पढ़ने की उम्र में बच्चे चुन रहे कूड़ा

Updated at :27 Feb 2017 5:46 AM
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पढ़ने की उम्र में बच्चे चुन रहे कूड़ा

अनदेखी. आरटीइ से लेकर श्रम कानूनों तक की उड़ रही धज्जियां तमाम सरकारी योजनाओं के बाद भी गरीब तबके के बच्चे शिक्षा व्यवस्था से नहीं जुड़ पाये. न ही उन्हें वह सुविधाएं मयस्सर हो पा रही हैं, जो उनके लिए ही विशेष तौर पर उपलब्ध कराने का दावा होता रहा है. राघोपुर : धार्मिक मान्यताओं […]

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अनदेखी. आरटीइ से लेकर श्रम कानूनों तक की उड़ रही धज्जियां

तमाम सरकारी योजनाओं के बाद भी गरीब तबके के बच्चे शिक्षा व्यवस्था से नहीं जुड़ पाये. न ही उन्हें वह सुविधाएं मयस्सर हो पा रही हैं, जो उनके लिए ही विशेष तौर पर उपलब्ध कराने का दावा होता रहा है.
राघोपुर : धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बच्चों को भगवान का स्वरूप माना जाता है. बच्चों का नाम लेते ही मन में पवित्रता, खुशी, मस्ती, मासूमियत और आशा का भाव जागृत हो जाता है. बच्चों को देश का कर्मधार माना जाता है. कहते हैं कि आज के बच्चे ही कल के युवा है और इन युवाओं पर ही देश की जिम्मेवारी होगी. लेकिन हकीकत यह है कि कल के कर्मधार माने जाने वाले ये बच्चे ही वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सबसे अधिक उपेक्षित हैं. हालांकि यह कहना भी गलत नहीं होगा कि इसके लिए केवल शासन और प्रशासन के साथ ही सामाजिक संरचना भी उतनी ही अधिक जिम्मेवार है. दरअसल आलम यह है कि तमाम सरकारी योजनाओं के बाद भी गरीब तबके के बच्चे शिक्षा व्यवस्था से नहीं जुड़ पाये हैं और न ही उन्हें वह सुविधाएं मयस्सर हो पा रही हैं,
जो उनके लिए ही विशेष तौर पर उपलब्ध कराने का दावा हो रहा है. ऐसे में बच्चों का बचपन गरीबी की बोझ तले ही गुम हो जाता है और हर दिन इलाके में सैकड़ों की संख्या में बाल मजदूर पैदा हो रहे हैं. दरअसल कानून के मुताबिक 06 से 14 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों के लिए नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था है और 14 वर्ष तक के बच्चों को नौकरी रखना भी बाल श्रम कानून के तहत अपराध घोषित है. लेकिन हकीकत यह है कि आज भी प्रखंड के कुल आबादी का करीब 40 फीसदी नौनिहाल स्कूल से बाहर किसी न किसी गैरेज, होटल या किसी के घर में दाई व नौकर का काम करता नजर आता है. जिससे शिक्षा का अधिकार अधिनियम और बाल श्रम कानून दोनों की की धज्जियां उड़ रही हैं. वही देश की दिशा और दशा तय करने वाले नौनिहाल का भविष्य खतरे में पड़ता दिख रहा है.
क्या है शिक्षा का अधिकार : अप्रैल 2010 को पूर्ण रूप से देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू हुआ. इस अधिनियम तहत 06 से 14 वर्ष के सभी बच्चों के लिए शिक्षा को पूर्णतः मुफ्त एवं अनिवार्य कर दिया गया है. अब यह केंद्र तथा राज्यों के लिए कानूनी बाध्यता है कि मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा सभी को सुलभ हो सके. शिक्षा किसी भी व्यक्ति एवं समाज के समग्र विकास तथा सशक्तीकरण के लिए आधारभूत मानव मौलिक अधिकार है. संविधान में शिक्षा को अनिवार्य कर मुफ्त एवं भेदभाव रहित शिक्षा प्रावधान को 6 वर्ष से अधिक होने जा रहा है. बावजूद राघोपुर प्रखंड सहित जिले या राज्य के विभिन्न शहरों में इस देश की भविष्य में बागडोर संभालने वाले भाग्य विधाता कूड़े-कर्कट या गंदी नालियों में अपना भविष्य तलाश रहा है.
बच्चों को शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने के लिए प्रशासनिक स्तर पर हर संभव प्रयास किये जा रहे हैं. कई योजनाएं भी चलायी जा रही हैं और इसका असर भी दिखने लगा है.
मो हारुण, जिला शिक्षा पदाधिकारी, सुपौल
बाल श्रमिकों की समस्या गंभीर है. बावजूद हर सूचना पर विभाग द्वारा त्वरित कार्रवाई की जा रही है. विभिन्न स्थलों पर छापेमारी भी हो रही है और दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई भी की जा रही है.
केके रश्मि, श्रम अधीक्षक, सुपौल
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