सोनपुर मेले से विलुप्त हो रहे हैं हाथी
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :09 Nov 2016 7:40 AM (IST)
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सोनपुर : विश्व के सबसे बड़े पशु मेला सोनपुर के बारे में पौराणिक कथा है कि यह मेला गज और ग्राह के बीच हुए युद्ध में भगवान विष्णु द्वारा स्वयं अवतरित होकर गज अर्थात हाथी की आत्मरक्षा करने के पश्चात शुरू हुई. अपने इस कथा के साथ-साथ यह मेला दुनिया के सभी दुर्लभ पशु-पक्षियों के […]
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सोनपुर : विश्व के सबसे बड़े पशु मेला सोनपुर के बारे में पौराणिक कथा है कि यह मेला गज और ग्राह के बीच हुए युद्ध में भगवान विष्णु द्वारा स्वयं अवतरित होकर गज अर्थात हाथी की आत्मरक्षा करने के पश्चात शुरू हुई. अपने इस कथा के साथ-साथ यह मेला दुनिया के सभी दुर्लभ पशु-पक्षियों के व्यापार के साथ ही हाथियों की खरीद-बिक्री के लिए भी प्रसिद्ध था. परंतु यह विडंबना है या कानून की मजबूरी कि अब यहां अन्य पशु-पक्षी तो खरीद-बिक्री के लिए आते हैं लेकिन हाथी उनमे से नदारद होने लगा है.
कारण बताया जाता है कि वन्य जीव अधिनियम 1972 के तहत हाथियों के खरीद-बिक्री पर रोक लगना
यह कानून 2003 में सख्ती के साथ जिला प्रशासन एवं राज्य सरकार ने जब यहां लागू किया तो हाथियों के पालक व शौकीन केवल उसे मेला दर्शन व घुमाने के लिए लाने लगे. परंतु व्यापार पर रोक होने का सापेक्ष असर यहां आने वाले हाथियों की संख्या पर पड़ता गया. साल-दर-साल इनके आवक की संख्या गिरती चली गयी. अब ऐसा समझ लीजिए कि इस बार मेला दर्शन या घुमाने के लिए भी हाथी पालक अपने हाथियों को लेकर यहां आयेंगे कि नहीं शक है. कालांतर में हाथियों की खरीद-बिक्री सोनपुर मेले में हजारों की संख्या में होती थी. बताया जाता है कि राजा-महाराजा भी युद्ध में इस्तेमाल या सवारी के लिए इस मेले से ही हाथियों की खरीद करते थे. प्राप्त आंकड़े के मुताबिक 1931 से 1940 के बीच यहां 6080 हाथी आये, जबकि 1941 से 1950 के दरम्यान कुल 7042 हाथियों का व्यापार हुआ. इसी प्रकार 1951 से 1955 के बीच 2490, 1990 से 1999 के बीच कुल 937 हाथी लाये गये.
वर्ष 2000 से 2005 के मेले में 429 तथा 2006 से 2010 तक के मेले में 283 हाथियों ने सोनपुर मेले की रौनक बढ़ायी. इसके बाद मेले में हाथियों का आना लगातार कम होता गया. 2011 में 29, 2012 में 37, 2013 में 35, 2014 में 39 एवं 2015 के मेले में केवल 14 हाथी ही सोनपुर मेले पहुंच सके. वन्य प्राणी अधिनियम के कारण हाथी पालकों ने हाथियों के खरीद-बिक्री के बजाये एक-दूसरे को स्थानांतरित या गिफ्ट करने की परंपरा चलायी, परंतु विभाग ने सख्ती बरतते हुए इस पर भी रोक लगाते हुए कार्रवाई शुरू कर दी.
पर्यावरण एवं वन्य विभाग की नीति एवं कानून के सख्ती के बीच अपनी मान-मर्यादा बचाये रखने में ही अपनी भलाई समझी और यहां आना धीरे-धीरे बंद कर दिया. सोनपुर मेले में हाथी का स्नान, प्रदर्शन या हाथी का दौड़ केवल एक परंपरा निभाना या सीधे शब्दों में कहे तो नौटंकी भर रह गया है. इस वर्ष मेलार्थियों द्वारा चर्चा की जा रही है कि एक भी हाथी न आने के कारण स्नान, प्रदर्शन व दौड़ की रस्म अदायगी भी नहीं हो सकेगी.
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