सरकारी जमीन पर बसा दो, तो छोड़ देंगे रैयती जमीन

Published at :16 Jul 2013 1:55 PM (IST)
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सरकारी जमीन पर बसा दो, तो छोड़ देंगे रैयती जमीन

* प्रशासन का प्रयास विफल, चौथे दिन भी आदिवासियों ने बरकरार रखा कब्जा, कहासहरसा / सत्तरकटैया : बुधवार को चौथे दिन भी बरहशेर पंचायत के कुम्हरा घाट स्थित रैयती जमीन पर आदिवासियों का कब्जा बरकरार रहा. प्रशासनिक दबाव का एक परिणाम यह रहा कि बाहरी जिले से आये आदिवासी बुधवार को नदारद दिखे. लेकिन निजी […]

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* प्रशासन का प्रयास विफल, चौथे दिन भी आदिवासियों ने बरकरार रखा कब्जा, कहा
सहरसा / सत्तरकटैया : बुधवार को चौथे दिन भी बरहशेर पंचायत के कुम्हरा घाट स्थित रैयती जमीन पर आदिवासियों का कब्जा बरकरार रहा. प्रशासनिक दबाव का एक परिणाम यह रहा कि बाहरी जिले से आये आदिवासी बुधवार को नदारद दिखे.

लेकिन निजी जमीन पर कब्जा करने वाले आदिवासी समाज के स्थानीय लोगों ने घाट के पार अपनी पूर्व की जमीन की समस्या सुना सरकार से नयी जगह बसाने की मांग पर अड़े थे. मंगलवार की शाम बिहरा थाना में प्रशासन के अधिकारी व जनप्रतिनिधियों की हुई बैठक में वर्तमान एवं पूर्व मुखिया को जबरन कब्जा किये आदिवासियों से वार्ता कर जमीन खाली कराने की बात कही गयी थी.

प्रशासनिक आदेश के आलोक में बुधवार को बरहशेर पंचायत के मुखिया मनोरंजन पांडेय व सरपंच कृष्ण दयाल यादव व उप सरपंच नंद किशोर यादव ने कब्जा वाली जमीन पर पहुंच आदिवासियों को समझा-बुझा जमीन खाली करने को कहा. लेकिन वहां झोपड़ी डाले लोगों ने पहले स्थायी रूप से बसने के लिए सरकारी जमीन का बासगीत परचा सहित अन्य सभी सुविधा देने की मांग की. वहां बसे अधिकतर आदिवासियों ने कहा कि वे धेमरा नदी के पार दशकों से बसे हुए हैं.

पानी बढ़ जाने के कारण उनका घर या तो कट चुका है या उनके घर में पानी घुस गया है. उनका कहना था कि वर्षो से वहां बसे होने के बाद भी उन्हें किसी तरह की सुविधा नहीं मिल रही है. नदी पार करने के लिए नाव की व्यवस्था नहीं है. कई आदिवासियों ने अपने नाम से बने लाल व पीले कार्ड को दिखाते कहा कि उन्हें राशन नहीं मिल रहा है, जबकि कई अन्य ने बीपीएल की सूची में नाम तक नहीं जोड़े जाने की शिकायत की. आदिवासियों की दूसरी सबसे बड़ी समस्या उनका बढ़ता परिवार है.

तारणी तुरहा ने बताया कि उनके परिवार में आठ पुत्र हैं, सभी बड़े हो गये है. सबको अलग घर चाहिए. एक ही घर में रहना संभव नहीं हो पा रहा है. आदिवासी समाज की गीता देवी ने भी यही समस्या गिनाते कहा कि कुम्हरा घाट के पास का डीह परिवार के हिसाब से छोटा पड़ गया है. गीता ने कहा कि वोट के लिए उनका नाम वोटर लिस्ट में तो डाल दिया गया है.

राशन कार्ड भी बना दिया गया है, लेकिन न तो परचा दिया गया है और न ही इंदिरा आवास योजना का लाभ. पंकू देवी कहती हैं कि उसका जन्म यहीं हुआ है, उसकी पांच बेटे-बेटियां है. सबकी शादी हो गयी है. एक ही घर में बूढ़े-बूढ़ी, बेटी-दामाद व बेटा पतोहू के रहने की नौबत बनी है. वे सभी सरकार से स्थायी रूप से बसने के लिए जमीन मांगते है. उन्हें कहीं बसा कर बासगीत परचा दे दिया जाता है तो वे इस रैयती वाली जमीन से कब्जा हटा लेंगे.

इधर प्रशासन के आदेश पर आदिवासियों से वार्ता करने पहुंचे मुखिया मनोरंजन पांडेय ने कहा कि जांच के क्रम में रैयती जमीन पर कब्जा करने वालों में से कई लोगों ने लाल-पीले सहित वोटर कार्ड दिखाया है. वोटर लिस्ट व बीपीएल सूची से मिलान कर इनकी वास्तविकता की जानकारी जिला प्रशासन को दी जायेगी. हालांकि मुखिया की पहल के बाद भी आदिवासियों ने जमीन खाली करने से इनकार कर दिया.

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