टॉपर घोटाले से पूर्व कॉपी जांच घोटाला

टॉपर घोटाले से पूर्व ही सुपौल में परीक्षकों ने काॅपी जांच घोटाले को अंजाम दिया. जिन परीक्षकों से जिन विषयों की जांच करायी गयी, उन परीक्षकों को उक्त विषय से कोई लेना-देना नहीं है. इसके कारण परीक्षकों ने आंख मूंद कर जैसे-तैसे कॉपियों की जांच कर डाली. इसमें कई अच्छे छात्र को कम अंक मिला, […]
टॉपर घोटाले से पूर्व ही सुपौल में परीक्षकों ने काॅपी जांच घोटाले को अंजाम दिया. जिन परीक्षकों से जिन विषयों की जांच करायी गयी, उन परीक्षकों को उक्त विषय से कोई लेना-देना नहीं है. इसके कारण परीक्षकों ने आंख मूंद कर जैसे-तैसे कॉपियों की जांच कर डाली. इसमें कई अच्छे छात्र को कम अंक मिला, तो कई फिसड्डी छात्र अंकों के मामले में बाजी मार गये. कहा तो यह भी जा रहा है कि इसके पीछे भी कोई सोची-समझी रणनीित काम कर रही थी, जिससे खास स्कूलों को फायदा मिल सके. अब स्क्रूटनी में कुछ गड़बड़ियां सामने आ रही है. यदि इस पूरे मामले का विषय विशेषज्ञों के माध्यम से जांच करायी जाये, तो कई खुलासे हो सकते हैं.
सुपौल : फिलहाल स्क्रूटनी के परिणाम स्वरूप ही वैशाली जिले के मैट्रिक परीक्षा के परिणाम पर ही प्रश्नचिन्ह लग गया है. खास कर विज्ञान व सामाजिक विज्ञान विषय की काॅपियों की जांच में ऐसे परीक्षकों को लगाया गया था, जिनकी न तो पढ़ाई के दौरान उक्त विषयों से कोई लेना-देना रहा और न ही सेवा काल में ही उक्त विषय से कोई ताल्लुक रहा. यदि इस मामले की गहराई से जांच की जाती है, तो न केवल वैशाली जिले के मैट्रिक परीक्षा परिणाम बदल सकते हैं, बल्कि दर्जनों परीक्षकों को जेल की हवा खानी पड़ सकती है.
जिस प्रकार वर्तमान में बिहार बोर्ड द्वारा टॉपर छात्रों का विषय विशेषज्ञों द्वारा पुन: मूल्यांकन कराया गया था और मूल्यांकन के आधार पर पूर्व में घोषित परिणाम को रद्द कर परीक्षार्थी को जेल भेजा गया, यदि इसी प्रकार की प्रक्रिया परीक्षकों के लिए अपनायी जाती है, तो कई चौंकाने वाले परिणाम सामने आयेंगे. मूल्यांकन के लिए लगाये गये परीक्षकों में उक्त विषय की जानकारी का ही अभाव था कि उन्होंने बिना प्रश्न और उत्तर को समझे ही आंख बंद कर उत्तर पुस्तिका में अंक दिया. इसका खुलासा बोर्ड के निर्देश पर जारी स्क्रूटनी के बाद हो रहा है. बिहार बोर्ड द्वारा टॉपर छात्रों की तर्ज पर यदि परीक्षकों द्वारा जांचे गये विषय में उनकी दक्षता का विषय विशेषज्ञ से जांच कराया जाये, तो परीक्षक को भी टॉपर छात्रों की तरह कार्रवाई की जद में आना होगा.
बिहार बोर्ड द्वारा सुपौल जिला मुख्यालय में वार्षिक माध्यमिक परीक्षा 2016 की उत्तर पुस्तिकाओं की जांच के लिए दो मूल्यांकन केंद्र विलियम्स उच्च विद्यालय सुपौल व हजारी उच्च विद्यालय गौरवगढ़ सुपौल को बनाया गया था. दोनों विद्यालयों के प्रधानाध्यापक को मूल्यांकन केंद्र निदेशक की जवाबदेही सौंपी गयी थी. बोर्ड ने काॅपी जांच के िलए वैशाली जिले की काॅपियों को सुपौल भेजा था. साथ ही सभी विषयों में लगभग छह सौ शिक्षकों को जांच कार्य के लिए परीक्षक बनाया गया था.
बोर्ड ने सामाजिक विज्ञान के तहत इतिहास, भूगोल व नागरिक शास्त्र के लिए अलग-अलग परीक्षक तथा मुख्य परीक्षकों की भी नियुक्ति की थी. वहीं दूसरी ओर विज्ञान विषय के तहत फिजिक्स, केमेस्ट्री तथा बायोलॉजी विषय के लिए अलग-अलग परीक्षकों की नियुक्ति की गयी थी, क्योंकि मैट्रिक में शिक्षकों की नियुक्ति विषयवार होती है. लेकिन मूल्यांकन केंद्र पर इस निर्देश की धज्जियां उड़ायी गयी और अनियमितता बरती गयी.
मूल्यांकन के दौरान केंद्र निदेशक व परीक्षकों द्वारा बिहार बोर्ड के निर्देश एवं नियम कानून को ताक पर रख कर काॅपी जांच की गयी. बोर्ड द्वारा इतिहास विषय में नियुक्त किये गये परीक्षक ने भूगोल और नागरिक शास्त्र विषयों की काॅपियों की जांच की. भूगोल में नियुक्त परीक्षक इतिहास और नागरिक शास्त्र विषय तथा नागरिक शास्त्र में नियुक्त परीक्षकों ने भूगोल और इतिहास विषय की काॅपियों की जांच की, जबकि असलियत यह है कि इतिहास के कई परीक्षक को भूगोल विषय की कोई जानकारी नहीं है.
भूगोल विषय के कई परीक्षक को इतिहास तथा नागरिक शास्त्र के परीक्षक को भूगोल की कोई जानकारी नहीं है, क्योंकि न तो अध्ययन के दौरान इनका यह विषय था और न ही सेवा में आने के बाद इस विषय से इनका पाला पड़ा.बदतर स्थिति तो यह रही कि फिजिक्स और केमेस्ट्री में नियुक्त किये गये परीक्षक बायोलॉजी की काॅपी की जांच की, जबकि फिजिक्स और केमेस्ट्री वाले शिक्षकों को बायोलॉजी विषय का दर्शन भी नहीं होता.
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