सामाजिक समरसता की प्रतीक है होली

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 21 Mar 2016 5:01 AM

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सुपौल : संत के मौसम के साथ – साथ फाल्गुन का महीना. जहां एक ओर सर्दी का समय समाप्त हो रहा है. वहीं मौसम में गरमाहट भी आने लगी है. मानों सारा वातावरण सुगंधित हो गया हो. पेड़ों पर नयी कलियां, पक्षियों का चहकने के साथ ही होली का यह मौसम जनमानसों में एक नये […]

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सुपौल : संत के मौसम के साथ – साथ फाल्गुन का महीना. जहां एक ओर सर्दी का समय समाप्त हो रहा है. वहीं मौसम में गरमाहट भी आने लगी है. मानों सारा वातावरण सुगंधित हो गया हो. पेड़ों पर नयी कलियां, पक्षियों का चहकने के साथ ही होली का यह मौसम जनमानसों में एक नये ऊर्जा का संचार करता है.

होली का त्योहार बसंत के आगमन के स्वागत का उत्सव है. होली के त्योहार को राष्ट्रीय व सामाजिक त्योहार माना जाता है. फाल्गुन पूर्णिमा के दिन मनाये जाने वाले इस रंगोत्सव के त्योहार को बच्चे- बूढे, पुरुष – महिलाएं सभी बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं. होलीकोत्सव के संबंध में कई मत प्रचलित है. कुछ लोग इस त्योहार को अग्नदेव के पूजन से भी जोड़ते हैं. यहां तक कि इस त्योहार को नवसवंत्सर का आरंभ तथा वसंतागम के उपलक्ष्य में किया जाने वाला यज्ञ भी माना जाता है. इस तिथि को मनु के जन्म होने के कारण होली को मन्वादितिथि की भी संज्ञा दी गयी है.

होली की रही है प्राचीन परंपरा : इस त्योहार का प्रचलन वेद, पुराणों सहित कई साहित्यों में भी देखने को मिलता है. ज्ञात हो कि जैमिनी सूत्र के रचयिता ने अपने ग्रंथ में होलीकाधिकरण नामक एक स्वतंत्र प्रकरण के साथ होली की प्राचीनता को प्रदर्शित किया है. वहीं विंध्य प्रदेश के रामगढ़ नामक स्थान से तीन सौ इसवी पूर्व एक शिलालेख भी प्राप्त हुआ है. जिसमें फाल्गुन पूर्णिमा को मनाये जाने वाले इस उत्सव के बारे में विस्तार से बताया गया है.
साथ ही वात्सायन ऋषि ने अपने कामसूत्र में होलाक नाम से इस उत्सव का उल्लेख किया है. यहां तक कि सातवीं शताब्दी में विरचित रत्नावली नाटिका में महाराजा हर्ष ने होली का एक सुंदर तरीके से वर्णन किया है. जबकि 11वीं शताब्दी में मुसलिम पर्यटक अल्बरुनी ने अपने इतिहास में भारत में विधान पूर्वक होली मनाये जाने का भी उल्लेख किया है.
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