राज आधी आबादी का ताज परिजनों को
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :29 Jun 2015 8:17 AM (IST)
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छपरा (सदर) : पंचायती राज व्यवस्था के तहत पंचायतों के विकास के लिए आधी आबादी को समान अधिकार देकर सरकार ने बेहतर परिणाम की उम्मीद पाली थी. परंतु, आज भी 95 फीसदी महिला पंचायत प्रतिनिधियों की कमान उनके पतियों, बेटों या अन्य करीबी परिजनों के हाथ में है. यही नहीं, विकास या कल्याण से संबंधित […]
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छपरा (सदर) : पंचायती राज व्यवस्था के तहत पंचायतों के विकास के लिए आधी आबादी को समान अधिकार देकर सरकार ने बेहतर परिणाम की उम्मीद पाली थी. परंतु, आज भी 95 फीसदी महिला पंचायत प्रतिनिधियों की कमान उनके पतियों, बेटों या अन्य करीबी परिजनों के हाथ में है.
यही नहीं, विकास या कल्याण से संबंधित विभिन्न योजनाओं के संबंध में अधिकतर महिला प्रतिनिधियों को न तो जानकारी रहती है और न वे जानने की कोशिश करते हैं. बल्कि उनके परिजन ही पूरे मामले को अपने स्तर से डील करते हैं.
बैठक में भाग लेने या खुद हस्ताक्षर करने से भी नहीं कतराते : कई महिला पंचायत प्रतिनिधियों के परिजन तो उनके बदले प्रखंड या अन्य स्तर पर होनेवाली बैठकों में शामिल होकर बैठकों का संचालन करते हैं. यही नहीं, कुछ तो अपने घर की महिला प्रतिनिधियों के बदले हस्ताक्षर करने से भी नहीं कतराते. पूर्व में जिला स्तर पर होनेवाली बैठक में भी कुछ महिला जनप्रतिनिधियों के बदले उनके पतियों के पहुंचने पर जिला प्रशासन द्वारा उद्घोषणा कर ऐसे लोगों को बैठक से निकलवाया गया. परंतु अब भी ऐसा हो रहा है.
कई महिला पंचायत प्रतिनिधि का नंबर उपयोग करते हैं परिजन : जिला प्रशासन पंचायती राज विभाग में विभिन्न पदों पर आसीन महिला पंचायत प्रतिनिधियों का नंबर अंकित रहता है. वैसी स्थिति में जब कोई भी पदाधिकारी, जनप्रतिनिधि या मीडिया के व्यक्ति फोन करते हैं, तो उन फोनों को महिला पंचायत प्रतिनिधियों के बदले उनके परिजन ही अटेंड करते हैं. यही नहीं, उन महिला प्रतिनिधियों के बदले जवाब देने या उनके कार्यक्रम या निर्णय के बारे में खुद ही बताने या खुद को ही प्रतिनिधि बताने से भी नहीं हिचकिचाते.
परिजन दे रहे आश्वासन: आगामी सात जुलाई को सारण स्थानीय प्राधिकार कोटे से एमएलसी का चुनाव हो रहा है. इसमें अधिकतर महिला पंचायत प्रतिनिधियों से मुलाकात नहीं हो पाती. उनके परिजन ही उम्मीदवारों को आश्वासन देकर खुश कर दे रहे हैं. आम जन कहते-देखे-सुने जा रहे हैं कि अधिकतर महिला जनप्रतिनिधियों की कमान उनके पति या परिजनों के हाथ में होने से आधी आबादी को मिले अधिकार का बेहतर उपयोग नहीं हो पाया है.
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