वर्मी कंपोस्ट का करें प्रयोग, होगी अच्छी उपज

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निर्मली : अनुमंडल मुख्यालय स्थित हरि प्रसाद साह महाविद्यालय परिसर में आधुनिक कृषि प्राद्यौगिकी, जैविक खेती, पर्यावरण एवं संपोषणीय विकास के विषय पर कार्यशाला का आयोजन किया गया. डाॅ जैनेंद्र कुमार के नेतृत्व में आयोजित कार्यशाला का शुभारंभ अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक, वर्मी कंपोस्ट एवं जैव कृषि, ब्रिसबेन अस्ट्रेलिया के डाॅ राजीव कुमार सिन्हा, अंतरराष्ट्रीय संरक्षित कृषि […]

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निर्मली : अनुमंडल मुख्यालय स्थित हरि प्रसाद साह महाविद्यालय परिसर में आधुनिक कृषि प्राद्यौगिकी, जैविक खेती, पर्यावरण एवं संपोषणीय विकास के विषय पर कार्यशाला का आयोजन किया गया.

डाॅ जैनेंद्र कुमार के नेतृत्व में आयोजित कार्यशाला का शुभारंभ अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक, वर्मी कंपोस्ट एवं जैव कृषि, ब्रिसबेन अस्ट्रेलिया के डाॅ राजीव कुमार सिन्हा, अंतरराष्ट्रीय संरक्षित कृषि विशेषज्ञ व प्रबंध निदेशक एग्रीप्लास्ट टेक इंडिया प्रा लि बैंगलौर के ई राजीव कुमार राय, पटना साईंस कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डाॅ निर्मल कुमार मिश्रा एवं भागलपुर के डाॅ जगदीश ओझा ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया.

कार्यशाला को संबोधित करते हुए वैज्ञानिक डाॅ सिन्हा ने कहा कि वर्मी कंपोस्ट एवं जैविक उर्वरक का प्रयोग करने से खेतों की भूमि की उर्वर शक्ति बरकरार रहती है. इसके साथ-साथ फसलों को कई बीमारियों से बचाया जा सकता है. वर्मी कंपोस्ट का निर्माण केंचुए के द्वारा किया जाता है.

उन्होंने बताया कि रासायनिक खाद के उपयोग से कई ऐसी गंभीर बीमारी पनपती है जिससे फसलों को बचाने में किसानों को कठिनाई का सामना करना पड़ता है. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि गरम पानी में सब्जी व फल को डालने पर रासायनिक तत्व निकला है,

जो मनुष्य के लिए जहर का काम करता है. किसान वर्मी कंपोस्ट व जैविक आधारित खेती को ही तरजीह दें. 18वीं सदी में हुई थी जैविक खेती डाॅ राजीव कुमार सिन्हा ने कहा कि 18वीं सदी में आस्ट्रेलिया के वैज्ञानिक सर चार्ल्स डार्विन द्वारा केचुंए पर आधारित जैविक खाद से खेती की शुरुआत हुई थी.

उन्होंने कहा कि किसान ही हमारे अन्नदाता हैं, जो राज्य के विकास के साथ-साथ देश के विकास में भी अपनी अहम भूमिका निभा रहे हैं. किसान उपज बढ़ाने के लिए रासायनिक खाद का अधिक प्रयोग करते हैं. इसके कारण पर्यावरण पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है. वहीं धरती की उर्वरक शक्ति भी नष्ट होती है.

रासायनिक खाद का प्रयोग अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है. इसलिए किसानों को वर्मी कंपोस्ट का इस्तेमाल करना चाहिए. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस पहल की भी सराहना की, जिसमें प्रधानमंत्री ने विदेशों में रह रहे प्रवासी वैज्ञानिकों को भारत आ कर जैविक खेती को बढ़ावा देने की अपील की है.

उन्होंने उपस्थित लड़कियों से आगे बढ़ कृषि के क्षेत्र में कार्य करने की सलाह दी. कहा आज लड़कियां भी किसी मामले में पीछे नहीं हैं, इसलिए वे भी आगे आयें. कम लागत में होगी अधिक उपजई राजीव कुमार राय ने आधुनिक कृषि प्राद्यौगिकी आधारित खेती पर बल देते हुए कहा कि संरक्षण व पॉलीहाउस तकनीक से खेती करने से किसानों को कम लागत में कम जमीन पर भी अधिक उपज मिल सकती है. ऐसे किसान फल-फूल व सब्जी का उत्पादन कर सकते हैं.

पॉलीहाउस तकनीक से खेती कर एक एकड़ भूमि में तीस लाख गुलाब, केवरा जैसे फूलों को उगाया जा सकता है. इस तरह की खेती से किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी. मत्स्य विभाग के डॉ जगदीश ओझा ने मिथिलांचल में मछली उत्पादन पर बल देते हुए कहा कि यहां की भूमि मछली पालन के लिए अनुकूल है,

लेकिन प्रशिक्षण के अभाव में लोग मछली पालन नहीं कर पाते हैं. कार्यशाला को डाॅ निर्मल कुमार मिश्रा, जिला उद्यान पदाधिकारी व सहायक निदेशक मधुबनी अजीत कुमार यादव, अनुमंडल कृषि पदाधिकारी निर्मली संतोष कुमार सुमन, प्रबंधक दिलीप महाराज, एग्रीप्लास्ट के कृषि वैज्ञानिक नवीन कुमार सिंह, एचडीएफडी बैंक के प्रबंधक आदि ने भी संबोधित किया.

कार्यशाला की अध्यक्षता हरि प्रसाद साह महाविद्यालय के प्राचार्य डाॅ विमल कुमार राय ने की. मंच संचालन महाविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डाॅ शिव कुमार प्रसाद ने किया.

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