करगिल में दुश्मनों से लोहा लेते शहीद हुए थे हरे कृष्ण

Updated at : 25 Jul 2024 10:15 PM (IST)
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करगिल में दुश्मनों से लोहा लेते शहीद हुए थे हरे कृष्ण

देश की रक्षा में अपना प्राण न्योछावर करनेवाले शहीद हरे कृष्ण राम आज अपनों के बीच बेगाने हो गये हैं. हसनपुरा प्रखंड की पकड़ी पंचायत के महुअल-महाल निवासी हरे कृष्ण राम पांच जुलाई, 1999 को कारगिल में दुश्मनों से लोहा लेते शहीद हो गये थे.

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देश की रक्षा में अपना प्राण न्योछावर करनेवाले शहीद हरे कृष्ण राम आज अपनों के बीच बेगाने हो गये हैं. हसनपुरा प्रखंड की पकड़ी पंचायत के महुअल-महाल निवासी हरे कृष्ण राम पांच जुलाई, 1999 को कारगिल में दुश्मनों से लोहा लेते शहीद हो गये थे. लेकिन, प्रशासन व जनप्रतिनिधियों के लिए उनकी शहादत के कोई खास मायने नहीं हैं. वहीं, शहीद के परिजन भी उतने सक्रिय नहीं हैं. शहीद के पुत्र अवधेश कुमार स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस पर पुष्प अर्पित करने आते हैं. फिलहाल शहादत के 25 वर्षों में पहले तीन साल पूर्व शहीद के पैतृक गांव महुअल महाल में पूर्व सैनिकों तथा परिजनों द्वारा करगिल विजय दिवस सप्ताह समारोह पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया था. हालांकि शहीद के परिजनों को पेट्रोल पंप, नौकरी व मान-सम्मान दिलाने वाले कारगिल शहीद हरे कृष्ण राम की प्रतिमा स्थल आज भी अपेक्षित है. आज तक शहीद की आदमकद प्रतिमा नहीं लग सकी. जहां 12 जुलाई, 1999 को तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने शहीद के पैतृक गांव महुअल-महाल पहुंच कर उनके परिजनों को ढाढ़स बंधाया था. साथ ही उन्होंने दरौंदा से हाथोपुर होते हुए महुअल-महाल तक जानेवाले मुख्य मार्ग को उनके नाम पर करने, शहीद द्वार बनवाने, कन्या विद्यालय, घर-घर बिजली देने, स्वास्थ्य केंद्र बनवाने व समाधि स्थल पर आदमकद प्रतिमा लगाने का आश्वासन दिया था, लेकिन दरौंदा से हाथोपुर होते हुए महुअल-महाल तक मार्ग उनके नाम से नहीं हो सका, बल्कि इस मार्ग पर नन्हकू साह का बोर्ड लगा है. हाल ही में सिर्फ मुख्य मार्ग से महुअल-महाल गांव स्थित शहीद के घर होते हुए पकड़ी बाजार तक पक्की सड़क बनायी गयी है. घर-घर बिजली और उपस्वास्थ्य केंद्र तो है, लेकिन शहीद द्वार, गांव में कन्या विद्यालय व समाधि स्थल पर प्रतिमा लगाने की बात धरी-की-धरी रह गयी. शहीद होने के एक-दो वर्ष तक पदाधिकारियों व जनप्रतिनिधियों ने गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस व करगिल दिवस पर फूल माला चढ़ा कर औपचारिकताएं पूरी कीं, परंतु अब तो वह भी नहीं हो रहा है. अब केवल स्थानीय जनप्रतिनिधियों व शहीद के पुत्र द्वारा ही फूल माला चढ़ाये जाते हैं.

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