Bokaro News : 35 साल का हुआ बोकारो, विकास के कई वादे अधूरे

Updated at : 31 Mar 2026 12:17 AM (IST)
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Bokaro News : 35 साल का हुआ बोकारो, विकास के कई वादे अधूरे

Bokaro News : 01 अप्रैल 1991 को बोकारो जिला बना था.

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01 अप्रैल 1991 को बोकारो जिला बना था. धनबाद के दो व गिरिडीह जिला के छह प्रखंडों को मिला कर बोकारो जिला बनाया गया गया. सपना देखा गया कि जिला बनने से बोकारो क्षेत्र का विकास होगा. विकास की राह में कई सपने पूरे हुए, तो कई अधूरे ही रह गये. चाहे निर्माण काल से बोकारो स्टील प्लांट का उत्पादन क्षमता 10 एमटी करने की बात हो या शहर में उच्च शिक्षा देने की बात हो. चाहे सार्वजनिक यातायात के लिए बस स्टैंड बनाने की बात हो या फिर व्यवसायिक वाहनों के स्थायी पड़ाव के लिए ट्रांसपोर्ट नगर बनाने की बात हो. चाहे गरगा नदी की सफाई की बात हो या सिंगारीजोरिया को अतिक्रमण मुक्त बनाने की. हर बार बोकारो को मिलता है सिर्फ वादा.

बोकारो एयरपोर्ट : बीरबल की खिचड़ी हुई साबित

बोकारो एयरपोर्ट को जिला के विकास से जोड़ कर देखा जाता है. लेकिन, यह बीरबल की खिचड़ी साबित होकर रह गया है. एयरपोर्ट से पांच माह में उड़ान शुरू करने का वादा किया गया था, वह लगभग आठ साल में भी शुरू नहीं हो पायी. 25 अगस्त 2018 को उड़ान स्कीम के तहत बोकारो एयरपोर्ट विस्तारीकरण का शिलान्यास किया गया था. दावा किया गया था कि 25 दिसंबर 2018 को बोकारो एयरपोर्ट से उड़ान शुरू हो जायेगी. शिलान्यास के बाद सबसे पहले पेड़ों की कटाई संबंधित परेशानी सामने आयी. 1772 पेड़ों की कटाई का मामला अटका. 07 जून 2022 में साफ हुआ कि इन पेड़ों को स्थानांतरित नहीं, बल्कि काटा जायेगा. मई 2023 तक पेड़ों की कटाई पूरी कर ली गयी. इसके बाद लगा कि किसी भी वक्त उड़ान शुरू हो सकती है. रनवे, लोंज, यात्री सुविधा, एटीएस समेत सभी काम पूरे किये गये. एयरपोर्ट में चार दिसंबर 2023 को अग्निशमन का विशेष वाहन बोकारो पहुंचा. साथ ही विभाग की ओर से 16 अग्निशमन कर्मी को भी हरी झंडी दे दी गयी. नवंबर 2025 में दूंदीबाद का बूचड़खाना भी हटा दिया गया. अब हर माह बैठक होती है, नयी तारीख मिलती है और फिर वही कहानी दोहरा दी जाती है.

चास-बोकारो में नियमित बस स्टैंड तक नहीं

बोकारो को व्यवस्थित शहर का तमगा हासिल है. लेकिन, चास-बोकारो में नियमित बस स्टैंड तक नहीं है. बोकारो शहर में प्रवेश करते ही नया मोड़ में एक बस स्टैंड है. इसका निर्माण बोकारो इस्पात संयंत्र के स्थापना काल के दौरान ही हुआ. लेकिन, राजस्व के हिसाब से इसका इस्तेमाल नहीं हो सका है. बीएसएल की जमीन पर स्टैंड होने के कारण जिला प्रशासन स्टैंड में कोई काम नहीं कर पाता है. झारखंड निर्माण के पहले विमल कीर्ति सिंह के उपायुक्त रहते एक बार इस स्टैंड को लेकर टेंडर प्रक्रिया शुरू की गयी थी, लेकिन बाद में वह असफल हुआ. इसके बाद से इस स्टैंड की खबर लेने वाला कोई नहीं है. वर्तमान में बीएसएल प्रबंधन की ओर से बस स्टैंड का रखरखाव किया जाता है.

नया बस स्टैंड बनाने की उठी बात, फिर मामला शांत

2017 में बोकारो बस स्टैंड को नेशनल हाइवे (बोकारो-रामगढ़ सड़क) के किनारे स्थापित करने की बात उठी. पूर्व विधायक बिरंची नारायण ने इस दिशा में योजना बनायी थी. नये बस स्टैंड में हर तरह की सुविधा देने की बात कही गयी थी. लेकिन, यह योजना बस फाइल में कुछ कदम चलने के बाद थक कर सो गयी. 30 साल पहले चास के आइटीआइ मोड़ में लाखों की लागत से बस पड़ाव बनाया गया था. कुछ सालों तक यह जगह गुलजार रहा. इसके बाद यहां बसों का आना बंद हो गया. बाद में यहां ट्रक व अन्य मालवाहक वाहनों का कब्जा हो गया है.

हर राज्य से ट्रांसपोर्ट लिंक, लेकिन ट्रांसपोर्ट नगर नहीं

बोकारो जिला ट्रांसपोर्टिंग के लिहाज से बहुत आगे हैं. कोल इंडिया, सेल, डीवीसी, ओएजनीसी, इंडियन ऑयल जैसे पीएसयू के अलावा इलेक्ट्रोस्टील जैसे संस्थान हैं. इसके अलावा खाद सामग्री व निजी सामग्री की उपलब्धता के लिए भी ट्रांसपोर्ट सेक्टर का वृहत पैमाने पर इस्तेमाल होता है. हर दिन औसतन 3500-4000 से अधिक मालवाहकों का ठहराव चास-बोकारो में होता है. लेकिन, जिला में एक भी ट्रांसपोर्ट नगर नहीं है. जबकि, ट्रांसपोर्ट नगर बनाने की मांग दशकों से हो रही है. चास में ट्रांसपोर्ट नगर बनाने के लिए कई बार जगह चिन्हित की गयी है. 2017-18 में जेल मोड़ के पास जगह चिन्हित की गयी थी. इसके लिए वन विभाग व जिला पदाधिकारी से वार्ता भी हुई थी. लेकिन, कोई फैसला नहीं हो सका. चास के कांड्रा में भी जगह चिन्हित की गयी थी. लेकिन, वहां स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया था. इसके अलावा भी कई बार इस दिशा में प्रयास किया गया. प्रयास कभी भी सफल नहीं हुआ. वर्तमान में ट्रांसपोर्ट नगर बसाने की फाइल पेंडिंग में है. चास नगर निगम क्षेत्र के गुरुद्वारा रोड, धर्मशाला मोड़ से आइटीआइ मोड़ तक, एनएच 32, तलगड़िया रोड, एनएच 23 पर माल वाहकों का जमावड़ा लगा रहता है. इसी तरह हर व्यवसायिक क्षेत्र मसलन, बालीडीह, जैनामोड़ व अन्य जगहों पर सड़क किनारे ही वाहन खड़े रहते हैं. बोकारो चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज ने ट्रांसपोर्ट नगर बनाने के लिए 40-45 बार कोशिश की है. डीसी से लेकर मुख्यमंत्री, डीटीओ से लेकर सचिव स्तर तक बात की गयी.

सॉफ्टवेयर पार्क का सपना नहीं हुआ पूरा

2014 में केंद्र में नयी सरकार बनते ही 18 जून को धनबाद व जमशेदपुर में सॉफ्टवेयर तकनीक पार्क की नींव रखी गयी थी. साथ ही बोकारो में भी ऐसा ही पार्क स्थापित करने की बात हुई. पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इस संबंध में एमओयू साइन किया था. लेकिन अभी तक बोकारो में सॉफ्टवेयर पार्क का सपना पूरा नहीं हुआ है. 18 जुलाई 2016 को पार्क के लिए बियाड़ा क्षेत्र में भूमि आवंटित की गयी. 1.45 एकड़ भूमि पर पार्क बनाना था. धनबाद स्थापित सॉफ्टवेयर पार्क का डिजायन बनाने वाली कंपनी चड्डा एंड एसोसिएट ने ही यहां के लिए भी डिजायन तैयार किया गया था. डिजायन को मंजूरी के लिए केंद्रीय मंत्रालय में भेजा गया. माना जा रहा था कि लगभग 20 करोड़ की लागत से वित्तीय वर्ष 2017-18 में पार्क का पहला फेज बन जायेगा. 2020 तक तो पार्क के काम करना शुरू कर देना था. बकायदा डीपीआर भी तैयार कर ली गयी थी. लेकिन, पार्क आज तक फाइल में ही घूम रहा है.

अस्तित्व की लड़ाई दशकों से लड़ रहा दुंदीबाद बाजार

दुंदीबाद को बाजार के दृष्टिकोण से पूर्व भारत का जंक्शन माना जाता है. यहां 25 राज्यों से सामान आता है और 15 राज्य में यहां से सामान की आपूर्ति की जाती है. हर दिन करोड़ों का ट्रांजेक्शन इस बाजार से होता है. बावजूद इसके बाजार अपने अस्तित्व की लड़ाई दशकों से लड़ रहा है. बाजार को बीएसएल ने पहले स्थायी प्रवृति के रूप में स्थापित किया था, लेकिन बाद अस्थायी के रूप में व्यवहार किया जाने लगा. बाजार के स्थायीकरण की मांग दुकानदार दशकों से कर रहे हैं. इस मांग को सहारा स्थानीय से केंद्रीय स्तर के नेताओं ने दिया. लेकिन, बाजार अब तक स्थायी नहीं हो पाया. बताते चले कि बोकारो इस्पात संयंत्र के स्थापना काल के दौरान सेक्टरों में रहने वाले कर्मचारी व अधिकारियों के लिए बाजार की जरूरत पड़ी. 1967 में माराफारी चंचली स्थान के पास लगने वाले डेली मार्केट को सेक्टर 12 में बीएसएल के नगर प्रशासन की ओर से यहां बसाया गया. योजना दुकान के साथ आवास देने की थी. शुरुआती दौर में बाजार दुंदीबाद बाजार को हर तरह की सुविधा दी गयी. जल, नल, सड़क, स्ट्रीट लाइट जैसी बुनियादी सुविधा के साथ-साथ गाय हांकने के लिए कर्मचारियों की तैनाती भी बीएसएल प्रबंधन की ओर से की गयी. दुकानदारों को लाइसेंस तक दिया गया था. बदले में वेलफेयर के नाम पर दुकानदारों से 25 पैसा से 02 रुपया तक का शुल्क लिया जाता था. 1996 में अतिक्रमण व स्थायी निर्माण के नाम पर दुंदीबाद बाजार में बुलडोजर चलाया गया. इस समय बाजार को पुरी तरह से ध्वस्त कर दिया गया. इसके बाद 2011 में होली के समय भी दुंदीबाद को तोड़ा गया. विमल कीर्ति सिंह के बोकारो डीसी रहते समय दुकानों व दुकानदारों का सर्वे कराया गया. मिनट्स तैयार किया गया. 1900 के करीब दुकान व दुकानदार की पहचान की गयी थी. दुकान के प्रकार व आकार के अनुसार दर तय किया गया.

गरगा-सिंगारीजोरिया : लाइफ लाइन को बचाने के लिए नहीं बना लाइन

बोकारो-चास की लाइफ लाइन गरगा नदी को कहा जाता है. इसी तरह सिंगारीजोरिया को भी चास का प्रमुख नाला माना जाता है. लेकिन, दोनों की स्थिति बदतर हो गयी है. गरगा नदी को प्रदूषण मुक्त बनाने की बात दशकों से हो रही है. फाइल में टेंडर-टेंडर भी खेला गया. 2017-18 में नागपुर की फाइन एंड फाइन कंपनी की टीम ने गरगा नदी का निरीक्षण किया. इसके बाद अगस्त 2020 में एनजीटी के आदेश के बाद जिला प्रशासन ने गरगा की सेहत सुधारने की दिशा में कदम बढ़ाया. लेकिन, अभी तक गरगा की स्थिति जस की तस है. इसी तरह सिंगारीजोरिया को अतिक्रमण मुक्त बनाने के लिए लगभग हर साल योजना बनी. नये सिरे से सर्वे की बात कही गयी, लेकिन सिंगारीजोरिया का स्वरूप हर साल अतिक्रमण के कारण संकीर्ण होते चला गया. 2021 में सिंगारीजोरिया में अतिक्रमण के कारण चीराचास ने बाढ़ की विभीषिका देखी था. लाखों का नुकसान लोगों को उठाना पड़ा था.

स्व डॉ एपीजे अब्दुल कलाम का सपना भी नहीं हो सका पूरा

झारखंड राज्य बनने के साथ ही बोकारो में साइंस सेंटर व टेक्नोलॉजी लाइब्रेरी बनाने की योजना बनी. 2001 में विज्ञान व प्रौद्योगिकी विभाग की अनुषंगी इकाई झारखंड काउंसिल ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी का गठन किया गया था. मुख्य संरक्षक डॉ एपीजे अब्दुल कलाम बने. तत्कालीन सीएम बाबूलाल मरांडी अध्यक्ष व विभागीय मंत्री समरेश सिंह उपाध्यक्ष बने. राष्ट्रपति बन जाने के कारण डॉ कलाम ने मुख्य संरक्षक पद से इस्तीफा दे दिया. झारखंड की राजनीतिक उठा-पटक के कारण बाबूलाल मरांडी व समरेश सिंह सरकार से बाहर हो गये. साथ ही बोकारो में बनने वाला साइंस सेंटर व टेक्नोलॉजी लाइब्रेरी बनाने की योजना भी ठंडा बस्ते में चली गयी. 2001 में इस योजना के लिए सरकार ने बजटीय प्रबंध किया था. भवन निर्माण के लिए 01 करोड़ 24 लाख व अन्य सामग्री के लिए 03 लाख रुपया खर्च करने की योजना बनी. प्रथम किस्त के रूप में 65 लाख का भुगतान हुआ. भवन निर्माण विभाग को इस कार्य के लिए कार्य एजेंसी बनाया गया. लेकिन, बाद में राजनीतिक उठा-पटक के कारण दूसरी किस्त का भुगतान नहीं हुआ. पहली किस्त से बने भवन भी खंडहर में बदल गये हैं. वर्तमान में बोकारो विधायक श्वेता सिंह इस योजना को लेकर पहल फिर से पहल करती हुई दिख रही हैं.

हर माह कचरा टन में, निस्तारण किलो का भी नहीं

चास क्षेत्र नगर निगम के दायरा में आता है. चास-बोकारो से हर माह हजारों टन कचरा (घरेलू व अन्य) निकलता है. लेकिन, चास और बोकारो में कचरा निस्तारण के लिए कोई व्यवस्था नहीं है. खुलेआम जहां-तहां कचरा फेंका जाता है. हालांकि, इस दिशा में वादा व फाइली घोड़ा बहुत दौड़ा. बोकारो में सेक्टर 11 में बाउंड्री कर कचरा फेंका जाता है. वहीं चास में जमीन भरावट के हिसाब से जगह चयनित होता है. फिलहाल, फोरलेन के पास कचरा फेंका जा रहा है. कई संगठनों की ओर से मांग की जाती रही है. लेकिन, कोई पहल नहीं हुई. वहीं चास में भी कचरा निस्तारण प्लांट बनाने के लिए भी दशकों से मांग व वादा किया जाता रहा है. 2015 में तो इस दिशा में 10 एकड़ भूमि चिन्हित की गयी थी. लेकिन, विवाद के कारण यह योजना खटाई में पड़ गयी. फिर, 2018 में कालापत्थर के पास चिन्हित जगह के कारण विवाद शुरू हुआ. इस कारण अभी तक मामला खटाई में ही है. दो बार टेंडर की प्रक्रिया भी हुई, जिसे रद्द करना पड़ा.

इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू, मेडिकल कॉलेज का निर्माण भी रफ्तार से

जिला में इंजीनियरिंग कॉलेज का निर्माण पूरा हो गया है. चंदनकियारी इंजीनियरिंग कॉलेज, जिसे राजकीय अभियंत्रण महाविद्यालय- बोकारो के नाम से भी जाना जाता है, यहां सत्र 2025 से पढ़ाई शुरू हो गयी है. बीआइटी सिंदरी के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर उपेंद्र प्रसाद को प्राचार्य (प्रभारी) नियुक्त किया गया है. 20 एकड़ भूमि में बने कॉलेज में एकेडमिक ब्लॉक, एडमिनिस्ट्रेटिव ब्लॉक के अलावा विद्यार्थियों के लिए छात्रावास का निर्माण किया गया है. इधर, सेक्टर 12 में 25 एकड़ में 687.5 करोड़ रुपये की लागत से जगरनाथ महतो मेडिकल कॉलेज व अस्पताल का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है. अगले दो वित्तीय वर्ष के अंदर यहां पढ़ाई शुरू हो जायेगी. मेडिकल कॉलेज 100 बेड का होगा. साथ ही 500 बेड के अस्पताल का होगा. अस्पताल में एकेडमिक ब्लॉक के अलावा एक ऑडिटोरियम, डॉक्टर व पारा मेडिकल कर्मियों के लिए आवास, छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग आवास, प्ले ग्राउंड, छात्रों व शिक्षकों के मनोरंजन के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं, मल्टी पर्पस हाल, गेस्ट फैकल्टी के लिए अलग से कक्ष आदि सुविधा रहेगी. मेडिकल कॉलेज का अपना अलग पावर हाउस होगा, इसमें सोलर सिस्टम की भी व्यवस्था की जायेगी.

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JANAK SINGH CHOUDHARY

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