अब तो जो बाजार चाहता है, शायरों को लिखना पड़ता है : राहत इंदौरी

अब तो जो बाजार चाहता है, शायरों को लिखना पड़ता है : राहत इंदौरीराहत इंदौरीफोटो : मनोजसंजीव/गजनफर, भागलपुरमशहूर शायर और हिंदी फिल्मों के गीतकार डॉ राहत इंदौरी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. रविवार को भागलपुर के टाउन हॉल और सोमवार को पूर्णिया के कला भवन में प्रभात खबर की ओर से आयोजित शाम-ए-महफिल में […]
अब तो जो बाजार चाहता है, शायरों को लिखना पड़ता है : राहत इंदौरीराहत इंदौरीफोटो : मनोजसंजीव/गजनफर, भागलपुरमशहूर शायर और हिंदी फिल्मों के गीतकार डॉ राहत इंदौरी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. रविवार को भागलपुर के टाउन हॉल और सोमवार को पूर्णिया के कला भवन में प्रभात खबर की ओर से आयोजित शाम-ए-महफिल में लोग उनके शेर पर बस वाह-वाह ही करते रहे. ऐसा हो भी क्यों नहीं, उनके शब्दों की जादूगरी सीधे दिल में दस्तक जो दे रही थी. दुनिया के कई मुल्कों में जिनकी शायरी धूम मचा चुकी हो, फिल्मों के लिए लिखे जिनके गीत लोग गुनगुनाये बिना न रह सके, उनसे सोमवार को भागलपुर के एक होटल में प्रभात खबर की खास बातचीत हुई. पेश है बातचीत के मुख्य अंश :सवाल : कार्यक्रमों को लेकर आपकी व्यस्तता तो काफी होती है. फिर छोटे शहरों में आयोजित कार्यक्रमों के लिए वक्त कैसे निकाल लेते हैं.जवाब : छोटे शहरों में भी बड़े अच्छे लोग रहते हैं. वो रचनाएं जो आमतौर पर सुना नहीं पाता हूं, उन्हें सुनाने के मौके ऐसे कार्यक्रमों में मिलते हैं. मैं आमतौर पर कोशिश करता हूं कि छोटे-बड़े सभी शहरों में जाऊं.सवाल : आपकी पहचान विश्व के कई मुल्कों में है. ऐसे में नयी पीढ़ी में ऐसा कोई दिख रहा है, जो आपकी राह पर हो. युवाओं में शेरो-शायरी का कितना आकर्षण है.जवाब : जब आइआइटी व बड़े संस्थानों में जाता हूं, तो हजारों बच्चे शायरी के नाम पर तालियां बजाते हैं, तो खुशी होती है. बिहार में उर्दू शायरी व साहित्य पर जिस तरह काम हो रहा है, वह मिसाल है. कहीं भाषा पर सवाल उठता है तो समझिये कि यह सियासी मामला है. भाषा खत्म करने के पीछे सियासी लोग होते हैं या फिर वे होते हैं, जिन्हें ऐसा करने से लाभ हो. अब फिक्सन, आलोचनाएं खूब लिख रहे हैं बच्चे. हमारे बच्चे दूसरी विधाओं पर भी काम कर रहे हैं. लेकिन हमारी पीढ़ियां तो अब खत्म हो रही हैं.सवाल : शुरुआती और आज के दौर में क्या अंतर पाते हैं.जवाब : तहजीब का मुशायरा हर 10 साल पर बदलता जा रहा है. पहले मुशायरे में मैं पांचवीं कतार में बैठता था. इससे पहले की कतार में कई बड़े नाम थे. हम आगे इसलिए आ गये कि इन कतारों में बैठनेवाले अब इस दुनिया में रहे नहीं. तब जो पहली कतारों में बैठनेवाले थे, उनलोगों द्वारा रची गयी रचनाओं की कोई सानी नहीं है. आज हमें बहुत ही सोच कर लिखना पड़ता है. हमें यह सोचना पड़ता है कि हम क्या लिखें, जो आज के युवा समझ सकें. सवाल : आप एक बेहतरीन चित्रकार हुआ करते थे. ऐसे में आप शायरी की धारा में कैसे बह गये.जवाब : मेरे ख्याल से कैनवास पर ब्रश चलानेवाला कलाकार और कागज पर शायरी लिखनेवाला शायर दोनों मेरे अंदर एक साथ चलता है. इनमें शायरी लिखनेवाला शायर आगे बढ़ जाता है. फिर भी कैनवास पर जो करना चाहता था, वह कागज पर कर ही रहा हूं. सवाल : पहले चित्रकार, फिर शायर और फिर हिंदी फिल्मों से रिश्ता. इस पूरे दौर को बताना चाहेंगे.जवाब : एक बार गुलशन कुमार जी ने मुझे बुलाया था. शब्दों की अहमियत देखिए कि गुलशन जी ने इसलिए बुलाया कि उनकी एक फिल्म शबनम के लिए मेरी एक गजल फिट बैठती थी. वो गजल थी-‘झील अच्छा है, कमल अच्छा है, जाम अच्छा है, तेरी आंखों के लिए कौन सा नाम अच्छा है’. बाद में अनु मलिक को मेरे गानों की फाइल हाथ लग गयी, तो संपर्क किया. मुंबई गया. वहां महेश भट्ट से मुलाकात हुई. उनके अनुरोध पर सर फिल्म के लिए गीत लिखा-‘आज हमने प्यार का किस्सा तमाम कर दिया, तुम भी पागल हो गये, हमको भी पागल कर दिया’. इस तरह से फिल्मों से रिश्ता जुड़ता गया. सवाल : हिंदी सिनेमा के गीतों में अब वो शब्द कहां खो गये.जवाब : हिंदी सिनेमा के गीतों में अब शब्द नहीं रहे. पहले तीन महीने तक एक ही गाने के धुन बनाने पर काम होता था. उन गानों को हम आज भी सुनते हैं, तो अच्छा लगता है. अब तो सुबह बात होती है. संगीतकार धुन सुनाते हैं. शाम पांच बजे तक उन्हें गीतकार गीत लिख कर दे देते हैं. चार घंटे में गीत बनते हैं और एक सप्ताह में वह गीत बाजार से उतर भी जाता है. अब तो ढिन टिका ढिन टिका हिट होता है, तो कोई शायर को क्यों पूछे. और बाजार का भी असर है. जो बाजार चाहता है वह शायरों को लिखना होता है. पहले गीत कहानी का हिस्सा होता था. अब गीतों का कहानी से ताल्लुक नहीं होता. जो काम शाहिर लुधियानवी, शैलेंद्र, मजरूह सुलतानपुरी और आनंद बख्शी सरीखे लोग कर गये, वो अब नहीं होंगे.सवाल : संभवत: कराची में एक बार अाप शूटआउट में बाल-बाल बचे थे. क्या थी वह घटना.जवाब : नहीं-नहीं. ऐसा नहीं हुआ था. चार-पांच साल पहले की बात रही होगी. हुआ यह था कि कराची में एक कार्यक्रम में गया था. जिस मैदान में मुशायरा में भारी भीड़ हुआ करती थी, वहां बहुत ही कम लोग दिखे. मैंने वहां के दोस्तों से पूछा कि भाई ऐसा क्यों हुआ. उनका कहना था कि राहत साहब, दरअसल कल रात यहां कुछ ज्यादा गोलीबारी हो गयी थी. उनके कहने का मतलब यही रहा होगा कि यहां अक्सर गोलीबारी होती रहती है.सवाल : उर्दू की शिक्षा पाने से बच्चे दूर क्यों होते जा रहे हैं. क्या वजह है.जवाब : मैं प्रोफेसर रहा हूं. मुझे इल्म है. बच्चे सोचते हैं कि उर्दू से पीजी, पीएचडी करेंगे, तो उससे क्या होगा. यह स्थिति तकरीबन हर भारतीय भाषा के साथ है. इसलिए हमारे बच्चे भाषा से दूर होते जा रहे हैं. पॉलिसी बनानेवाले को भाषा से जीवन-यापन के साथ रिश्ता बनाना चाहिए. उन्हें सोचना चाहिए कि कोई सिंधी, उर्दू, हिंदी पढ़ेगा, तो फिर क्या करेगा. यूपी में एक बार 50 हजार वेकेंसी आयी. इसमें शर्त थी कि आवेदन करनेवालों को उर्दू आनी जरूरी है. इसके बाद हजारों बच्चों ने (गैर मुसलिम भी) उर्दू सीखी. ऐसी पहल हर जगह हो. सवाल : भागलपुर तो आप पहले भी आ चुके हैं. शहर के बारे में क्या सोचते हैं आप.जवाब : हां…भागलपुर तो पहले भी आया हूं. मैंने जब सबसे पहले भागलपुर का नाम सुना था तो बहुत ही खतरनाक फसाद के बाद. लेकिन अब भागलपुर को यहां के बौद्धिक व जहीन लोगों के लिए जानता हूं, जो कविता और शेरो-शायरी के प्रेमी हैं. अब तो इस शहर को मैं शायरी के जरिये ही जानता हूं. सवाल : अपने देश को किस नजरिये से देखते हैं और फिलहाल कहां पाते हैं. युवाओं को देश के लिए क्या करना चाहिए.जवाब : मुल्क हमारा मुहब्बतों का मुल्क है. यहां की हवा में दुश्मनी ज्यादा दिनों तक पल नहीं सकती. यहां मुहब्बतों की हवाएं बहती रहे, इसे बहाने का काम करें युवा.सवाल : आप जब शायरी पढ़ रहे होते हैं, तो सुननेवालों को लगता है जैसे एक शब्द चलते दिल का दरवाजा खोलते हैं और फटाक से दिल के अंदर घुस जाते हैं. यह अंदाजे बयां कहां से आया.जवाब : मैं पहले तरन्नुम पढ़ता था. लोग पसंद करते थे. एक बार बगैर तरन्नुम पढ़ा, तो लोगों ने और भी पसंद किया. इसके बाद बगैर तरन्नुम ही पढ़ने लगा. शायरी में फूल का मतलब फूल ही नहीं होता, तलवार का मतलब तलवार ही नहीं होता. शब्दों का सही अर्थ अंदाजे बयां में लाने की कोशिश करता हूं.
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