पुत्र से पिंडदान व श्राद्ध चाहते हैं पितृ
Updated at : 20 Sep 2017 4:43 AM (IST)
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आस्था आज विदा होंगे पूर्वज, घाटों पर होगा तर्पण, पितरों को संतुष्ट करने से मिलेगी सुख-समृद्धि छपरा : पितृ विसर्जनी अमावस्या बुधवार को है. इस दिन पूर्वजों का पूजन होगा और लोग उनका श्राद्ध और तर्पण कर उन्हें विदा करेंगे. पितृ विसर्जन के दिन अमावस्या मध्याह्न काल में होगी. पूर्वजों के श्राद्ध और तर्पण के […]
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आस्था आज विदा होंगे पूर्वज, घाटों पर होगा तर्पण, पितरों को संतुष्ट करने से मिलेगी सुख-समृद्धि
छपरा : पितृ विसर्जनी अमावस्या बुधवार को है. इस दिन पूर्वजों का पूजन होगा और लोग उनका श्राद्ध और तर्पण कर उन्हें विदा करेंगे. पितृ विसर्जन के दिन अमावस्या मध्याह्न काल में होगी. पूर्वजों के श्राद्ध और तर्पण के साथ ही पितृ पक्ष का समापन हो जायेगा. पितृ विसर्जनी अमावस्या पर सुबह से ही गंगा एवं नारायणी नदी के घाटों पर लोगों की भीड़ उमड़ेगी. लोग श्राद्ध, तर्पण के साथ ही अन्न, वस्त्र आदि का दान कर पूर्वजों को विदा करेंगे. आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को पितृ विसर्जनी अमावस्या व महालया कहते हैं. जो व्यक्ति पितृ पक्ष के 15 दिन तक श्राद्ध, तर्पण आदि नहीं करते हैं, वे अमावस्या को ही अपने पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध करते हैं.
श्रद्धा से करें पितरों का श्राद्ध : पितृ पक्ष पितरों के लिए महत्वपूर्ण होता है. इसमें श्रद्धा के साथ विधि-विधान से श्राद्ध करके पितरों को समर्पित भावना से संतुष्ट किया जा सकता है. हरिहरनाथ मंदिर के मुख्य अर्चक सुशीलचंद्र शास्त्री की मानें, तो श्राद्ध में विधान कम परंतु श्रद्धा अधिक होनी चाहिए. प्रात: काल नहा-धोकर फूल, अगरबत्ती, जल, काला तिल, अक्षत लेकर मंत्र के साथ सूर्य की ओर मुख कर पितरों के प्रति अर्पित करने से पितृ संतुष्ट हो जाते हैं. खोये संस्कारों को पुन: स्थापित करने में पितृ पक्ष मील का पत्थर है. आनेवाली पीढ़ी इन संस्कारों से बहुत कुछ लाभ प्राप्त कर सकती है. अमावस्या के दिन पितर अपने पुत्र के द्वारा पिंडदान एवं श्राद्ध की आशा में आते हैं, यदि वहां उन्हें पिंडदान या तिलांजलि नहीं मिलती है, तो वे श्राप देकर चले जाते हैं. इसलिए इस श्राद्ध कार्यक्रमों का परित्याग नहीं करना चाहिए. पितरों को संतुष्ट करने से ही उन्हें लाभ मिलता है.
इनका भी श्राद्ध करें : ऐसे पूर्वज, जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं है, उनके निमित्त भी श्राद्ध और तर्पण पितृ विसर्जनी अमावस्या के दिन किया जाता है. आज के दिन सभी पूर्वजों का विसर्जन होता है. इसलिए यह तिथि विशेष है.
पितृ विसर्जन के दिन अमावस्या मध्याह्न काल में होगी
आज गरीबों को करायें भोजन
विसर्जन का शाब्दिक अर्थ है पूर्ण होना, समापन या अंत. इसी प्रकार पितृ विसर्जन मूलत: पितृ पक्ष की समापन बेला है. मान्यता है कि पितृपक्ष में पितृ धरा पर उतरते हैं और पितृ विसर्जन यानि श्राद्ध पक्ष की अमावस्या को पितृ हमसे विदा हो जाते हैं. मान्यता है कि इस दिन गरीबों को भोजन कराने, उन्हें वस्त्र का दान करने से पुण्य मिलता है. मान्यता है कि जो अपने अस्तित्व को सम्मान देकर पितृ को प्रतीक स्वरूप अन्न, जल प्रदान करता है.
उससे प्रसन्न होकर पितृ सहर्ष शुभाशीष प्रदान कर अपने लोक में लौट जाते हैं.
अमावस्या को करें पितृ विसर्जन
आचार्य सुशीलचंद्र शास्त्री बताते हैं कि परिजनों और पूर्वजों के देह त्याग की तिथि ज्ञात न होने पर या ज्ञात तिथि पर किसी अपरिहार्य कारणों से श्राद्ध न हो पाने, अमावस्या यानी पितृ विसर्जन के दिन श्राद्ध का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में प्राप्त होता है. यूं तो पितृ से सामान्य आशय पैतृक यानी पिता या उसके परिवार से माना जाता है. यदि कोई अपने नाना-नानी का श्राद्ध करना चाहता है, तो यह क्रिया अमावस्या यानी पितृ विसर्जन के दिन की जा सकती है.
20 सितंबर को ही पितृ विसर्जन करें. इस दिन 11 बज कर 51 मिनट तक पूरा करें. इस दिन शाम को दक्षिण दिशा की ओर तेल का दीपक जलाएं.
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