अभियंताओं व संवेदक के लिए कोसी कामधेनु

Published at :21 Mar 2017 12:41 AM (IST)
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अभियंताओं व संवेदक के लिए कोसी कामधेनु

परेशानी. कोसी की विनाश लीला से हर वर्ष होते हैं हजारों घर जमींदोज हर वर्ष बरसात के मौसम में कोसी विनाश की नयी इबारत लिखती है, हजारों घर जमींदोज होते हैं, सैकड़ों लोग असमय काल-कलवित होते हैं. सुपौल : पावस की काली घटा ज्यों हीं छाती है, त्यों ही संपूर्ण कोसी क्षेत्र भय और आशंका […]

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परेशानी. कोसी की विनाश लीला से हर वर्ष होते हैं हजारों घर जमींदोज

हर वर्ष बरसात के मौसम में कोसी विनाश की नयी इबारत लिखती है, हजारों घर जमींदोज होते हैं, सैकड़ों लोग असमय काल-कलवित
होते हैं.
सुपौल : पावस की काली घटा ज्यों हीं छाती है, त्यों ही संपूर्ण कोसी क्षेत्र भय और आशंका के बादल से घिर जाता है. क्या बांध के भीतर और क्या बाहर. दोनों ओर भय, दोनों ओर सन्नाटा. शुभ-शुभ बरसात बीत जाने की प्रतीक्षा. राहत की आस, लूट के किस्से. साल-दर-साल की यही कहानी, यही किस्से और इसके जड़ में है बांध. यहां बता दें कि हर वर्ष बरसात के मौसम में कोसी विनाश की नयी इबारत लिखती है, हजारों घर जमींदोज होते हैं, सैकड़ों लोग असमय काल-कलवित होते हैं. धारा बदलने और सील्ट ढोने के लिये मशहूर रहा कोसी हमेशा कोसी के अभियंताओं, संवेदक और राजनेताओं के लिये कामधेनु बना रहा.
कभी पायलट चैनल की आड़ में तो कभी अन्य कारणों से कोसी के बालू से तेल निकालने की तिकड़म जारी रही. कोसी से जुड़े इतिहास बताते हैं कि जिस प्रकार अब तक नदी की वास्तविक गहराई नहीं मापी जा सकी है, उसी प्रकार कोसी के नाम पर अभियंताओं और संवेदकों की लूट की लकीर का अंदाजा नहीं लगाया जा सका है.
वर्ष 2013 में हुआ था निर्माण : कोसी नदी को जन उपयोगी बनाने के उद्देश्य से सेटलिंग बेसिन का निर्माण वर्ष 2013 में पूर्वी कोसी मुख्य नहर में किया गया. यह कोसी बराज और कटैया पावर हाउस के बीच तीन से नौ आरडी के बीच 35 करोड़ की लागत से बनाया गया. यह 600 मीटर लंबा, 371 मीटर चौड़ा और 02 मीटर गहरा है. आंध्र प्रदेश की आईभीआर कंपनी द्वारा इसका निर्माण कराया गया. इसका कार्य 03 अप्रैल 2010 को आरंभ हुआ और वर्ष 2013 के अंत में पूरा हो गया.
बालू से निकले तेल का क्या है खेल : दरअसल जब सेटलिंग बेसिन में बालू भर गया तब जल संसाधन विभाग ने महाराष्ट्र के आईएमएस सील्ट मैनेजमेंट को इसी वर्ष अगले पांच सालों के लिये बालू निकालने का ठेका दिया गया. कंपनी को पांच साल में सेटलिंग बेसिन से 38.50 लाख घन मीटर बालू निकालना था. वहीं एक साल में 7.70 लाख घन मीटर बालू निकालने की जिम्मेवारी दी गयी. करारनामा के अनुसार जल संसाधन विभाग को इसके लिये कंपनी को 55 करोड़ रूपये अदा करना था.
अब तक बालू निकालने के एवज में दिसंबर 2016 तक 3.67 करोड़ का भुगतान कर दिया गया. जबकि विभाग को शिकायत मिली कि करारनामा के अनुसार जितना बालू सेटलिंग बेसिन से बाहर निकाला जाना था, उतना बाहर नहीं निकाला गया. इसी शिकायत के आलोक में विभाग ने निगरानी टीम को जांच का जिम्मा सौंपा. कार्यपालक अभियंता राकेश कुमार सिंह के नेतृत्व में गठित पांच सदस्यीय टीम ने बालू निकालने के मामले की जांच भी की.
सोने का अंडा साबित हो रहा है पायलट चैनल : दरअसल कोसी आज भी अगर अभिशाप है तो इसकी बड़ी वजह यह है कि कोसी की समस्याओं से निजात के लिये कभी विभाग के स्तर पर मुकम्मल कार्रवाई नहीं हुई. यह हर कोई जानता है कि कोसी नदी में सील्ट का जमा एक बड़ी समस्या है. इस वजह से ही अब तक आठ बार कोसी अपने तटबंध को तोड़ कर बेलगाम हो चुकी है.
जानकार बताते हैं कि डगमारा से सुपौल के बीच सील्ट का जमाव प्रतिवर्ष 1.86 सेंटीमीटर, सुपौल से महिषी के बीच 6.35 सेंटीमीटर और महिषी से कोपड़िया के बीच 12.03 सेंटीमीटर हो रहा है. इसी सील्ट की आड़ में यहां हमेशा खेल होते रहा है. जिसमें प्रतिवर्ष करोड़ों खर्च होते हैं. बावजूद अगले साल वही समस्या बरकरार रहती है. वजह यह है कि पायलट चैनल के बाद निकाले गये बालू को फिर उसी जगह छोड़ दिया जाता है जो अगले साल फिर पायलट चैनल निर्माण का मार्ग प्रशस्त करता है. ऐसा नहीं है कि इन मामलों की जांच नहीं होती है.
नीदरलैंड की तकनीक पर आधारित है परियोजना
सेटलिंग बेसिन नीदरलैंड की तकनीक पर आधारित परियोजना है. इस तकनीक का आधार यह है कि पानी की गति को रोक कर उससे ना केवल बिजली पैदा की जा सकती है, बल्कि कोसी की पाने के साथ आयी बालू को रोक कर वहां से आगे पूर्वी नहर में बालू रहित पानी को सिंचाई के लिये खेतों में भेजी जाती है.
इससे बालू रहित पानी कटैया जल शक्ति गृह में विद्युत उत्पादन के लिये और पूर्वी कोसी मुख्य नहर में सिंचाई के लिये पहुंचने लगा. बालू भरे पानी से सबसे अधिक नुकसान खेतों को ही पहुंचता था. बालू की वजह से खेतों की उत्पादकता पर नाकारात्मक प्रभाव पड़ता था. इसके निर्माण से किसानों को बड़ा फायदा हुआ. दरअसल पहले नहर की सफाई के नाम पर जल संसाधन विभाग द्वारा अक्सर करोड़ों रुपये खर्च किये जाते थे. लेकिन नहर सफाई के नाम पर भी केवल बंदर बांट ही होती थी.
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