पटाखों का शोर, मत कहना वंस मोर

Updated at : 13 Oct 2017 1:58 PM (IST)
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पटाखों का शोर, मत कहना वंस मोर

सहरसा : दीपावली व आतिशबाजी करने की परंपरा पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचा रही है. लक्ष्मी पूजन के बाद शगुन के रूप में फोड़े जाने वाले पटाखे अब हमारी ही मौत का सामान बनते जा रहे हैं. हवा में जहर घोलते ये पटाखे कई प्रकार की शारीरिक व मानसिक बीमारियों को जन्म दे रहे हैं. […]

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सहरसा : दीपावली व आतिशबाजी करने की परंपरा पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचा रही है. लक्ष्मी पूजन के बाद शगुन के रूप में फोड़े जाने वाले पटाखे अब हमारी ही मौत का सामान बनते जा रहे हैं. हवा में जहर घोलते ये पटाखे कई प्रकार की शारीरिक व मानसिक बीमारियों को जन्म दे रहे हैं. पटाखों की धमक हमारे चेहरे पर जरूर मुस्कान लाती है, पर यह हमारे भविष्य की बर्बादी का संकेत है. इसका आभास हमें उस वक्त नहीं होता, जब हम पटाखों की रोशनी में खो जाते हैं.
आजकल के युवा पटाखे खरीदते समय उसकी तीखे शोर व प्रकाश पर ध्यान देते हैं. पटाखे के रूप में हम पैसों की बर्बादी व जान को जोखिम में डालने का पूरा सामान खुशी-खुशी घर लाते हैं. इस प्रकार के खतरनाक सामान से स्वयं व परिवार को बचाने में अपना योगदान दे.
बीमारियों को न्योता
पटाखे जब जलते हैं और तेज धमाके के साथ फूटते हैं तो हममें से हर किसी के चेहरे पर मुस्कुराहट छा जाती है. उस वक्त हम भूल जाते हैं कि इन पटाखों के काले धुएं व शोर का हमारे शरीर पर क्या दुष्प्रभाव पड़ेगा. जब पटाखे जलते व फूटते हैं तो उससे वायु में सल्फर डाइअॉक्साइड व नाइट्रोजन डाइअॉक्साइड आदि गैसों की मात्रा बढ़ जाती है. ये हमारे शरीर के लिए नुकसानदेह होते हैं. पटाखों के धुएं से अस्थमा व अन्य फेफड़े संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.
दिल्ली के हादसों से सबक ले करें बहिष्कार
बीते साल दिल्ली में आतिशबाजी के कारण संपूर्ण डिल्ली सहित एनसीआर का इलाका ऐसा दुष्प्रभावित हुआ था कि अगले पांच-सात दिनों तक सूर्य की रोशनी जमीन तक नहीं आ सकी थी. दिन में भी रात सा नजारा बना रहा. लोगों को सांस लेने में काफी परेशानी हो रही थी.
हजारों की संख्या में लोग रोज अस्पताल पहुंच रहे थे. स्थिति इतनी बेकाबू हो गई थी कि दिल्ली व एनसीआर के सभी स्कूलों में लगभग 15 दिनों की छुट्टी देनी पड़ी थी. बीते साल की घटना से सबक लेते हुए इस बार सरकार ने वहां आतिशबाजी की बिक्री पर पूरी तरह बैन लगा दिया है.
सरकार ने यह तर्क दिया है कि पर्यावरण संरक्षण उनका प्राथमिक उद्देश्य है. वे किसी भी हाल में इससे समझौता नहीं कर सकते हैं. दीपावली के दौरान सहरसा की भी कमोबेश दिल्ली जैसी ही स्थिति हो जाती है. दिवाली की रात यहां भी लोगों को सांस लेने में तकलीफ होती है. मन भारी हो जाता है. अगले कई दिनों तक सुनने की क्षमता कमजोर हो जाती है. लिहाजा दिल्ली से सबक ले यहां भी लोगों को आतिशबाजी का बहिष्कार करना चाहिए.
पटाखे, हादसों का पर्याय
कोई चीज हमें नुकसान पहुंचा सकती है. यह जानते हुए भी हम उसका उपयोग करते हैं. पटाखे हादसों का पर्याय हैं. हमारी थोड़ी-सी लापरवाही हमारे अमूल्य जीवन को बरबाद कर सकती है. यह जानते हुए भी हम अपने शौक के खातिर हंसते-हंसते अपनी जान को दांव पर लगाते हैं. प्रतिवर्ष दीपावली पर कई लोग पटाखों से जल जाते हैं व कई अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं. अनार, रॉकेट, रस्सी बम आदि धमाकेदार पटाखों के शौकीनों के साथ तो ये हादसे होते ही हैं. उस विध्वंसकारी चीज का आखिर हम क्यों इस्तेमाल करते हैं, जो हमें केवल क्षणिक सुख देती है.
पटाखों की आवाज हमारी श्रवण शक्ति पर भी प्रभाव डालती है. इससे भविष्य में हमारी श्रवण शक्ति कमजोर हो सकती है. आम दिनों में शोर का मानक स्तर दिन में 55 व रात में 45 डेसिबल के लगभग होता है. लेकिन दीपावली आते-आते यह 70 से 90 डेसिबल तक पहुंच जाता है. इतना अधिक शोर हमें बहरा करने के लिए पर्याप्त है. वैसे भी सहरसा शहर में ऊंचा सुनने वालों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है. इएनटी स्पेशलिस्ट डॉक्टरों के यहां बढ़ते मरीजों की संख्या यह बताने के लिए काफी है.
आइए, लें संकल्प
अपने आसपास के बच्चों व परिवार के लोगों को आतिशबाजी के नकारात्मक प्रभाव से अवगत करायें. आतिशबाजी उद्योग में रोजाना मासूम बच्चों की जान जा रही है. पटाखे तत्काल खुशी देने के बहाने वातावरण को दूषित करते हैं.
आप स्कूल कॉलेज में मीठी दिवाली मनाने के लिए बच्चों को जागृत करें. प्रभात खबर में पटाखा के बहिष्कार करने वाले बच्चों की तस्वीर प्रकाशित की जायेगी. पर्यावरण संरक्षण को लेकर शुरू किये गये इस आंदोलन को अपना समर्थन दें. स्कूल हो या मोहल्ला अपने संकल्प को प्रभात खबर खबर के जरिये हमारा इ-मेल: kumarashishin85@gmail.com,व्हाट्सएप : 9431807274 पर साझा करे.)
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