संस्कृति के मूल तत्व से छेड़छाड़ होने लगे, तो संस्कृति और राष्ट्र दोनों संकट में पड़ जाते हैं...

Published by : VINAY PANDEY Updated At : 24 Aug 2025 7:26 PM

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शहर के रिंग बांध स्थित सरस्वती विद्या मंदिर विद्यालय में रविवार को में विभाग स्तरीय संस्कृति बोध परियोजना को लेकर बैठक हुई.

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सीतामढ़ी. शहर के रिंग बांध स्थित सरस्वती विद्या मंदिर विद्यालय में रविवार को में विभाग स्तरीय संस्कृति बोध परियोजना को लेकर बैठक हुई. अखिल भारतीय संयोजक (संस्कृति बोध परियोजना एवं शारीरिक शिक्षा) दुर्ग सिंह राजपुरोहित, प्रदेश सचिव लोक शिक्षा समिति, रामलाल सिंह, पूर्व प्रदेश सचिव, झारखंड अजय कुमार तिवारी, झारखंड के विभाग निरीक्षक एवं क्षेत्रीय संयोजक, संस्कृति बोध परियोजना, विवेक नयन पांडे, विभाग निरीक्षक रंजीत कुमार भारती, संस्कृति बोध परियोजना के प्रांतीय संयोजक चंद्रमोहन प्रसाद यादव, विद्यालय सचिव रामनरेश ठाकुर तथा प्रधानाचार्य अनोज कुमार अकेला द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलन एवं पुष्पार्चन कर बैठक का शुभारंभ किया गया. अतिथियों का परिचय विद्यालय के प्रधानाचार्य अनोज कुमार अकेला ने कराया. स्वागत एवं सम्मान का दायित्व केशव कुमार, अनुज कुमार तथा प्रभारी प्रधानाचार्य राकेश कुमार ने निभाया. संचालन फारबिसगंज के प्रधानाचार्य एवं परियोजना के क्षेत्रीय सह-संयोजक आशुतोष कुमार मिश्रा ने किया. मुख्य अतिथि दुर्ग सिंह राजपुरोहित ने भारतीय संस्कृति एवं धर्म के महत्व पर विस्तार से विचार रखा. उन्होंने कहा कि “संस्कृति” का मूल शब्द “कृति” है जिसका अर्थ कार्य होता है एवं “धर्म” का सही अर्थ है धारण करना. धर्म वही है, जो समाज को संभालकर रखता है, गिरने नहीं देता और पवित्रता को बनाए रखता है. कहा कि हमारे पूर्वजों ने हजारों वर्षों से हमारी संस्कृति और संस्कारों को सुरक्षित रखा है, क्योंकि संस्कृति का मूल तत्व कभी नहीं बदलता, जबकि सभ्यता समय और परिस्थिति के अनुसार परिवर्तित होती रहती है. यदि संस्कृति के मूल तत्व से छेड़छाड़ होने लगे, तो संस्कृति और राष्ट्र दोनों संकट में पड़ जाते हैं. प्रदेश सचिव रामलाल सिंह ने अपने उद्बोधन में सरल उदाहरण देते हुए कहा – “भूख लगने पर भोजन करना प्रकृति है, बिना भूख के भोजन करना विकृति है और दूसरे को खिलाकर भोजन करना ही संस्कृति है1” उन्होंने कहा कि यही भारतीय जीवन दर्शन का वास्तविक स्वरूप है. इस अवसर पर विभिन्न क्षेत्रों से लगभग 55 की संख्या में आचार्य एवं सदस्य उपस्थित रहे.

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