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पत्रकारिता के अक्षर पुरुष पंडित रामजी मिश्र ‘मनोहर’

Updated at : 29 Oct 2019 8:59 AM (IST)
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पत्रकारिता के अक्षर पुरुष पंडित रामजी मिश्र ‘मनोहर’

पत्रकारिता का एक पूरा दौर पंडित रामजी मिश्र ‘मनोहर’ के व्यक्तित्व में सिमटा हुआ है. पत्रकारिता के दीप स्तंभ मनोहर जी अपने जीवन के आखिरी क्षण तक न केवल पत्रकारिता के प्रति समर्पित रहे, बल्कि युवा पत्रकारों के मार्ग को भी प्रकाशित करते रहे. पत्रकारिता की हर विधा में खास पैठ रखने वाले मनोहर जी […]

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पत्रकारिता का एक पूरा दौर पंडित रामजी मिश्र ‘मनोहर’ के व्यक्तित्व में सिमटा हुआ है. पत्रकारिता के दीप स्तंभ मनोहर जी अपने जीवन के आखिरी क्षण तक न केवल पत्रकारिता के प्रति समर्पित रहे, बल्कि युवा पत्रकारों के मार्ग को भी प्रकाशित करते रहे. पत्रकारिता की हर विधा में खास पैठ रखने वाले मनोहर जी की चिंता पत्रकारिता के मूल्यों में आ रही गिरावट और क्षरण को लेकर गहरी थी.

पत्रकारों की सभा, संगोष्ठियों में अक्सर अपनी चिंताएं व्यक्त भी करते थे. पत्रकारिता उनके लिए महज एक पेशा नहीं बल्कि उनके जीवन का पर्याय बन चुकी थी. अखबारों की दशा–दिशा, समाचारों के लेखन, प्रस्तुति से लेकर पत्रकारीय मर्यादा और युवा पत्रकारों के लेखन, आचरण पर भी उनकी पैनी नजर रहती थी. दरअसल मनोहर जी अपनी दीर्घ साधना और तप से पत्रकारिता के जिस स्वरूप के हिमायती थे, उसमें रत्ती भर का विचलन भी उन्हें बर्दाश्त नहीं था.

अक्सर वे कहा करते थे, अखबार में कंटेंट के बजाय उसके रंग–बिरंगे स्वरूप पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है. पाठकों को आकर्षित करने के लिए तथ्यपरक रिपोर्टों, गहन विश्लेषणों तथा जनपक्षधरता के चरित्र वाले एक बेहतर समाचार पत्र के बजाय दूसरे रास्ते अपनाये जा रहे हैं. जीवन के उत्तरार्ध में उनकी चिंता यह भी थी कि एक तरह से पत्रकारिता सिर्फ अपने ही हित साधने का औजार बन कर रह गयी है.

युवा पत्रकारों के मार्गदर्शक मनोहर जी की पीड़ा यह भी थी अच्छे युवा प्रतिभाशाली पत्रकार मौका मिलने पर हिंदी पत्रकारिता को छोड़ कर अंग्रेजी पत्रकारिता या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की ओर पलायन कर रहे हैं. मनोहर जी अब भले हमारे बीच नहीं है मगर उनकी बातें आज सौ फीसदी सही साबित हो रही है. हिंदी पत्रकारिता में अब पहले जैसी वैसी कोई परंपरा ही नहीं बची है, जिसमें पुरानी पीढ़ी नहीं पीढ़ी को तैयार करती थी. जहां युवा पीढ़ी को बेहतर संपादन करने से लेकर बेहतर रिपोर्ट लिखने तक के हुनर सिखाये जाते थे.

पत्रकारिता को लेकर व्यक्त उनकी चिंताओं में आज का पूरा पत्रकारीय परिदृश्य प्रतिबिंबित है. आजीवन पत्रकारिता को पवित्र कर्म मानने वाले अक्षर पुरुष मनोहर जी के प्रति हमारी विनम्र श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके पत्रकारीय आदर्शों को अपनायें.

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