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बीपीएससी की 48वीं-52वीं परीक्षा में सफल महिला अभ्यर्थी को नहीं मिला था पद, नौ साल बाद हाइकोर्ट का आया फैसला

Updated at : 26 Sep 2019 7:33 AM (IST)
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बीपीएससी की 48वीं-52वीं परीक्षा में सफल महिला अभ्यर्थी को नहीं मिला था पद, नौ साल बाद हाइकोर्ट का आया फैसला

नये सिरे से मेरिट तैयार करने का आदेश पटना : पटना हाइकोर्ट ने बिहार लोक सेवा आयोग को महिला उम्मीदवारों के आरक्षण के एक मामले में 48वीं से लेकर 52वीं संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा की मेरिट लिस्ट नये सिरे से तैयार करने का आदेश दिया है. इस आदेश का असर यह होगा कि सफल हुए कुछ […]

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नये सिरे से मेरिट तैयार करने का आदेश
पटना : पटना हाइकोर्ट ने बिहार लोक सेवा आयोग को महिला उम्मीदवारों के आरक्षण के एक मामले में 48वीं से लेकर 52वीं संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा की मेरिट लिस्ट नये सिरे से तैयार करने का आदेश दिया है. इस आदेश का असर यह होगा कि सफल हुए कुछ उम्मीदवारों की नौकरी समाप्त हो सकती है, जबकि कुछ को नीचे के पद आवंटित हो सकते हैं.
न्यायाधीश शिवाजी पांडेय की एकलपीठ ने यह आदेश सुजाता सिंह द्वारा दायर रिट याचिका पर बुधवार को सुनवाई करते हुए दिया. सुजाता सिंह ने 2010 में आयोजित बीपीएससी की 48वीं से 52वीं संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा दी थी. उसने आरक्षित सीट का दावा किया था. 10 अप्रैल, 2010 को फाइनल रिजल्ट प्रकाशित किया गया और उस परीक्षा के आधार पर सुजाता को श्रम उपाधीक्षक का पद मिला.
उसके बाद उसने परीक्षा में अनियमितता को लेकर पटना हाइकोर्ट में याचिका दायर कर दी थी, जिसकी सुनवाई बुधवार को पूरी हुई. याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सिद्धार्थ प्रसाद ने अदालत को बताया कि महिला के आरक्षण कोटे में जो मेरिट लिस्ट तैयार की गयी थी, उसमें सुजाता मेधा सूची में 325वें स्थान पर थीं. उन्होंने बिहार प्रशासनिक सेवा को पहली प्राथमिकता दी थी.
लेकिन, मेरिट लिस्ट में उनका नाम ऊपर रहने के बावजूद उसे श्रम उपाधीक्षक का पद दिया गया, जबकि मेरिट लिस्ट में उनसे कम स्थान पाने वाली कुछ प्रत्याशियों को बिहार प्रशासनिक सेवा और बिहार पुलिस सेवा में नियुक्त कर लिया गया. इन तथ्यों की जानकारी जब अदालत को मिली तो आयोग से कारण पूछा गया. याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि आयोग ने भी माना की उससे भूल हुई है.
इस पर अदालत ने कहा कि अब नये सिरे से मेरिट लिस्ट प्रकाशित कर अभ्यर्थियों को उनकी योग्यता के अनुसार पद आवंटित किये जाएं. अर्थात जिन्हें पहले डीएसपी के पद के लिए चयन किया गया था, उन्हें अब दूसरे पदों पर आना पड़ेगा. मेरिट लिस्ट से नीचे आने पर कुछ की नौकरी भी जा सकती है.
ये हो सकते हैं असर
1. सफल हुए कुछ उम्मीदवारों की नौकरी हो सकती है समाप्त
2. अभी ऊंचे पदों पर आसीन कुछ उम्मीदवारों को नीचे के पद आवंटित हो सकते हैं
हाइकोर्ट के फैसले का अभी अध्ययन नहीं किया गया है. फैसले को लेकर बैठक की जायेगी. उसके बाद कोई निर्णय लिया जायेगा.
अमरेंद्र कुमार, परीक्षा नियंत्रक, बिहार लोक सेवा आयोग
बरी हुए अभियुक्त को 14 साल बाद उसी केस में भेजा जेल पुलिस से जवाब मांगा, निचले कोर्ट को पक्ष बनाने का निर्देश
पटना : पटना हाइकोर्ट ने आपराधिक मामले में बरी किये जाने के 14 साल बाद उसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर जेल भेजे जाने पर नाराजगी जतायी है. कोर्ट ने संबंधित पुलिस अधिकारी से 27 सितंबर तक जवाब मांगा है.
साथ ही कोर्ट ने याचिकाकर्ता को कहा कि वह इस मामले में निचली अदालत को पक्षकार बनाये, ताकि उससे भी इस संबंध में जानकारी प्राप्त की जा सके. न्यायमूर्ति अश्विनी कुमार सिंह की एकलपीठ ने मो शमीम उर्फ तस्लीम द्वारा दायर आपराधिक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया.
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील राजकुमार ने कोर्ट को बताया कि 2002 में किशनगंज जिले के बहादुरगंज थाने में हत्या का मामला (कांड संख्या 73/2002) दर्ज हुआ था. उसमें याचिकाकर्ता को अभियुक्त बनाया गया था. 2003 में याचिकाकर्ता के खिलाफ सत्र न्यायालय में ट्रायल शुरू हुआ. 2005 में निचली अदालत ने याचिकाकर्ता को उक्त कांड के सिलसिले में बरी कर दिया.
मांगा 25 लाख रुपये का मुआवजा
14 साल बाद पुलिस ने उसी केस में शमीम को फिर रफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे 28 जनवरी, 2019 को न्यायिक हिरासत में लेकर जेल भेज दिया गया. याचिकाकर्ता शमीम निचले कोर्ट ने 2005 के आदेश के लोक में जमानत दे दी. अवैध रूप से हिरासत में रहने के कारण शमीम की तरफ से उसके वकील ने 25 लाख रुपये के मुआवजे के लिए हाइकोर्ट में याचिका दायर की है.
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