बिहार में नीतीश युग का अंत: राजनीति का ‘द्वि-युग’ समाप्त, राज्यसभा जाने से कदम से लगा विराम

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य सभा के लिए भरा नामांकन, गृह मंत्री अमित शाह सहित तमाम बड़े नेता रहे मौजूद.
Nitish Kumar : नीतीश कुमार के राज्यसभा नामांकन के साथ बिहार की राजनीति में एक बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं. इसी के साथ नीतीश कुमार का तीन दशक लंबा राजनीतिक युग अब समाप्ति की ओर है. सामाजिक न्याय से सुशासन तक, जानिए कैसे इन दो नेताओं ने बिहार की अलग-अलग पहचान गढ़ी.
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Nitish Kumar : बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आज राज्यसभा के लिए नामांकन कर दिया. इस नामांकन के साथ बिहार की राजनीति से लालू-नीतीश के उस युग का भी अवसान हो गया जो लगभग साढ़े तीन दशकों तक बिहार की पहचान रहा. बिहार की राजनीति इन दोनों नेताओं पर केंद्रित रही. लालू भी बिहार की सक्रिय राजनीति से अलग हो चुके हैं. 75 साल के नीतीश कुमार ने भी बिहार की राजनीति से खुद को अलग करने का ऐलान कर दिया है. सीएम नीतीश कुमार ने यह ऐलान अपने एक्स पोस्ट के जरिए ही किया.
समापन की ओर नीतीश का विकास युग
बिहार की राजनीति में एक दौर ऐसा था जो हर चुनाव, हर बहस और हर राजनीतिक समीकरण में लिया जाता था. अब उस दौर का समापन हो रहा है. बिहार की राजनीति लगभग 36 सालों तक इन दो नामों के इर्द-गिर्द रही. अब जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल कर दिया है और सक्रिय राजनीति से अलग होने का ऐलान कर दिया है. इस ऐलान के साथ ही बिहार की राजनीति के एक अध्याय का समापन हो रहा है. लेकिन सीएम नीतीश कुमार का सिर्फ एक नेता नहीं, जिनका राज्यसभा जाना कोई आम बात हो, बल्कि बिहार के विकास पुरुष के उस युग के अंतिम पन्ने की तरह है, जिसने बिहार को दो अलग-अलग पहचानों में ढाला.
दो रास्ते, एक राज्य
1990 के दशक में जब लालू प्रसाद यादव सत्ता में आए, तब बिहार की राजनीति में ‘सामाजिक न्याय’ शब्द सिर्फ नारा नहीं, आंदोलन था. पिछड़े और वंचित वर्गों की राजनीतिक भागीदारी को उन्होंने केंद्र में रखा. सत्ता की भाषा बदली, चेहरे बदले और सत्ता के गलियारों में उन लोगों की आवाज गूंजी, जो लंबे समय से हाशिए पर थे. लालू का दौर भावनाओं का था. सत्ता में सामाजिक प्रतिनिधित्व की क्रांति का था. उनके समर्थकों के लिए वह आत्मसम्मान के प्रतीक बने. लेकिन इसी दौर में बिहार पर ‘जंगलराज’ का ठप्पा भी लगा. बिहार की पहचान बीमारू राज्य की बनी, कानून-व्यवस्था और विकास के सवालों पर राज्य की छवि राष्ट्रीय स्तर पर कमजोर हुई. बिहार मजाक और माइग्रेशन दोनों का पर्याय बन गया. चीनी मिलों, जूट फैक्ट्रियों, मखाना, लीची, केला, मसालों और छोटे-छोटे लघु उद्योगों वाला बिहार प्रवासी मजदूरों का प्रदेश बन गया.
विकास का विमर्श और ‘सुशासन बाबू’ का दौर
लालू के उस दौर का अंत 2005 में हुआ जब सीएम नीतीश ने सत्ता संभाली. लालू सत्ता से भले बेदखल हुए, मगर उनकी पार्टी और वह सत्ता का केंद्र लगातार बने रहे. नीतीश कुमार ने ‘सामाजिक न्याय’ की राजनीति को ‘विकास’ के फ्रेम में ढाला. सड़कों का जाल बिछाया, पुलों से पूरे बिहार को सजाया. बिहार में सड़कों का इतना विकास कर डाला कि बिहार के सुदूर जिले से भी महज 3 से 5 घंटे में राजधानी पहुंचना संभव हो सका. कभी पड़ोसी जिले से पटना पहुंचने में पूरा दिन निकल जाता था. साइकिल योजना, छात्राओं के लिए प्रोत्साहन, पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण, इन फैसलों ने बिहार की दिशा बदली. बिहार की छवि धीरे-धीरे बदलने लगी. ‘सुशासन बाबू’ की छवि ने कानून-व्यवस्था और बुनियादी ढांचे को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया. लालू जहां सामाजिक उथल-पुथल के नायक थे, वहीं नीतीश प्रशासनिक स्थिरता और विकास का स्तंभ बने.
दो ध्रुव, एक कहानी
इन दोनों नेताओं की राजनीति अलग थी. विचार अलग थे, भाषा अलग थी लेकिन दोनों ने मिलकर बिहार की राजनीति के लिए नई राजनीतिक चेतना गढ़ी. लालू ने सत्ता की सामाजिक संरचना बदली. तो नीतीश ने प्रशासनिक प्राथमिकताएं बदलीं. लालू ने भावनाओं को केंद्र में रखा, नीतीश ने व्यवस्था को केंद्र में स्थापित किया. एक ने पहचान दी, दूसरे ने दिशा.
अब आगे क्या?
लालू प्रसाद यादव पहले ही सक्रिय राजनीति से स्वास्थ्य कारणों से दूरी बना चुके हैं. उनकी पार्टी की कमान भी अब नई पीढ़ी के हाथ में जा चुकी है. और अब नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के संकेतों के साथ यह साफ है कि बिहार की राजनीति ‘पोस्ट-लालू, पोस्ट-नीतीश’ युग में प्रवेश करने जा रही है. यह बदलाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं होगा. यह उस पीढ़ी का अंत होगा जिसने मंडल से लेकर महागठबंधन तक की राजनीति देखी और बनाई.
भावनाओं का एक युग
बिहार के गांवों में आज भी कोई जब राजनीति की बात करता है, तो कहता है ‘लालू के टाइम में… या नीतीश के टाइम में…’ यह वाक्य और बातचीत का यह लहजा ही बताता है कि ये नेता सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं थे, वे काल के खंड थे. अब सवाल यह नहीं कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा. सवाल यह है कि क्या कोई नेता बिहार की आत्मा को उसी तरह छू पाएगा, जैसे नीतीश ने छुआ? बिहार बदल रहा है. नई पीढ़ी नए मुद्दों के साथ राजनीति में है. लेकिन इतिहास गवाह रहेगा कि लगभग साढ़े तीन दशक तक इस राज्य की पहचान दो नामों से बनी, लालू और नीतीश. अब परदा गिर रहा है. और बिहार राजनीति के एक नए अध्याय के मुहाने पर खड़ी है.
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लेखक के बारे में
By Keshav Suman Singh
बिहार-झारखंड और दिल्ली के जाने-पहचाने पत्रकारों में से एक हैं। तीनों विधाओं (प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और वेब) में शानदार काम का करीब डेढ़ दशक से ज्यादा का अनुभव है। वर्तमान में प्रभात खबर.कॉम में बतौर डिजिटल हेड बिहार की भूमिका निभा रहे हैं। इससे पहले केशव नवभारतटाइम्स.कॉम बतौर असिसटेंट न्यूज एडिटर (बिहार/झारखंड), रिपब्लिक टीवी में बिहार-झारखंड बतौर हिंदी ब्यूरो पटना रहे। केशव पॉलिटिकल के अलावा बाढ़, दंगे, लाठीचार्ज और कठिन परिस्थितियों में शानदार टीवी प्रेजेंस के लिए जाने जाते हैं। जनसत्ता और दैनिक जागरण दिल्ली में कई पेज के इंचार्ज की भूमिका निभाई। झारखंड में आदिवासी और पर्यावरण रिपोर्टिंग से पहचान बनाई। केशव ने करियर की शुरुआत NDTV पटना से की थी।
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