28 दिन पहले मिलेगी जानलेवा गर्मी की चेतावनी, वैज्ञानिकों ने खोजा नम लू पहचानने का तरीका

Updated at : 10 Apr 2026 5:16 PM (IST)
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अब पहले मिलेगी जानलेवा गर्मी की चेतावनी

Wet Heatwave: मानसून के दौरान होने वाली उमस भरी गर्मी को लेकर वैज्ञानिकों ने बड़ी चेतावनी दी है. नम लू नाम का यह खतरा सूखी लू से ज्यादा जानलेवा हो सकता है. रिसर्च के मुताबिक, इससे एक अरब से ज्यादा लोग प्रभावित हो सकते हैं. अब इसकी चेतावनी पहले से मिल सकती है.

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Wet Heatwave: भारत में मानसून राहत देने वाला मौसम माना जाता है, लेकिन अब वैज्ञानिकों ने इसके बीच छिपे एक बड़े स्वास्थ्य खतरे को लेकर चेतावनी दी है. इसे नम लू या बेहद उमस भरी गर्मी कहा जा रहा है. यह सूखी लू से भी ज्यादा खतरनाक हो सकती है. रिसर्च के मुताबिक देश की एक अरब से अधिक आबादी इस खतरे की जद में आ सकती है. खास बात यह है कि अब इस तरह की स्थिति का अंदाजा करीब 4 हफ्ते पहले लगाया जा सकता है.

वैज्ञानिकों ने खोजा नया पैटर्न

क्लाइमेट डायनेमिक्स में छपे स्टडी में यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग, यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स, यूके मौसम विभाग और भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक शामिल थे. उन्होंने 1940 से 2023 तक के मौसम डेटा और 261 मानसून घटनाओं का स्टडी किया. इससे पता चला कि मानसून के दौरान एक खास मौसम पैटर्न बनता है. इससे उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में आर्द्र गर्मी का खतरा 125 प्रतिशत तक बढ़ जाता है.

क्यों ज्यादा खतरनाक है नम लू

वैज्ञानिकों के अनुसार यह खतरा वेट-बल्ब तापमान से जुड़ा है. इसमें हवा में नमी बहुत ज्यादा होती है. ऐसे में शरीर का पसीना सूख नहीं पाता और शरीर ठंडा नहीं हो पाता. इससे कुछ ही घंटों में हीटस्ट्रोक और दिल से जुड़ी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं. इस रिसर्च के मुख्य लेखक अक्षय देवरास का कहना है कि लोग सूखी गर्मी यानी लू से तो सावधान रहते हैं, लेकिन मानसून की उमस भरी गर्मी को हल्के में लेते हैं. यह ज्यादा खतरनाक साबित हो सकती है.

किन इलाकों में ज्यादा असर

अध्ययन के अनुसार जब मानसून सक्रिय रहता है, तब उत्तर प्रदेश और बिहार के गंगा के मैदानी इलाकों में यह खतरा ज्यादा बढ़ जाता है. वहीं जब मानसून कमजोर पड़ता है, तो यह असर दक्षिण और तटीय इलाकों की तरफ शिफ्ट हो जाता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर 4 हफ्ते पहले चेतावनी मिल जाए, तो प्रशासन बेहतर तैयारी कर सकता है. अस्पतालों में स्टाफ बढ़ाया जा सकता है, बिजली की मांग को संभाला जा सकता है और मजदूरों या बच्चों के काम और स्कूल के समय में बदलाव किया जा सकता है.

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जलवायु को आसान भाषा में समझाने की कोशिश

यह रिसर्च सिंप्लीफाइंग साइंस नाम के कार्यक्रम का हिस्सा है. इसे असर सोशल इम्पैक्ट एडवाइजर्स ने तैयार किया है. इसका मकसद लोगों को जलवायु परिवर्तन और उसके असर के बारे में आसान भाषा में जागरूक करना है.

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Paritosh Shahi

लेखक के बारे में

By Paritosh Shahi

परितोष शाही डिजिटल माध्यम में पिछले 3 सालों से पत्रकारिता में एक्टिव हैं. करियर की शुरुआत राजस्थान पत्रिका से की. अभी प्रभात खबर डिजिटल बिहार टीम में काम कर रहे हैं. देश और राज्य की राजनीति, सिनेमा और खेल (क्रिकेट) में रुचि रखते हैं.

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