पूर्णिया की फिजा में घुल रही रसीली लीची की मिठास, रोजाना हो रहा पांच लाख का कारोबार
Published by : AKHILESH CHANDRA Updated At : 20 May 2026 5:41 PM
रोजाना हो रहा पांच लाख का कारोबार
अकेले खुश्कीबाग फल मंडी में महज ढाई माह के सीजन में करोड़ों का होता है ट्रांजेक्शन
लगातार 24 घंटे आबाद रहती है लीची की मंडी, नेपाल समेत चार जिलों से आते है खरीदार
पूर्णिया. मौसमी फलों के बीच शहर के बाजारों में रसीली लीची की मिठास घुल रही है. हालांकि अब आम की सुगंध ने भी दस्तक दे दी है पर उसे लीची फिलहाल फीका कर रही है. आलम यह है कि शहर के चौक चौराहों पर भी लीची के मौसमी बाजार आबाद हो गये हैं जबकि खुश्कीबाग मंडी में अभी लीची की बहार आ गयी है. यही वह मंडी है जहां ढाई माह के सीजन में दिन से रात तक कारोबार होता है. यहां कारोबारी रात की नींद की बजाय लीची और मुनाफे की आमद गिनते हैं. खरीदारी के लिए यहां न केवल पूर्णिया और कोशी, बल्कि नेपाल के भी कारोबारी जुटते हैं. इस कारण यहां अहले सुबह से रात तक चहल-पहल बनी रहती है.
गौरतलब है कि लीची का सीजन परवान चढ़ने लगा है और यही कारण है कि शहर में हर तरफ इसके बाजार भी सज गये हैं. मगर, इस सीजन में खुश्कीबाग फल मंडी की अलग रौनक है. यहां रोजाना पूर्णिया और कोशी प्रमंडल के सभी जिलों के फल कारोबारी जुटते हैं और खरीददारी करते हैं. गर्मी के इस सीजन में खुश्कीबाग बहुत खास बन जाता है क्योंकि आम के बाद यहां लीची का बहुत ज्यादा आवक हुआ करता है. वैसे, आम भी इस बाजार में आ चुका है पर बाहरी आवक ही हो रहा है जिसकी सुगंध लीची में दब कर रह गई है. यहां के कारोबारियों की मानें तो इस सीजन में औसतन 40 से 50 टन लीची यहां उतरती है. कारोबारी टुनटुन गुप्ता बताते हैं कि लीची का आवक दूसरे फलों की तरह दसचकिया ट्रक से नहीं होता है. पिकअप वैन जैसी छोटी गाड़ियों से लीची का एराइवल ज्यादा होता है. लीची लदी गाड़ियां रात में आती हैं. यहां लीची के दो दर्जन से अधिक कारोबारी हैं जो सड़क किनारे बने अपने गोदाम में स्टॉक करते हैं और खुदरा विक्रेताओं के हाथों थोड़ा मुनाफा लेकर बेच देते हैं.थाना बिहपुर- पसराहा से लीची का आवक
खुश्कीबाग की इस फल मंडी में किसी दूसरे प्रदेश की लीची का एराइवल नहीं है. मुजफ्फरपुर से भी लीची नहीं आती. फल कारोबारी बलवंत प्रसाद बताते हैं कि यहां नौगछिया, थाना बिहपुर, नारायणपुर, पसराहा आदि इलाकों के अलावा पूर्णिया जिले की सीमाओं से सटे बंगाल के ग्रामीण इलाकों के लीची उत्पादक सीधे पहुंचते हैं. कोई मंझोले ट्रक पर तो कोई बसों की छत पर अपने गांव से खुश्कीबाग तक पहुंचता है. स्थानीय कारोबारियों ने बताया कि इस बार का कारोबार बेहतर है और इस सीजन में बढ़िया बिक्री होगी.लीची खरीदने को पहुंचते हैं नेपाल के कारोबारी
शहर के खुश्कीबाग मंडी में सहरसा, सुपौल, मधेपुरा और अररिया जिले के साथ-साथ नेपाल के कारोबारी भी जुटते हैं. लीची के आढ़ती शैफअली बताते हैं कि नेपाल के खुदरा विक्रेता अमूमन हर रोज रात वाली ट्रेन से यहां पहुंच जाते हैं. यहां से वे सुबह की पहली ट्रेन पकड़कर पहले जोगबनी और फिर नेपाल के रानीबाजार और बिराटनगर पहुंचते हैं. रानीबाजार के विक्रेता मंसूर आलम ने बताया कि उनका घर जोगबनी में है पर वे नेपाल जाकर लीची बेचने का काम करते हैं. उनका कहना है कि यहां खरीदारी के भाव में वे आने-जाने का भाड़ा जोड़ कर प्रति सैकड़ा के हिसाब से बिक्री करते हैं जिसमें बहुत कम मुनाफा होता है पर रोटेशन के कारण व्यवसाय चलता रहता है.खुश्कीबाग में होती है सस्ती खरीदारी
खुश्कीबाग के कटिहार मोड़ पर दिन भर में लीची का खुदरा बाजार सजता है. कटिहार मोड़ से लेकर रेलवे ओवरब्रिज के नीचे और हाट तक सड़क के दोनों तरफ लीची के फुटपाथी स्टॉल सजे होते हैं. खरीदारों का कहना है कि पूरे शहर में खुश्कीबाग ही वह जगह है जहां फल सस्ता मिल जाता है. शहर के अलग-अलग मुहल्लों में रहने वालों को भी पता है कि लीची इसी जगह पर मिलती है जो मुख्यालय की तुलना में सस्ती भी होती है. यही वजह है कि पूरे शहर के लोग यहां लीची की खरीदारी के लिए खास तौर पर पहुंचते हैं. दरअसल, शहर के अन्य बाजारों में खुदरा दुकानदारी करने वाले कारोबारी खुश्कीबाग से ही लीची ले जाते हैं और जगह के हिसाफ से मुनाफा लेकर बेचते हैं. मगर, खुश्कीबाग में होलसेल रेट लगाया जाता है जो अपेक्षाकृत कम होता है.प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
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