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लॉकडाउन : दाने-दाने को मोहताज हैं ये लोग, नहीं मिल रहा सरकारी योजनाओं का लाभ

Updated at : 01 Jun 2020 12:45 AM (IST)
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लॉकडाउन : दाने-दाने को मोहताज हैं ये लोग, नहीं मिल रहा सरकारी योजनाओं का लाभ

सरकार द्वारा चार चरण में लिये गये लॉकडाउन से जहां आम जन जीवन अस्त-व्यस्त है. गरीब, मजदूर के समक्ष रोजी-रोटी व रोजगार की समस्या बनी हुई है. हालांकि सरकार द्वारा इनलोगों के लिये कई तरह की लाभकारी योजनाएं शुरू की गयी है.

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सुपौल : सरकार द्वारा चार चरण में लिये गये लॉकडाउन से जहां आम जन जीवन अस्त-व्यस्त है. गरीब, मजदूर के समक्ष रोजी-रोटी व रोजगार की समस्या बनी हुई है. हालांकि सरकार द्वारा इनलोगों के लिये कई तरह की लाभकारी योजनाएं शुरू की गयी है. जिससे उन्हें राशन, अनुदान, रोजगार व अन्य सुविधाएं मिल रही है. लेकिन इन सब के बीच समाज में एक ऐसा वर्ग भी है, जिस पर ना तो सरकार का और ना ही समाज का ध्यान जा रहा है.

यह वर्ग गरीब-बेसहारा भिखारी व घुमंतू लोगों का है. जो किसी प्रकार शहर व गांव में भीख मांग कर अपना व परिवार के सदस्यों का भरण-पोषण करते हैं. लेकिन विडंबना यह है कि लॉकडाउन के दौरान जहां सड़कों पर घुमना भी वर्जित था, बाजार की दुकानें बंद पड़ी थी, वहीं सामान्य वर्ग के लोगों ने भी कोरोना वायरस के डर से इस वर्ग से दूरी बना ली है. नतीजा है कि समाज के सबसे निचले पायदान पर जीवन-बसर कर रहे ये गरीब, विकलांग, गुंगे, बहरे, बेसहारा परिवार लॉकडाउन के दौरान दाने-दाने के लिये मोहताज हो चुके हैं. जिला प्रशासन द्वारा प्रवासियों के लिये शिविरों की व्यवस्था की गयी है. जहां भोजन, पानी के साथ ही उन्हें अन्य सुविधाएं भी दी जा रही है. लेकिन इसी समाज के बीच रह रहे इन निर्धन समुदाय के लोगों पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा.

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ना तो इन्हें सरकारी सुविधा दी जा रही और ना ही इनके लिये भोजन-पानी की ही व्यवस्था की जा रही. प्रभात खबर से साझा की अपनी व्यथागौरतलब है कि शहरी क्षेत्र में घुमंतू व भीख मांगने वाले लोगों की एक बड़ी तादात है. जिनके पास ना तो एक धूर जमीन है और ना ही रहने के लिये कोई स्थायी ठिकाना. आमदनी का अन्य कोई जरिया नहीं रहने के कारण ये लोग मजबूरन सड़कों पर घूम कर दुकानदारों व आम निवासियों से भीख मांग कर किसी प्रकार अपना गुजर-बसर करते हैं.

स्थानीय माल गोदाम पर लंबे समय से ऐसे कई गरीब बेसहारा लोग फटे-चिथड़े कपड़ों से घिरे तथाकथित आशियाने में रह रहे हैं. सर्दी-गर्मी से बेअसर हो चुके ये लोग दिन भर लोगों के आगे पेट के लिये हाथ पसारने के बाद मिले कुछ पैसे व राशन-पानी से जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं. लोहिया नगर स्थित मेला रोड में भी घुमंतू परिवार के कई लोग चिथड़े टांग कर रह रहे हैं. जिनका पेट भी मांग कर चल रहा है. प्रभात खबर ने रविवार को इन लोगों से बात की तो उन सब का दर्द सीने से निकल कर उनकी जुबान पर आ पहुंचा. जुबा पर निकल आया सीने का दर्द- भीख मांगने वाली वृद्ध महिला दुखनी देवी ने बताया कि उन्हें ना तो कोई कमाने वाला है और ना ही कभी कोई सरकारी रहनुमा देखने आया है. बताया कि वे वर्षों से वह यहां अकेली रहती है. आज तक कोई भी सरकारी सहायता नहीं मिली. लॉकडाउन की शुरुआत में कुछ बाबू-भैया आए और कुछ सूखा राशन दे गये.

जो कुछ दिन चला. अब पुन: भूखमरी की स्थिति उत्पन्न हो गयी है. – पारो देवी ने भी बताया कि सरकार द्वारा उन्हें अब तक कुछ भी नहीं दिया गया. जबकि उनके दो छोटे-छोटे बच्चे हैं. सिर पर किसी का हाथ नहीं जो कमा कर उन्हें खिला सके. लॉकडाउन के दौरान भीख भी नहीं मिल रहा. लोग कोरोना के डर से उन्हें भगा देते हैं. जिसकी वजह से बच्चे भूख से बिलख रहे हैं. – अरहुलिया देवी ने बताया कि लॉकडाउन के दौरान भीख मिलना भी मुश्किल हो गया. कभी-कभार कहीं से कुछ मिल जाता है तो पेट की क्षुधा बुझा लेते हैं. नहीं तो भूखे पेट सोना पड़ता है. सरकार कह रही है कि राहत किचेन चला रहे हैं.

लेकिन यह किचेन कहां चल रहा है, इस बात की जानकारी अब तक उन्हें नहीं है. – मेला रोड में रह रही सबीना खातून ने बताया कि वे लोग बधाई मांगने वाले हैं. लॉकडाउन की वजह से कहीं भी इस समय उत्सव नहीं मनाया जा रहा है. जिसकी वजह से उन्हें बधाई नहीं मिल रही है. उनके दो छोटे-छोटे बच्चे हैं. जो शहर में घूम कर भीख मांगते हैं. जिससे उनका गुजारा जैसे-तैसे चल रहा है. कागजों पर ही चल रहा सामुदायिक किचेनहैरत की बात है कि कोरोना आपदा के दौरान जिला प्रशासन द्वारा विगत करीब एक महीने से जारी विज्ञप्ति के माध्यम से यह दावा किया जाता था कि शहरी क्षेत्र में रहने वाले निर्धन एवं निराश्रितों के लिये रैन बसेरा सुपौल एवं हजारी उच्च विद्यालय गौरवगढ़ में आवासन एवं सामुदायिक किचेन की व्यवस्था उपलब्ध करायी गयी है.

लेकिन प्रभात खबर द्वारा जब इन दोनों केंद्रों की पड़ताल की गयी तो आश्चर्यजनक रूप से ये दोनों केंद्र बंद पाये गये. हालांकि यहां सामुदायिक रसोई घर लिखा बोर्ड टंगा था. लेकिन केंद्र पर ताले लटके थे. निर्धनों के लिये यहां कोई व्यवस्था नहीं थी. कहते हैं अधिकारी – सामुदायिक किचेन इस समय बंद पड़ा है. इन भिखारियों के बाबत राहत देने की बात की जानकारी एसडीओ साहब देंगे.

वैसे इन लोगों के लिये अभी तक सामुदायिक किचेन में भोजन देने का कोई आदेश नहीं है. प्रभाष नारायण लाभ, अंचलाधिकारी, सुपौल- सामुदायिक किचेन केवल बाहरी प्रदेश से आने वाले लोगों के लिये चलाया जा रहा है. निर्धन परिवार संबंधित अंचलाधिकारी या बीडीओ से संपर्क करें. उन्हें राशन कार्ड एवं अन्य सरकारी योजना की लाभ दी जायेगी. अनुराग कुमार, डीपीआरओ सुपौल

Posted by Pritish Sahay

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