जीने की आस छोड़ चुका था पूरा परिवार

Published at :04 May 2015 12:09 PM (IST)
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जीने की आस छोड़ चुका था पूरा परिवार

सहरसा सदर : 25 अप्रैल को नेपाल के काठमांडू में आये भयंकर भूकंप की त्रसदी ङोलने के बाद जिले के कायस्थ टोला निवासी शशि शंकर प्रसाद अपनी पत्नी व पुत्र-पुत्री के साथ शनिवार की शाम अपने घर लौट आये. अपनी आंखों के आगे भूकंप के तेज झटके के बीच घरों को हिलते व ध्वस्त होते […]

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सहरसा सदर : 25 अप्रैल को नेपाल के काठमांडू में आये भयंकर भूकंप की त्रसदी ङोलने के बाद जिले के कायस्थ टोला निवासी शशि शंकर प्रसाद अपनी पत्नी व पुत्र-पुत्री के साथ शनिवार की शाम अपने घर लौट आये. अपनी आंखों के आगे भूकंप के तेज झटके के बीच घरों को हिलते व ध्वस्त होते देखने के बाद अपने जीने की आस छोड़ चुका शशि शंकर प्रसाद व उनका परिवार उस खौफनाक मंजर को याद कर अभी भी सिहर उठता है.

अपनी व अपने परिवार की जिंदगी कितनी कीमती होती है, पहली बार इस मंजर को एहसास करने के बाद उनका परिवार आपबीती कहते-कहते रोने लगता है. नेपाल के काठमांडू में शनिवार को आये प्रलयंकारी भूकंप का मंजर बयां करते नेपाल के राजबिराज महेन्द्र बिन्देश्वरी बहुमुखी कैंपस में रसायनशास्त्र के रीडर के रूप में कार्यरत शशि शंकर प्रसाद ने बताया कि वे, उनकी पत्नी शिल्पी कुमारी, नौ वर्षीय पुत्र संकल्प, 11 वर्षीय पुत्री शेफाली व पटना से आये साढ़ू ललित कुमार सिन्हा, उनकी पत्नी प्रीति कुमारी, उनकी 15 वर्षीया पुत्री सृजन, 11 वर्षीय आकृति व नौ वर्षीय पुत्र आदित्य व उनकी सास 65 वर्षीय मंजू सिन्हा भी उनके साथ काठमांडू घूमने गये थे. भूकंप में वे सभी काठमांडू में रहने वाले शशि शंकर प्रसाद के मित्र पवन कुमार कर्ण के घर में फंसे हुए थे. राजबिराज से एक साथ सभी 22 अप्रैल को काठमांडू के पशुपति नाथ मंदिर दर्शन के लिए गये हुए थे.
पशुपतिनाथ मंदिर में पूजा करने के बाद वे एक होटल में ठहरे. शनिवार को सभी काठमांडू क्षेत्र के ही जोड़पाटी नया बस्ती कृष्ण मंदिर में भगवान के दर्शन के लिए गये थे. वहां से वापस लौटने के क्रम में जोड़पाटी नया बस्ती में ही मित्र के घर रुक गये. शशि शंकर प्रसाद ने कहा कि भूकंप के दिन 11 बजे वापस लौटने के बाद सभी बच्चे जमीन पर नीचे भोजन के लिए बैठे थे और वे और उनके साढ़ू पलंग पर बैठ बातचीत कर रहे थे. उन्होंने बताया कि 11 बज कर 56 मिनट पर एकाएक भूकंप के जोरदार झटके का एहसास हुआ. इस दौरान पलंग व घर हिल रहा था. बच्चों के लिए जमीन पर लगी खाने की थाली इधर-उधर सरक रही थी. भूकंप का एहसास होते ही अपने शिक्षक मित्र पवन कुमार के पुत्र को लेकर फस्र्ट फ्लोर से परिवार सहित नीचे उतरने का प्रयास किया, लेकिन सीढ़ी व घर के तेज कंपन व हिलने से नीचे नहीं उतर पाये. उन्होंने कहा कि ढ़ाई से तीन मिनट तक भूकंप का तेज झटका महसूस करने के बाद परिवार के सभी लोग एक पल के लिए जीने की आस छोड़ एक-दूसरे से लिपट गये. भूकंप का पहला झटका स्थिर होने के बाद सभी लोग मकान से बाहर निकल खुले मैदान में आ गये. पीड़ित ने बताया कि भूकंप के रोज तेज झटके के बाद साढ़े चार बजे संध्या तक खुले मैदान में 68 भूकंप का झटका उनलोगों ने झेला.
शनिवार को पूरे परिवार ने बिस्किट व मुरही खाकर दिन व रात बिताया. पीड़ित की पत्नी शिल्पी कुमारी ने बताया कि तीन रात वे लोग सो नहीं पाये. भूकंप की मार के बाद तेज बारिश के कारण बढ़ी ठंड ने भी पीड़ितों को काफी सताया. उन्होंने बताया कि मित्र पवन कुमार के पड़ोसी दयाराम श्रेष्ठ ने उनलोगों के लिए खाने से लेकर गरम कपड़े, पानी व दूध तक का व्यवस्था कर काफी सहयोग किया. 28 अप्रैल को काठमांडू से प्राइवेट बस पकड़ उनके साथ उनका परिवार राजबिराज पहुंचा, फिर वहां से दो मई को बस पकड़ रात में सहरसा स्थित अपना घर पहुंच भूकंप की त्रसदी से बच निकलने पर ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया. 25 अप्रैल की उस मनहूस शनिवार को सभी भुला नहीं पा रहे हैं. शशि शंकर प्रसाद ने बताया कि काठमांडू के कई इलाके ऐसे हैं, जहां आवागमन की सुविधा सही नहीं है. अभी भी सिंधुपाल चौक जिला जैसे क्षेत्रों में सरकार द्वारा राहत व बचाव कार्य शुरू नहीं हो पाया है. इन क्षेत्रों में शत-प्रतिशत घरों की तबाही व लोगों के मौत की मंजर को देख अब महामारी की आशंका है.
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