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स्कूलों में डिस्लेक्सियाग्रस्त बच्चों के लिए होगी विशेष कक्षा

Updated at : 10 Nov 2024 11:09 PM (IST)
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स्कूलों में डिस्लेक्सियाग्रस्त बच्चों के लिए होगी विशेष कक्षा

बच्चों की परवरिश करके उन्हें एक बेहतर नागरिक बनाना एक बड़ी जिम्मेदारी है. यह जिम्मेदारी तब और चुनौतीपूर्ण हो जाती है जब बच्चों को कुछ अनोखी समस्याओं से जूझना हो

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प्रकाश कुमार, समस्तीपुर : बच्चों की परवरिश करके उन्हें एक बेहतर नागरिक बनाना एक बड़ी जिम्मेदारी है. यह जिम्मेदारी तब और चुनौतीपूर्ण हो जाती है जब बच्चों को कुछ अनोखी समस्याओं से जूझना हो. डिस्लेक्सिया एक ऐसी ही चुनौती है. यह एक किस्म की लर्निंग डिसऑर्डर है और इससे ग्रस्त बच्चे को दूसरे बच्चों की तरह भाषा या चिन्हों को पढ़ने, समझने और याद करने में दिक्कत होती है और वे परीक्षाओं में बाकी बच्चों से पिछड़ जाते हैं. विभिन्न स्कूलों में नामांकित ऐसे बच्चे चिन्हित किए जायेंगे, जो वर्ग कक्ष में उपस्थित तो रहते है. लेकिन, बच्चों को पढ़ने और लिखने में परेशानी होती है. अब जिले के स्कूलों में डिस्लेक्सिया ग्रस्त बच्चों के लिए विशेष कक्षाएं होंगी. जिला में 1.4 प्रतिशत बच्चे इससे ग्रसित हैं. एनसीईआरटी और एससीईआरटी ने विषयवार डिजाइन तैयार किया है. इन बच्चों के लिए गणित, अंग्रेजी, हिंदी, साइंस, सोशल साइंस विषय में कक्षाएं कैसे सुलभ हों, इसको लेकर यह डिजाइन तैयार किया गया है. डीपीओ एसएसए मानवेंद्र कुमार राय ने कहा कि जिले में ऐसे छात्रों को चिह्नित किया जायेगा. छात्रों को पढ़ाई करने में परेशानी हो, ऐसे छात्रों का की जांच शिक्षक जरूर करें. इन छात्रों की देखभाल डे -केयर सेंटर में किया जायेगा. जिले के सीबीएसई स्कूलों में इन बच्चों को कैसे पढ़ायेंगे. सीबीएसई सहित सरकारी स्कूलों ने सभी स्कूलों को इसे लेकर निर्देश दिया है. सभी स्कूल निदेशक से कहा गया है कि विषयवार शिक्षकों का इस ट्रेनिंग में भाग लेना अनिवार्य है. जिला कार्यक्रम अधिकारी को इसे लेकर चेन्नई में प्रशिक्षण भी दी गई थी. अब जिले के सरकारी स्कूल के शिक्षकों को अलग-अलग विषय के लिए ट्रेनिंग होगी. पहले दिन इन बच्चों को कक्षा में पहचानने की समझ पर ट्रेनिंग होगी. इस माह में गणित के लिए डिस्लेक्सिया सुलभ कक्षा पर ट्रेनिंग होगी. बच्चे अपनी गति से सीखते और विकसित होते हैं और पढ़ना अन्य कौशल निर्माण से अलग नहीं है. बच्चों के लिए एक समय या किसी अन्य समय पर पढ़ना चुनौतीपूर्ण होना आम बात है. लेकिन, अगर पढ़ना सीखना एक सतत संघर्ष बन जाता है, जो बच्चे को अपने साथियों से पीछे छोड़ देता है, तो संभव है कि उन्हें डिस्लेक्सिया नामक एक सीखने संबंधी विकार हो. डिस्लेक्सिया ग्रस्त बच्चों को सीखने-समझने में कठिनाई होती है. पढ़ने में दिक्कत, लिखने और वर्तनी की समस्याएं होती हैं. बच्चे सीधे अक्षर को उल्टा लिखते हैं. ऐसे बच्चों को बोलने, भाषा, पढ़ने, स्पेलिंग, गणित, शब्द या अंक की सही तरह से पहचान करने में थोड़ी परेशानी का सामना करना पड़ता है. हालांकि, डिस्लेक्सिया कोई बीमारी नहीं है, बल्कि ये छात्र सिर्फ कुछ मामलों में ही पीछे होते हैं.

डिस्लेक्सिया छोटी उम्र में ही प्रकट होना शुरू हो सकता है

चिकित्सक एके आदित्य बताते हैं कि यह अनुमान लगाया गया है कि पांच में से एक बच्चे को डिस्लेक्सिया है. सीखने संबंधी विकार वाले 80 से 90 प्रतिशत बच्चे इससे पीड़ित हैं. डिस्लेक्सिया छोटी उम्र में ही प्रकट होना शुरू हो सकता है. डिसलेक्सिया एक सीखने की क्षमता से संबंधी दोष होता है, जो किसी व्यक्ति की मौखिक और लिखित भाषा को प्रभावित करती है. इससे उसे शब्दों और या अंकों को समझने या पढ़ने में कठिनाई होती है. इस स्थिति के कारण विशेष रूप से छोटे बच्चों के लिए स्कूल के एक सामान्य शैक्षणिक वातावरण में निर्देशों का पालन करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है. समस्तीपुर कॉलेज समस्तीपुर के मनोविज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डाॅ. रीता चौहान बताती हैं कि डिस्लेक्सिया एक मानसिक विकार है. बच्चे इस विकार से अधिक शिकार होते हैं. इस स्थिति में बच्चे को पढ़ने, लिखने और समझने में कठिनाई होती है. कई मौके पर लिखावट धुंधली दिखती है. बोलने में भी दिक्कत होती है. लर्निंग डिसऑर्डर मुख्यत: तीन तरह का होता है. डिस्लेक्सिया, डिस्ग्राफिया और डिस्कैलकुलिया. डिस्लेक्सिया में बच्चे को शब्दों को पढ़ने में दिक्कत होती है. डिस्ग्राफिया में बच्चा ठीक से लिख नहीं पाता. डिस्कैलकुलिया में उसे गणित में दिक्कत आती है. शिक्षा प्रणाली में इससे जुड़े बदलाव जरूरी हैं, जैसे महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश बोर्ड ने दसवीं तक गणित, विज्ञान जैसे तार्किक विषय जो जरूरी थे, उन्हें ऑप्शनल कर दिया है. बच्चा इनकी जगह अपनी रुचि के विषय ले सकता है. जिन बच्चों को लिखने में दिक्कत है, उनके लिए ऐसे स्पेशल की बोर्ड आ गये हैं. जो उन्हें लिखने में मदद करते हैं. सीबीएसई बोर्ड में ऐसे बच्चों की देखभाल के लिए शैडो टीचर्स का प्रावधान है, क्योंकि सामान्य टीचर बाकी बच्चों के साथ इन पर पूरा ध्यान नहीं दे पाते. भारत सरकार ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 में भी लर्निंग डिसएबिलिटी को शामिल किया गया है. इससे इन बच्चों को वे सहूलियतें मिलने लगी हैं, जो दिव्यांगों को मिलती थीं.

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