1. home Hindi News
  2. state
  3. bihar
  4. patna
  5. independence day 2020 story of unknown freedom fighters who unfurled the indian tricolor flag

अगस्त क्रांति के अनाम नायक : साथी तो चले गये, कैसे कहूं कि मैंने फहराया था झंडा

By Prabhat Khabar Print Desk
Updated Date
Happy Independence day 2020 Wishes
Happy Independence day 2020 Wishes
Prabhat Khabar

आजादी की लड़ाई में अनगिनत लोग शामिल थे. हर स्तर पर उथल-पुथल मची थी. लोग अंग्रेजी राज से मुक्ति चाहते थे. उनके सामने शांति-अशांति का भेद नहीं था. मुक्ति चाहिए और वह किसी भी हाल में चाहिए. इस क्रम में हजारों लोगों ने कुर्बानी दी. ये ऐसे नायक थे जो अनाम रह गये. उनकी वीरता-हिम्मत की कहानियां हैरान करने वाली हैं. इन कहानियों के नायकों का एक ही मकसद था-आजादी. 1857 से शुरू हुए मुक्ति संग्राम से लेकर 1942 की अगस्त क्रांति तक अनाम नायकों की लंबी शृंखला रही. उस समय भी आंदोलनकारियों ने जगह-जगह गांजे-शराब की दुकानों को नष्ट कर दिया था. यानी राजनीतिक आंदोलन के साथ-साथ सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार का काम भी चल रहा था. साहित्य-संस्कृति के इस अंक में ऐसे ही अनाम नायकों, घटनाओं के बारे में जानेंगे जिसने आजादी की लड़ाई को धार दी. पढ़िए विभिन्न पुस्तकों पर आधारित अजय कुमार की यह रिपोर्ट.

वहां खादी के एक हाफ कमीज में पिरोया सा तिरंगा लहरा रहा था. ब्रिटिश अधिकारी सन्न रह गये. उन्होंने आदेश दिया- सचिवालय का कोना-कोना छान मारो. उस युवक को खोज निकाला गया. अधिकारियों ने उससे पूछा-तुमने ऊपर झंडा फहराया? युवक ने पूरे जोशो और साहस के साथ जवाब दिया- जी हां, मैंने हीउसे फहराया है.उस वक्त शाम के करीब चार बज रहे थे. वह थे रामकृष्ष्ण सिंह. मोकामा के सकरवार टोला के रहने वाले. उन्हें 11 अगस्त 1942 को सचिवालय में गिरफ्तार कर लिया गया.उन्हें फुलवारी कैंप जेल ले जाया जा रहा था. रास्ते में विद्रोहियों की भीड़ ने पुलिस की एस्कॉर्ट पार्टी पर हमला कर दिया और उन्हें छुड़ा लिया. उनकी तलाश में घर की कुर्की-जब्ती हुई. वह दोबारा 29 नवंबर 1942 को पकड़े गये. नौ महीने तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में बंद रहे. उन्हें चार महीने की सश्रम कारावास की सजा हुई.रामकृष्ष्ण सिंह आजाद भारत में 36 साल जीवित रहे. पर किसी के सामने यह कहना मुनासिब नहीं समझा कि उन्होंने ही सचिवालय पर झंडा फहराया था. वह हर साल सचिवालय के शहीद स्थल पर माथा टेकते. अपने साथियों को मन ही मन याद करते-तुम शहीद हो गये. मैं तुम्हारा साथी हूं. इसलिए जिंदा रहकर भी मौन साधूंगा. सचिवालय गोलीकांड की भारी प्रतिक्रिया हुई. बिहार के अलग-अलग इलाकों में डाकघर सहित अन्य सरकारी संपत्तियों को व्यापक नुकसान पहुंचाया गया.

दिघवारा की महिलाओं ने निकाला था जुलूस

दिघवारा में 12 अगस्त को शानदार जुलूस निकाला गया.स्त्रियां जुलूस की अगुवाई कर रही थीं. जुलूस थाने तक गया. थाने में फौज मुस्तैद थी. महिलाओं का उत्साह देख पहले तो ये सभी झेंपे पर जल्दी ही भारतीयता का अभिमान इन्हें उकसाने लगा. वे सबके सब झंडे हाथ में लेकर जुलूस में शामिल हो गये. जनता सौ-सौ बांस कूदने लगी. अपूर्व समारोह के साथ थाने को जनता ने अपने अधिकार में कर लिया. 13 अगस्त को सभी सम्मानपूर्वक विदा कर दिये गये और वहां स्वराजी ताला लगा दिया गया.उधर नौगछिया स्टेशन खाक हो चुका था. सिपाहियों ने ताबड़तोड़ बरसानी शुरू कर दी. इसमें भुवनेश्वर मंडल घायल हुए और मैट्रिक के एक छात्र मुंशी साहु को गोली लगी. उन्हें भागलपुर सिटी अस्पताल ले जाना पड़ा. इस गोलीकांड ने लोगों को और उत्तेजित कर दिया. हजारों की संख्या में लोग स्टेशन पर पहुंच गये. सिपाहियों को घेर लिया. सिपाही डर गये और उन्होंने अपनी पांच राइफलें भीड़ के हवाले कर दीं. गोपालगंज के मीरगंज थाने में रामनगीना राय ने अगस्त क्रांति की आग सुलगायी और प्रभुनाथ तिवारी के साथ मिलकर आंदोलनकारियों का संगठन करने लगे.

आंदोलनकारियों पर बरसाया बम

जी हां आंदोलनकारियों पर बम भी बरसा था. पटना सचिवालय पर सात छात्रों की शहादत की खबर ने सबको उत्तेजित कर दिया था. बिहार-रांची रोड पर गिरियक के पास बकराचरसुआ का पुल है. उसे वहां की जनता तोड़ने में लगी थी. उनके सर पर हवाई जहाज मंडरा रहा था. जहाज से बम बरसाये गये. पर लोग बाल-बाल बच गये. बिहार सब जेल में करीब दो सौ पचास कैदी थे. वहां के कार्यकर्ताओं ने वार्डन से चाबी छीन ली. जेल का फाटक खोल दिया गया. इस तरह सभी कैदी जेल से निकल गये. एकंगरसराय में भी लोगों ने वहां के स्टेशन को बरबाद कर दिया. जगह-जगह सड़कें काट दी गयीं.

ट्रेनों पर कब्जा कर बना दी स्वराजी रेलगाड़ी

अगस्त क्रांति की चिनगारी हर ओर फैल चुकी थी. छात्र स्कूलों से बाहर थे और आंदोलन के नये-नये तरीके इजाद कर रहे थे. उसी दौरान उन्होंने ट्रेनों पर कब्जा कर लिया और उस पर आजादी से जुड़े नारे लिख दिये. बाहर और भीतर दोनों तरफ. ट्रेन के ड्राइवर को कहा जाता था कि देश अब आजाद हो गया है. इस तरह इन रूटों पर स्वराजी गाड़ियां चलीं...

बखरी से खगड़िया

सोनपुर से छपरा

मैरवा से भंटा पोखर

घोड़ासहन से बेतिया

दलसिंहसराय से कटिहार

जमानपुर से किऊल

बिहार से बख्तियारपुर

पूर्णिया से जोगबनी

मधुपुर से जसीडीह

जसीडीह से बैद्यनाथधाम

मुंगेर जिले के बखरी

सलौना और खगड़िया

अगस्त क्रांति में शहीद हुए 494 बहादुर लोग

बयालीस के अगस्त क्रांति के दौरान बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में 494 लोग शहीद हुए. पटना से रांची तक सुराज की धमक थी. जगह-जगह पुलिस से लड़ाई-भिड़ाई होती रही. अनेक लोग पुलिस गोली के शिकार हुए और कई घायल भी. कई ऐसे थे जो आंदोलन की आंच कम होने पर कानूनी तरीके से अपने ऊपर लगे आरोपों से मुक्ति चाहते थे. कई नेपाल भाग गये. सबसे बड़ी बात यह है कि शहीद होने वाले लोगों में सभी सामाजिक पृष्ठभूमि के लोग थे. सोनपुर के छट्ठू दर्जी से लेकर झगड़ चमार, बाबूराम पांडेय तक शमिल थे. इसमें खगड़िया के माधव सिंह थे तो कटिहार के बिहारी साव और अतुल मिस्त्री भी थे. सासाराम के महंगू पासी और हिलसा के चरित्र दुसाध भी थे. आरा में सहार के गिरिवर सिंह थे तो वहीं के शीतल अहीर भी थे.

शाहाबाद जिले के बक्सर में

मुजफ्फरपुर जिले के सीतामढ़ी में

दरभंगा जिले के मधुबनी में

समस्तीपुर और रोसड़ा में

सारण जिले के सोनपुर, मैरवा में

चंपारण के घोड़ासहन और बेतिया में

पूर्णिया के कटिहार और जोगबनी में

भागलपुर में भागलपुर शहर और नाथनगर में

संताल परगना जिले के मधुपर में

पटना जिले के बिहार-बख्तियारपुर में

posted by ashish jha

Share Via :
Published Date

संबंधित खबरें

अन्य खबरें