स्मृति शेष : समाजवादी आंदोलन ने रघुपति भाई को किया था राजनीति में दीक्षित
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :05 Aug 2019 6:11 AM (IST)
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राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राजद रघुपति गोप नहीं रहे. समाजवादी आंदोलन ने रघुपति भाई को राजनीति में दीक्षित किया था. लोहियावादी समाजवादी राजनीति की रीढ़ पिछड़ों में यादव समाज था. लोहिया की राजनीति के प्रति पिछड़ों में आकर्षण का मुख्य कारण उनकी जाति नीति थी. जिस प्रकार बाबा साहब आंबेडकर ने दलितों के उत्पीड़न के सवाल को […]
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राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राजद
रघुपति गोप नहीं रहे. समाजवादी आंदोलन ने रघुपति भाई को राजनीति में दीक्षित किया था. लोहियावादी समाजवादी राजनीति की रीढ़ पिछड़ों में यादव समाज था. लोहिया की राजनीति के प्रति पिछड़ों में आकर्षण का मुख्य कारण उनकी जाति नीति थी. जिस प्रकार बाबा साहब आंबेडकर ने दलितों के उत्पीड़न के सवाल को अपनी राजनीति का मुख्य मुद्दा बनाया था, उसी प्रकार डॉ लोहिया ने पिछड़ी जातियों के प्रति अन्याय और वंचना के सवाल को मजबूती के साथ उठाया था.
‘पिछड़ा पावे सौ में साठ’, उनकी राजनीति का एक मुख्य नारा था. इस नारे ने लोहिया की राजनीति की ओर पिछड़ों का आकर्षण बढ़ाया. पिछड़ों में विशेष रूप से यादव समाज के लोग काफी संख्या में डॉ लोहिया की राजनीति के साथ जुड़े. इसी दौर में रघुपति भाई भी डाॅ लोहिया की संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के साथ जुड़े थे और पीरो से विधायक भी बने थे.
बिहार की बात छोड़ दी जाये. सिर्फ पुराने शाहाबाद जिले में ही समाजवादी आंदोलन के साथ जुड़े यादव नेताओं पर नजर दौड़ाएं, तो कम से कम आधा दर्जन लोग ऐसे दिखाई देते हैं जिनकी राजनीतिक कर्म, सिद्धांत और विचार पर आधारित दिखाई देती है. इनमें सबसे प्रमुख में नाम राम इकबाल ‘ओरसी’ का है. डॉ लोहिया ने इनको पीरो का गांधी कहा था.
अगर आप पुराने लोगों से मिलेंगे और उनसे राम इकबाल जी के विषय में पूछेंगे तो लोग आपको कई कहानियां उनको लेकर सुना देंगे. मेरा मानना है कि अपने संघर्ष में सविनय अवज्ञा का जेल और जेल के बाहर जितना प्रयोग उन्होंने किया है, उतना बहुत कम लोगों ने किया होगा.
स्व राधामोहन सिंह जी भी नहीं भूलते हैं. नासिरीगंज के पास बलिया कोठी गांव के रहने वाले राधामोहन जी 67 के लोकसभा चुनाव में बक्सर संसदीय क्षेत्र से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार थे. भारी भरकम शरीर वाले राधामोहन जी बौद्धिक आदमी थे. शिवपूजन भाई अस्वस्थ हैं. 77 में दिनारा विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने थे. शिवपूजन भाई किशन पटनायक के साथ जीवन पर्यन्त जुड़े रहे.
रहन-सहन, बात-व्यवहार, आचरण और कर्म में शिवपूजन भाई समाजवादी कम, सर्वोदयी ज़्यादा दिखते हैं. संदेश के राम सकल भई को कोई कैसे भूल सकता है. 67 में विधायक बने थे. उनका एक क़िस्सा है. पैंसठ में संयुक्त सोसलिस्ट पार्टी का घेरा डालो आंदोलन हुआ था. इस कार्यक्रम के अंतर्गत आरा के कलेक्ट्रेट का घेराव किया गया था. पुलिस की लाठी चली थी. कई लोग गिरफ़्तार हुए थे. राम सकल भाई उस कार्यक्रम में छूट गये थे. इनको लगा कि जेल नहीं गये तो साथी लोग यह मत समझें की जेल की डर से मैं भाग गया. इसलिए जेल जाने का उन्होंने नायाब तरीका निकाला.
एसडीओ अपना इजलास कर रहे थे. राम सकल भाई पहुंचे और इजलास में ही एसडीओ को एक थप्पड़ जड़ दिया. फिर तो कहना ही क्या था! पुलिस ने जमकर उनकी धुलाई की और जेल जाने की उनकी मनोकामना को पूरा कर दिया.
रघुपति भाई के बहाने हैं यह सब लोग याद आ गये. रघुपति भाई अंतिम अवस्था में भी समाजवादी आंदोलन की दशा और दिशा को लेकर चिंतित थे. अभी हाल में अचानक फेसबुक पर उनको लाइव देखा.
परिवार के किसी लड़के ने उनको फेसबुक पर लाइव कर दिया था. और वे भाषण देने या अपनी बात सुनाने का प्रयास कर रहे थे. आवाज ठीक से नहीं निकल रही थी. लेकिन, जो बात समझ में आ रही थी वह यह कि मौजूदा हालात से वे दुखी और निराश थे.
मुझे ताज्जुब हुआ कि रघुपति भाई इस अवस्था में भी समाजवादी राजनीति के पतन पर कितना संवेदनशील हैं! बात करने की इच्छा हुई. फोन लगाया.
फोन नहीं मिल पाया. इसके बाद दिल्ली जाना हो गया. लौटने के बाद बात दिमाग से उतर गयी और उनसे मिलना नहीं हो पाया. इस बीच वाट्सएप पर देखा कि रघुपति भाई नहीं रहे. मन में सवाल उठता है.
समाजवादी आंदोलन ने सिर्फ शाहाबाद में ही कैसे कैसे लोगों को राजनीति में पैदा किया. इसके विपरीत आज मंडल आंदोलन की राजनीति से कैसे-कैसे नेता उपजे हैं! इसकी वजह क्या है? सरसरी निगाह से देखा जाये तो कहा जा सकता है कि समाजवादी आंदोलन में सिद्धांत और संघर्ष का समन्वय था. आज न सिद्धांत है और
न संघर्ष.
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