भारतीय संस्कृति में हर पंथ व संप्रदाय को मिला है अवसर : मोहन भागवत

Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 21 Jun 2024 12:42 AM

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बोकारो के सेक्टर तीन स्थित सरस्वती विद्या मंदिर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का बौद्धिक वर्ग, हिंदू साम्राज्य दिनोत्सव पर सरसंघचालक ने दिया प्रबोधन

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बोकारो. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि हिंदू साम्राज्य दिनोत्सव छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक का दिवस है. संघ ने इस उत्सव को अपना उत्सव क्यों बनाया, इसका आज के वातावरण में जिन्हें ज्ञान नहीं है, जानकारी नहीं है, उनके मन में कई प्रश्न आ सकते हैं. हमारे देश में राजाओं की कमी नहीं है. देश के लिए जिन्होंने लड़कर विजय प्राप्त किया, ऐसे राजाओं की भी कमी नहीं है. छत्रपति शिवाजी महाराज के समय की परिस्थिति अगर हम देखें, तो ध्यान में ये बात आती है कि अपनी आज की परिस्थिति व उस समय की परिस्थिति के बहुत अंशों में समानता है. श्री भागवत गुरुवार को सेक्टर तीन स्थित सरस्वती विद्या मंदिर में आरएसएस के विकास वर्ग में आयोजित बौद्धिक वर्ग के तहत हिंदू साम्राज्य दिनोत्सव पर प्रबोधन दे रहे थे. आरएसएस प्रमुख ने कहा कि हिंदू साम्राज्य का मतलब ही सर्वपंथ है. अतीत काल से चली आ रही परंपरा में हिंदू साम्राज्य में सभी पंथ व सभी संप्रदाय को अवसर मिला है.

संकटों के आगे अपना आत्मविश्वास खो बैठा था समाज

मोहन भागवत ने कहा कि अतीत में संकटों के आगे समाज अपना आत्मविश्वास खो बैठा था. यह सबसे बड़ा संकट था. शिवाजी के पूर्व के समय में भी ऐसी ही परिस्थिति थी. अपनी सारी विजिगीषा छोड़ कर हिंदू समाज हताश होकर बैठा था. शिवसंभव नाटक में है: शिवाजी महाराज के जन्म की कहानी है. जिजामाता गर्भवती हैं. गर्भवती स्त्री को विशिष्ट इच्छाएं होती हैं, खाने-पीने की. श्री भागवत ने कहा कि कहते हैं कि आनेवाला बालक जिस स्वभाव का होगा, उस प्रकार की इच्छा होती है. जिजामाता की सहेलियों ने उनसे पूछा : क्या इच्छा है, तो जिजामाता बताती हैं कि उन्हें ऐसा लगता है कि शेर की सवारी करें. उनके दो ही हाथ न हों, अठारह हाथ हों और एक-एक हाथ में एक-एक शस्त्र लेकर पृथ्वी तल पर जहां-जहा राक्षस हैं, वहां जाकर उन का निःपात करें. अथवा सिंहासन पर बैठकर व छत्र चामरादि धारण कर अपने नाम का जयघोष सारी दुनिया में करायें.

आत्मविश्वास शून्य होने पर आ जाते हैं सभी प्रकार के दोष

सरसंघचालक श्री भागवत ने कहा कि सामान्य स्थिति में यह सुनते हैं, तो कितना आनंद होगा कि आनेवाला बालक इस प्रकार का विजिगीषु वृत्ति का है. लेकिन जिजामाता की सहेलियां कहती हैं कि ये क्या है. ये क्या सोच रही हो तुम. अरे जानती नहीं एक राजा ने ऐसा किया था. उसका क्या हाल हो गया. हम हिंदू हैं. सिंहासन पर बैठेंगे? हाथ में शस्त्र लेकर पराक्रम करने की इच्छा करना या सिंहासन पर बैठने की इच्छा करना बर्बादी का लक्षण है. इस प्रकार की मानसिकता हिंदू समाज की बनी थी. श्री भागवत ने कहा कि आत्मविश्वास शून्य हो जाता है, तो सब प्रकार के दोष आ जाते हैं. स्वार्थ आ जाता है. आपस में कलह आ जाती है. इसका लाभ लेकर विदेशी ताकतें बढ़ती चली जाती हैं. फिर सामान्य लोगों का जीवन दूभर हो जाता है.

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