उग्रतारा महोत्सव में अनोखा हुआ मिथिला संस्कृति पर आख्यान

Published at :15 Dec 2015 8:07 PM (IST)
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उग्रतारा महोत्सव में अनोखा हुआ मिथिला संस्कृति पर आख्यान

महिषी / सहरसा : बुद्ध व वशिष्ठ की आराध्या तथा सनातन व बौद्ध धर्म की समन्वित प्रतिमूर्ति उग्रतारा सांस्कृतिक महोत्सव-2015 में पर्यटन मंत्रालय व जिला प्रशासन द्वारा आयोजित सेमिनार में मिथिलांचल सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों से आमंत्रित व आगंतुक विद्वानों ने कोसी, मिथिला की लोक -संस्कृति व भारती मंडन पुरातात्विक धरोहर विषय पर अपने […]

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महिषी / सहरसा : बुद्ध व वशिष्ठ की आराध्या तथा सनातन व बौद्ध धर्म की समन्वित प्रतिमूर्ति उग्रतारा सांस्कृतिक महोत्सव-2015 में पर्यटन मंत्रालय व जिला प्रशासन द्वारा आयोजित सेमिनार में मिथिलांचल सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों से आमंत्रित व आगंतुक विद्वानों ने कोसी, मिथिला की लोक -संस्कृति व भारती मंडन पुरातात्विक धरोहर विषय पर अपने आख्यानों से आमजनों को मिथिला संस्कृति, द्वेत व अद्वैत वेदांत सहित अन्य विधाओं पर विस्तृत चर्चा की.

मालूम हो कि पर्यटन मंत्रालय द्वारा आयोजित एक मात्र उग्रतारा महोत्सव में सेमिनार का आयोजन होता है व मंडन की धरती पर शस्त्र व अस्त्र से परे विद्वतजन शास्त्रार्थ कर अपनी विचारधाराओं को समेकित करने का प्रयास करते हैं. प्रमंडलीय आयुक्त टीएन बिन्धेश्वरी की उपस्थिति व जिलाधिकारी विनोद सिंह गुंजियाल के सानिध्य में विभिन्न वक्ताओं ने नारी शक्ति, मिथिला व मैथिली सभ्यता पर अपने मंतव्य दिये. आयुक्त श्रीमती बिन्धेश्वरी ने मैथिली भाषा को अतिप्रिय बताते सांसकृतिक रक्षा के लिए संस्कृत के ज्ञान अर्जन को आवश्यक बताया.

डीएम श्री गुंजियाल ने अपने संबोधन में कहा कि जिलाधिकारी की प्रतिनियुक्ति के प्रथम आगमन में ही स्थानीय आध्यात्मिक व सांस्कृतिक विरासत का आभास हुआ. पौराणिक संस्कृति को अक्षुण्ण रखने में हम सबों की भागीदारी अपेक्षित है. विजय प्रकाश की अध्यक्षता में संचालित सेमिनार में अध्यक्ष श्री प्रकाश ने कहा कि मंडन एक परंपरा है व महिषी ज्ञानपीठ. आज भी मिथिला में वेद व पटना में गणित ज्ञान की परंपरा चालू है. अध्यात्म व दर्शन की भूमि उग्रतारा मंदिर व मंडनधाम आज भी आराध्य व नमनीय है. मंडन की पत्नी विदुषी भारती को शास्त्रार्थ का न्यायाधीश बताया जाना तत्कालीन नारी सशक्तिकरण का परिचायक है.
मिथिला में न्याय सर्वोपरि है. शस्त्र-अस्त्र की परंपरा को छोड़ शास्त्रार्थ की परंपरा से ही समाज कल्याण संभव है. विभिन्न वक्ताओं ने कहा कि वाद-विवाद न्यायालय का मामला होता है शास्त्रार्थ से विद्वानों में मध्यस्थता होती है. मिथिला में भामति (वाचस्पति की पत्नी), गार्गी (याज्ञवलक्य की पत्नी) सहित कई धर्म विदुषी हुई, जिन्होंने समाज को निष्पक्ष होकर सहिष्णुता का पाठ पढ़ाया. मंडन-शंकर में मतांतर था लेकिन कभी सैनिक युद्ध नहीं हुआ. वार्ता व तर्क से स्वयं को श्रेष्ठ बताना ही वास्तविक शास्त्रार्थ है.

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