग से गिरिडीह, भंडारीदह और पुरूलिया के रास्ते दलमा की ओर जाता है. इसका मतलब है कि झारखंड में हाथियों का मूल निवास दलमा के जंगल में है. गुलाब चंद्र बताते हैं कि हाथी इन रूटों पर सालों से बसंत ऋतु और अक्तूबर से दिसंबर के बीच आते-जाते रहे हैं. लेकिन खनन और बुनियादी ढांचे के विकास ने इन रास्तों को बुरी तरह प्रभावित किया है.

खनन ने बढ़ाया संकट

उन्होंने कहा कि भंडारीदह वाला रूट खनन के कारण लगभग बंद हो चुका है. इसका सीधा असर बोकारो के नावाडीह, बोकारो थर्मल और आसपास के इलाकों में दिख रहा है, जहां हाथियों का उत्पात बढ़ गया है. हजारीबाग-गोला-सिल्ली रूट पर नेशनल हाईवे और खनन गतिविधियों ने हाथियों की आवाजाही मुश्किल कर दी है. चतरा से दलमा वाले रूट में जंगलों की संघनता कम हो गई है और खनन भी बढ़ा है. नतीजा यह है कि हाथी अब नए गांवों की ओर बढ़ रहे हैं.

क्या महुआ है वजह?

हाथियों के इंसानी इलाकों में आने को लेकर कुछ योजनाकार महुआ को वजह मानते हैं. लेकिन, ग्रामीण इस तर्क को सिरे से खारिज करते हैं. उनका कहना है कि महुआ झारखंड में सदियों से रहा है. अगर यही वजह होती, तो संघर्ष नया नहीं होता. असल समस्या हाथियों के रास्तों में बढ़ता इंसानी हस्तक्षेप है. जंगल सिकुड़ते जा रहे हैं और हाथियों के लिए सुरक्षित गलियारे खत्म हो रहे हैं.

हाथी कॉरिडोर का प्रस्ताव और नई चुनौती

झारखंड में चार हाथी कॉरिडोर बनाने का प्रस्ताव है. लेकिन इसके चलते करीब 400 गांवों के प्रभावित होने की आशंका है. इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या समाधान एक नई समस्या को जन्म देगा? वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया की 2017 की रिपोर्ट बताती है कि झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और दक्षिणी पश्चिम बंगाल के करीब 21 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में केवल 3128 हाथी बचे हैं. देश में मानव–हाथी संघर्ष से होने वाली कुल मौतों में से 45 फीसदी इसी इलाके में होती हैं.

वन विभाग की कोशिशें

बोकारो के डीएफओ संदीप शिंदे के मुताबिक, हाथियों के भटकाव को रोकने के लिए वन विभाग कई स्तरों पर काम कर रहा है. ड्रोन के जरिए हाथियों की मूवमेंट पर नजर रखी जा रही है. क्विक रिस्पॉन्स टीम गांवों में जाकर लोगों को सतर्क और जागरूक कर रही है. शिंदे बताते हैं कि पिछले दो-तीन महीनों में बोकारो में ही एक हथिनी ने आठ लोगों की जान ली है, जबकि रामगढ़ जिले में भी कुछ घटनाएं हुई हैं. हथिनी को काबू में करने के लिए वनतारा बचाव टीम से संपर्क किया गया है.

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समाधान की राह कहां?

झारखंड में इंसान–हाथी संघर्ष अब केवल वन्यजीवों का मुद्दा नहीं रह गया है. यह विकास मॉडल पर भी सवाल खड़ा करता है. जब तक विकास के साथ जंगल और हाथी कॉरिडोर को बचाने की संतुलित नीति नहीं बनेगी, तब तक गजराज का गुस्सा यूं ही इंसानी बस्तियों पर टूटता रहेगा. यह लड़ाई हाथी और इंसान के बीच नहीं, बल्कि अव्यवस्थित विकास और प्रकृति के बीच है. अगर समय रहते संतुलन नहीं बनाया गया, तो नुकसान दोनों का तय है.

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KumarVishwat Sen

लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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