देवदूत से कम नहीं सेवा व समर्पण भाव से मरीजों की देखभाल में लगी सिस्टर्स

Published by :AKHILESH CHANDRA
Published at :11 May 2026 9:46 PM (IST)
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देवदूत से कम नहीं सेवा व समर्पण भाव से मरीजों की देखभाल में लगी सिस्टर्स

पूरी दुनिया में मानव सेवा को सबसे बड़ा धर्म कहा गया है और सेवा के मामले में सबसे बड़ा स्थान मां का आता है जो बगैर किसी स्वार्थ के अपने बच्चों का न सिर्फ लालन पालन ही करती हैं बल्कि तमाम उम्र उसके लिए फिक्रमंद रहती हैं.

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मरीज, अस्पताल व चिकित्सक के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी होती हैं सिस्टर्स

अपने घर-परिवार से दूर रहकर मरीजों को अपनी सेवा देने में जुटी रहती हैं

पूर्णिया. पूरी दुनिया में मानव सेवा को सबसे बड़ा धर्म कहा गया है और सेवा के मामले में सबसे बड़ा स्थान मां का आता है जो बगैर किसी स्वार्थ के अपने बच्चों का न सिर्फ लालन पालन ही करती हैं बल्कि तमाम उम्र उसके लिए फिक्रमंद रहती हैं. यही कार्य जब किसी अन्य व्यक्ति के द्वारा किसी को हासिल होता है तो उसे ईश्वर का आशीर्वाद समझा जाता है. इस तरह की सेवा की कीमत कोई भी नहीं लौटा सकता. ख़ासकर जब कोई बीमार और लाचार हो और उसे देखरेख और दवा की जरूरत हो तो विभिन्न अस्पतालों में एक विशेष पहनावे के साथ बिल्कुल अलग सी दिखने वाली अनेक महिला व युवतियां उनकी सेवा में लगी नजर आती हैं. लोग इन्हें सिस्टर, दीदी और नर्स जैसे नामों से पुकारते हैं और वे सेवा के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव लेकर दिनरात मरीजों की देखभाल में लगी रहती हैं.

ये सिस्टर्स किसी मायने में देवदूत से कम नहीं, लेकिन इनका काम इतना भी आसान नहीं. कब किस तरह के मरीज को किस तरह की जरूरत पड़ जाए उसकी जानकारी के साथ साथ किस वक्त कौन से कदम उठाने हैं इनसब का पल-पल ख्याल इन्हें ही रखना पड़ता है. मरीज, अस्पताल और चिकित्सक के बीच ये एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम करती हैं. कई मरीज इनकी सेवाओं से खुश होकर इन्हें आशीष देते हैं तो कई बगैर इनकी परेशानियों को समझे इनसे उलझ भी पड़ते हैं लेकिन इन सभी खट्टे मीठे अनुभवों के साथ दिन रात मरीजों की सेवा में लगे रहना इन सिस्टर्स की दिनचर्या में शामिल है भले ही ये अपने घर परिवार से सैकड़ो मील दूर मरीजों को अपनी सेवाएं दे रही हों.

जीएमसीएच की सिस्टर्स कई बार हो चुकी हैं सम्मानित

प्रत्येक वर्ष के मई माह की 12 तारीख को चिकित्सा सेवा से जुड़ी उन तमाम सिस्टर्स को उनके मानव सेवा के प्रति समर्पण व योगदान के लिए विशेष तौर पर सम्मान दिए जाने के दिवस के रूप में मनाया जाता है. यह दिवस फ्लोरेंस नाइटिंगेल के जन्मदिवस के रूप में जाना जाता है जिन्होंने नर्स की भूमिका और उनके योगदान को पूरे विश्व पटल पर स्थापित किया था. इस वर्ष का थीम है हमारी नर्सें हमारा भविष्य, सशक्त नर्सें जीवन बचाती हैं. स्थानीय राजकीय चिकित्सा महाविद्यालय व अस्पताल में अपनी सेवाएं दे रहीं कुछ सिस्टर्स को विगत वर्षों में इसी ख़ास दिवस के मौके पर सम्मान भी मिल चुका है इनमें सिस्टर जीशा केजे और सिस्टर रमानम्मा का नाम प्रमुख है इनके कार्य और सेवा भाव को देखते हुए वर्ष 2023 में सिस्टर जीशा केजे को फ्लोरेंस नाईटिंगल अवार्ड तथा सिस्टर रमानम्मा को उसी वर्ष महिला दिवस के मौके पर बेहतरीन सेवा के क्षेत्र में सम्मानित किया गया. वे कहतीं हैं सम्मान मिलने से सभी का उत्साह बढ़ता है तथा और भी जोश के साथ कार्य करने की प्रेरणा मिलती है. जिन्हें सेवा के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान देने के लिए सम्मानित किया गया. इस दिवस के मौके पर जीएमसीएच की कुछ सिस्टर्स ने प्रभात खबर के साथ अपने कुछ अनुभव शेयर किये.

बोलीं सिस्टर्स

पिछले 10 वर्षों से नर्स के रूप में सेवा दे रही हूं पहले सदर अस्पताल और अब मेडिकल कॉलेज. किसी भी लाचार व्यक्ति की सेवा करना अच्छा लगता है. इलाज के लिए यहां सभी तरह के मरीज आते हैं. सभी की चाहत होती है जल्दी ठीक हो जायें और जब वे स्वस्थ होकर जाते हैं तो मन को सुकून मिलता है. सिस्टर अंजलि, जीएमसीएच6 वर्षों से सरकारी अस्पताल में कार्यरत हूं. वार्ड के अलावा मुझे टीकाकरण विभाग में भी सेवा देने का मौक़ा मिला है. गर्भवती माताओं, छोटे और नवजात बच्चों के टीकाकरण में जब सुई लगाने के लिए लोग मुझे ही कहते हैं तो बड़ा अच्छा लगता है. बच्चों का ध्यान बटाते हुए बड़ी सफाई से यह काम करना होता है.

सिस्टर पूजा दास, जीएमसीएच वर्ष 2008 यहां काम करते हुए अनेक रोगियों ठीक होकर जाते देखा है. कई मरीज बेहद खराब स्थिति में इलाज के लिए आते हैं. कई बार परिजनों को काफी कुछ समझाने के बाद भी वे समझने को तैयार ही नहीं होते, कई बार उलझ भी जाते हैं. लेकिन जब मरीज ठीक होकर जाने लगते हैं तो धन्यवाद कहने भी आते हैं.

सिस्टर रीता कुमारी, जीएमसीएच जिला सदर अस्पताल के अतिरिक्त पूर्व प्रखंड के रानीपतरा अस्पताल में भी सेवा देने का मौक़ा मिला है. अमूमन महिलायें अपने स्वास्थ्य के प्रति उदासीन हैं हालांकि अब उनमें भी जागरूकता आई है लेकिन अभी भी महिला मरीजों में रक्त की कमी और पोषण का अभाव दीखता है. इलाज के साथ साथ उन्हें इन सब के लिए समझाना पड़ता है.

सिस्टर कविता सिंह, जीएमसीएच जब कोई परिजन कहते हैं कि मेरे बच्चे को जीवन दान मिला है तो बेहद खुशी मिलती है. खासकर एसएनसीयू से लेकर अब एनआइसीयू तक लगभग प्रीमेच्योर बच्चे एडमिट होते हैं उन सभी पर हमेशा विशेष ध्यान रखना होता है. टीम के साथ उन बच्चों की देखरेख से लेकर उनके अभिभावकों तक से कड़ी बनाकर काम करना होता है.

सिस्टर जीशा केजे, जीएमसीएच वर्ष 2013 से इस पेशे से जुड़ी हुई हूं. पूर्णिया में फिलहाल एक बच्ची जो अब लगभग 6 साल की हो चुकी है वो अपने जन्म के समय मात्र 965 ग्राम की ही थी एसएनसीयू में उसका तीन माह तक लगातार उपचार और रख रखाव किया गया. कुछ स्वस्थ हो जाने के बाद उसे छुट्टी दी गयी. आज भी उसके परिवार के लोग मिलने के बाद शुक्रिया अदा करते हैं तो बेहद सुकून मिलता है.

सिस्टर रचना मंडल, जीएमसीएच

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