दुकानों को व्यवस्थित करने की जरूरत

Updated at :06 Aug 2016 8:13 AM
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दुकानों को व्यवस्थित करने की जरूरत

दिल्ली के प्रगति मैदान, सोनपुर मेला या फिर पटना गांधी मैदान के सरस मेला में लगे पिपरा के खाजा के स्टॉल से इसकी स्वाद पूरे देश में फैली हुई है. साथ ही पड़ोसी देश नेपाल में भी इसकी मांग है. जिला उद्योग केंद्र के पूर्व प्रबंधक ने खाजा से संबंधित दुकानों का सर्वेक्षण कराया था, […]

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दिल्ली के प्रगति मैदान, सोनपुर मेला या फिर पटना गांधी मैदान के सरस मेला में लगे पिपरा के खाजा के स्टॉल से इसकी स्वाद पूरे देश में फैली हुई है. साथ ही पड़ोसी देश नेपाल में भी इसकी मांग है. जिला उद्योग केंद्र के पूर्व प्रबंधक ने खाजा से संबंधित दुकानों का सर्वेक्षण कराया था, लेकिन आजतक खाजा की दुकान को विकसित व व्यवस्थित कराने का प्रयास नहीं किया गया.
पिपरा : अपने विशिष्ठ स्वाद व आकार को लेकर मशहुर पिपरा का खाजा की पहचान देश-विदेश में रही है. दिल्ली के प्रगति मैदान से लेकर सोनपुर मेला या फिर पटना गांधी मैदान के सरस मेला में लगे पिपरा के खाजा के स्टॉल से इसकी स्वाद पूरे देश में फैली हुई है. साथ ही पड़ोसी देश नेपाल में भी इसकी मांग है. एनएच 106 व एनएच 327 ई क्रासिंग पर स्थित पिपरा बाजार की अर्थ व्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा खाजा मिठाई की बिक्री पर निर्भर करती है. सड़क से गुजरने पर प्राय: हर व्यक्ति यहां का खाजा खरीदना व खाना पसंद करते हैं. खाजा बनाने वाले कारीगर से लेकर किराना दुकानदार तक की रोजी रोटी इससे जुड़ी हुई है.
स्थानीय बुजुर्ग ने बताया कि स्व गेनी साह को पिपरा के खाजा मिठाई का आविष्कारक माना जाता है. जब पिपरा बाजार के स्वरूप में नहीं था. उस वक्त एक छोटा सा हाट दुर्गा मंदिर के बगल में पीपल पेड़ के नीचे लगाता था. उसी हाट पर स्व गेनी साह द्वारा शुद्ध घी का खाजा तैयार कर चार आने किलो बेचते थे. वहीं वर्तमान समय में शुद्ध घी का खाजा 200 से 240 रुपये किलो बिक रहा है.
वक्त बदलने के साथ ही खाजा के गुणवत्ता में भी कमी आयी है, अब न तो वैसा कारीगर है न शुद्ध सामग्री उपलब्ध हो पा रहा है. बावजूद पिपरा का खाजा भारतवर्ष का सबसे सस्ती मिठाई बनी हुई है. वनस्पति घी व रिफाइंड में बना खाजा दुकानों पर 70 रुपया प्रति किलो बिक रहा है.
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