50 साल से अधिक पुराने पेड़ों को सहेजने की कवायद

Updated at : 12 Apr 2024 9:53 PM (IST)
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50 साल से अधिक पुराने पेड़ों को सहेजने की कवायद

बचेंगे पुराने पेड़ तो हरियाली बढ़ेगी और ऑक्सीजन मिलेगा. इसके साथ ही पक्षी और जीव बचेंगे.

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कृष्ण कुमार, पटना. राज्य में नये पौधों को लगाने के साथ ही अब सरकार ने 50 साल से अधिक पुराने पेड़ों को विरासत वृक्ष में शामिल करने की योजना तैयार की है. इनकी पहचान स्थानीय लोगों की मदद और वैज्ञानिक तरीके से की जायेगी. इन वृक्षों के संरक्षण के लिए स्थानीय लोगों की मदद से विशेष कार्य योजना तैयार होगी. वृक्षों की पहचान सहित उनका डाटा सुरक्षित रखने की व्यवस्था होगी. इसका मकसद जलवायु, हरियाली और इको सिस्टम को बेहतर बनाये रखने सहित, ऐसे पेड़ों पर रहने वाले चिड़ियों और जीव-जंतुओं की सुरक्षा करना है.

सूत्रों के अनुसार करीब दो साल पहले पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने इस दिशा में प्रयास शुरू किया था. हेरिटेज ट्री ऐप के माध्यम से राज्य में 50 साल से अधिक पुराने करीब 16 हजार वृक्षों की जानकारी मिली थी. इसमें करीब 120 साल से अधिक पुराने करीब नौ सौ वृक्ष होने की भी जानकारी मिली थी. इसमें अधिकतर पेड़ पीपल और बरगद के हैं. विभाग की टीम से इन वृक्षों की जांच करवाकर उसके संरक्षण के उपाय किये जायेंगे. संरक्षण के लिए प्रत्येक वृक्ष के लिए कुछ राशि भी तय की जा सकती है.

हरियाणा में दिया जा रहा 75 साल पुराने वृक्षों को पेंशन

सूत्रों के अनुसार पुराने वृक्षों के संरक्षण के लिए हरियाणा सरकार ने भी योजना लागू की है. इसके तहत हरियाणा के करनाल में फिलहाल करीब 75 से 150 वर्ष पुराने वृक्षों की पहचान की गयी है. इनके संरक्षण के लिए प्रति वृक्ष के अनुसार करीब 2750 रुपये की वार्षिक पेंशन राशि निर्धारित की गयी है. इसमें कुल नौ प्रकार के पेड़ों को शामिल किया गया है. इसके तहत पीपल, बरगद, नीम, जाल, केंदू आदि शामिल हैं.

कई पक्षियों और छोटे जीवों का होता है बसेरा

पीपल और बरगद जैसे पुराने वृक्षों में कई पक्षियों और छोटे जीवों का बसेरा होता है. ऐसे में इन बड़े वृक्षों को कटने के बाद ऐसे पक्षी और जीव बेघर हो जाते हैं. इस कारण कई पक्षियों और जीवों की प्रजातियां भी लुप्त होने की कगार पर हैं. इसके साथ ही जानकार बताते हैं कि एक पीपल का पेड़ प्रतिदिन 24 घंटे में करीब 25 सौ लीटर ऑक्सीजन देता है. ऐसे में पुराने, बड़े और घने वृक्षों के संरक्षण से आबोहवा तो शुद्ध होगी ही, साथ में विलुप्त होने वाले पक्षियों और जीवों को भी बचाया जा सकेगा.

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