आज का दर्शन: शिव-दुर्गा मंदिर की महिमा अपरंपार, दूर-दूर से पहुंचते हैं श्रद्धालु

Edited by Shruti Kumari
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शिव दुर्गा मंदिर, अमौर, पूर्णिया

Aaj Ka Darshan: पूर्णिया के अमौर स्थित प्राचीन शिव-दुर्गा मंदिर में श्रद्धालुओं की अटूट आस्था है. जानिए मंदिर का इतिहास, मान्यताएं और विशेषताएं.

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अमौर, पूर्णिया से सुनील कुमार की रिपोर्ट:

Aaj Ka Darshan: पूर्णिया जिले के अमौर स्थित प्राचीन शिव-दुर्गा मंदिर क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शुमार है. मंदिर के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है और मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है. यही कारण है कि वर्षभर दूर-दराज के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं.

मन्नत पूरी होने पर चढ़ाते हैं श्रद्धा का प्रसाद

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार जो भी भक्त सच्चे मन से अपनी मनोकामना लेकर माता के दरबार में आता है, उसकी इच्छा पूर्ण होती है. मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु पारंपरिक रीति-रिवाजों के तहत पूजा-अर्चना कर अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं. नवरात्र और अन्य विशेष अवसरों पर यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है.

प्राचीन इतिहास से जुड़ा है मंदिर

मंदिर के पुजारी रामदेव गोस्वामी एवं स्थानीय बुजुर्ग मोहन झा के अनुसार अमौरगढ़ कभी वक्र नामक पहाड़ी नदी के किनारे बसा एक समृद्ध क्षेत्र था. यह मार्ग अमौर को नेपाल और बंगाल से जोड़ता था. उस समय अमौरगढ़ का संचालन रामनगर ड्योढ़ी के राजा देवानंद करते थे.

बताया जाता है कि नगर में प्रवेश के लिए पत्थरों से निर्मित भव्य सीढ़ियां थीं और राजमहल तक चौड़ी सड़कें जाती थीं. ड्योढ़ी के आसपास कई तालाब भी खुदवाए गए थे, जिनके अवशेष आज भी इतिहास की गवाही देते हैं.

राजमहल से मंदिर तक बनी थी सुरंग

मंदिर से जुड़ी एक रोचक कथा भी प्रचलित है. कहा जाता है कि राजमहल से मंदिर तक एक गुप्त सुरंग बनाई गई थी. रानी इसी सुरंग के रास्ते मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना करती थीं. राजा देवानंद, राजा दुलार, राजा परमानंद और राजा हरिलाल जैसे शासकों के संरक्षण में यह क्षेत्र धार्मिक और व्यापारिक दृष्टि से काफी समृद्ध हुआ.

एक माह तक चलता था ऐतिहासिक मेला

स्थानीय लोगों के अनुसार पहले यहां अष्टमी पूजा से मेला शुरू होकर काली पूजा के बाद लगभग एक माह तक चलता था. मेले में आने वाले श्रद्धालुओं के बीच एक विशेष परंपरा आज भी जीवित है.

मान्यता है कि माता के दर्शन और पूजा के बाद मेला परिसर में मुढ़ी, घुघनी और जलेबी का सेवन करने से परिवार में प्रेम और मेल-मिलाप बना रहता है. आज भी श्रद्धालु इस परंपरा को श्रद्धा के साथ निभाते हैं.

प्रशासनिक व्यवस्था भी है विशेष

मंदिर की प्रशासनिक व्यवस्था भी अनूठी मानी जाती है. मंदिर प्रबंधन में प्रखंड विकास पदाधिकारी अध्यक्ष तथा थानाध्यक्ष सचिव की भूमिका निभाते हैं. इससे मंदिर के संचालन और धार्मिक आयोजनों में प्रशासनिक सहयोग सुनिश्चित होता है.

धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक विरासत और लोक मान्यताओं का संगम बना अमौर का शिव-दुर्गा मंदिर आज भी हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है.

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