समर्थ के नोडल या फिर परीक्षा नियंत्रक, आखिर कौन हैं जिम्मेवार

Published by : Abhishek Bhaskar Updated At : 13 Apr 2026 6:44 PM

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बीते 9 अप्रैल को जब कुलपति प्रो विवेकानंद सिंह जब अपने कक्ष में मौजूद थे, तब उसी वक्त पूर्णिया विवि के परीक्षा नियंत्रक प्रो अमरकांत सिंह और समर्थ के नोडल ऑफिसर डॉ सुमन सागर ने प्रशासनिक भवन में ही प्रेस कांफ्रेंस में इस बात पर अपना-अपना पक्ष रखा कि स्नातक प्रथम सेमेस्टर की परीक्षा के प्रवेश पत्र में गड़बड़ी किस प्रकार हुई.

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पूर्णिया विवि में स्नातक प्रथम सेमेस्टर की परीक्षाएं रद होने का मामला पूर्णिया. बीते 9 अप्रैल को जब कुलपति प्रो विवेकानंद सिंह जब अपने कक्ष में मौजूद थे, तब उसी वक्त पूर्णिया विवि के परीक्षा नियंत्रक प्रो अमरकांत सिंह और समर्थ के नोडल ऑफिसर डॉ सुमन सागर ने प्रशासनिक भवन में ही प्रेस कांफ्रेंस में इस बात पर अपना-अपना पक्ष रखा कि स्नातक प्रथम सेमेस्टर की परीक्षा के प्रवेश पत्र में गड़बड़ी किस प्रकार हुई. 8 अप्रैल की परीक्षा देने से बड़ी संख्या में परीक्षार्थी कैसे वंचित रह गये. उसी दिन यह साफ हो गया था कि वर्तमान स्थिति में परीक्षाओं का संचालन जारी रखना युक्तिसंगत नहीं है. इसके बाद भी विवि परीक्षा विभाग ने परीक्षाएं जारी रखीं और आखिरकार स्थिति इतनी विकराल हो गयी कि 11 अप्रैल 2026 की द्वितीय पाली से लेकर 16 अप्रैल 2026 तक की सभी परीक्षा स्थगित करनी पड़ी. इसके पीछे का कारण विवि परीक्षा विभाग ने अपरिहार्य घोषित किया. हालांकि, इस अपरिहार्य शब्द ने कई सवाल छोड़ दिये हैं. आखिर इतनी बड़ी लापरवाही किस स्तर से हुई. क्या इसके लिए सीधे तौर पर कोई नहीं जिम्मेवार हैं. क्या समर्थ के नोडल या फिर परीक्षा नियंत्रक की इसमें भूमिका है. फिलहाल, विवि प्रशासन की कोशिश यह है कि समर्थ प्रणाली को जारी रखते हुए परीक्षाओं का संचालन पटरी पर लाया जाये. संभावना है कि उसके बाद प्रशासनिक कार्रवाई की जायेगी. एक ही परीक्षा के तीन एडमिट कार्ड या फिर तीन दिन में कराने का प्रयास स्नातक प्रथम सेमेस्टर दिसंबर 2025 की परीक्षा के रद होने के पीछे एडमिट कार्ड की त्रुटि बतायी गयी है. यह स्पष्ट होना बाकी है कि एक ही परीक्षा के तीन एडमिट कार्ड जारी हो गये या फिर अपनी सुविधा के लिए विवि परीक्षा विभाग ने एक ही परीक्षा को तीन दिन में कराने का प्रयास किया. क्या यह पहली बार हुआ कि परीक्षार्थियों की संख्या इस बार अचानक इतनी अधिक हो गयी कि परीक्षार्थियों को ही तीन भाग में बांटने की नौबत आ गयी. सवाल यह है कि इससे पहले परीक्षार्थियों की संख्या बढ़ने पर क्या उपाय किये गये थे, जबकि परीक्षार्थियों की संख्या पहले ही पता कर परीक्षा केंद्रों का निर्धारण किया जाता है.

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