सुहागिन महिलाओं ने श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया वट सावित्री व्रत

Published by : Divyanshu Prashant Updated At : 16 May 2026 12:48 PM

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वट सावित्री

सुपौल के राघोपुर प्रखंड में शनिवार को वट सावित्री का त्योहार पारंपरिक निष्ठा के साथ संपन्न हुआ. महिलाओं ने निर्जला उपवास रखकर वट वृक्ष की पूजा की और अखंड सौभाग्य का वरदान मांगा.

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राघोपुर (सुपौल) से आशुतोष झा की रिपोर्ट: भारत की सांस्कृतिक परंपराएं और धार्मिक आस्थाएं आज भी समाज को एक सूत्र में बांधे हुए हैं. इन्हीं पावन परंपराओं में शामिल वट सावित्री व्रत शनिवार को राघोपुर प्रखंड क्षेत्र के विभिन्न गांवों और मोहल्लों में पूरी श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाया गया. सुहागिन महिलाओं ने अपने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और परिवार की मंगलकामना को लेकर पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना की.

सोलह श्रृंगार कर वट वृक्ष की लगाई परिक्रमा

सुबह होते ही महिलाएं पारंपरिक परिधानों में सज-धजकर और सोलह श्रृंगार कर पूजा की तैयारी में जुट गईं. पूजा की थाली में रोली, अक्षत, फूल, धूप, दीप, कच्चा सूत, फल और मिठाइयां सजाकर महिलाओं ने पहले घरों में पूजा की. इसके बाद वे सामूहिक रूप से नजदीकी वट (बरगद) वृक्ष के पास पहुंचीं, जहां विधिवत पूजन कर वृक्ष की जड़ों में जल अर्पित किया तथा उसके तने पर कच्चा सूत लपेटते हुए परिक्रमा की. पूजा के दौरान महिलाओं ने सावित्री और सत्यवान की कथा श्रद्धापूर्वक सुनी.

यमराज से वापस लिए थे पति के प्राण

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वट सावित्री व्रत की कथा महाभारत काल से जुड़ी हुई है. पौराणिक कथाओं में उल्लेख है कि पतिव्रता सावित्री ने अपने तप, त्याग और अटूट निष्ठा के बल पर मृत्यु के देवता यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे. तभी से यह व्रत अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है.

धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों दृष्टिकोण से खास है ‘वट’

  • धार्मिक महत्व: वट वृक्ष को सनातन परंपरा में अत्यंत पूजनीय माना गया है. धार्मिक मान्यता है कि इस विशाल वृक्ष में त्रिदेव – ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास होता है.
  • वैज्ञानिक महत्व: वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी यह वृक्ष पर्यावरण और मानव जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी माना जाता है. इसकी घनी छाया, प्रचुर मात्रा में ऑक्सीजन देने की क्षमता तथा इसके औषधीय गुण इसे प्रकृति का अनमोल उपहार बनाते हैं.

यह व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों और सामाजिक एकता का भी प्रतीक है. सामूहिक पूजा, पारंपरिक लोकगीत और रीति-रिवाजों के माध्यम से यह पर्व नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करता है.

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