"भारत का लोकतंत्र" आधा लोकतंत्र है : नंदिनी सुंदर

Updated at : 17 Jul 2019 10:17 PM (IST)
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"भारत का लोकतंत्र" आधा लोकतंत्र है : नंदिनी सुंदर

पटना : "देश के लोकतांत्रिक मूल्य अभी तक आधे ही लक्ष्यों को छूते हैं. देश में आसफां जैसा कानून हजारों की हत्या करने के बाद भी खुले आम घूमने की छूट देता है. विकास के नाम पर आदिवासियों, दलितों को जल, जंगल, जमीन से वंचित किया जा रहा है. पूरे समुदाय को अपराधी बना दिया […]

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पटना : "देश के लोकतांत्रिक मूल्य अभी तक आधे ही लक्ष्यों को छूते हैं. देश में आसफां जैसा कानून हजारों की हत्या करने के बाद भी खुले आम घूमने की छूट देता है. विकास के नाम पर आदिवासियों, दलितों को जल, जंगल, जमीन से वंचित किया जा रहा है. पूरे समुदाय को अपराधी बना दिया गया है. सत्ताधारियों को कानून के ऊपर रहने की छूट है. लेकिन, अच्छी बात है कि सेना चुनी हुए सरकार की बात मानती है." द्वितीय विनय कुमार कंठ स्मृति व्याख्यान 2018 के तहत "लोकतंत्र के खतरे और लोकतंत्र के लिए खतरा" विषय पर व्याख्यान करते हुए दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की प्राध्यापक नंदिनी सुंदर ने उक्त बातें कही हैं.

व्याख्यान को चार भागों बांट कर प्रो. सुंदर ने (1) लोकतंत्र के लिए खतरा, (2) लोकतंत्र से खतरा, (3) आज और आपातकाल में फर्क तथा (4) क्या भारत में फासीवाद आ गया है पर अपनी बात रखी. लोकतंत्र की व्याख्या करते प्रो. सुंदर ने कहा कि लोकतंत्र का मतलब केवल स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव ही नहीं है, बल्कि शक्तियों का विकेंद्रीकरण, कानून का राज, बोलने की आजादी, सत्ता में भागीदारी, आदि भी है. आज हम भारत के लोग लोकतंत्र के आधे मानक तक ही पहुंच पाये हैं.

लोकतंत्र से खतरे को रेखांकित करते हुए प्रो. सुंदर ने कहा कि सामान्य अर्थों में हम लोकतंत्र को कल्याणकारी कार्यक्रमों के क्रियान्वयन से जोड़ देते हैं. लेकिन, यह काफी सरलीकृत है. इस कल्याण के नाम पर बड़े बड़े बांध बनते हैं. सड़क, बिजली और विकास की परियोजनाएं बनती हैं. इसके नाम पर दलित, आदिवासी, कमजोर विस्थापित होते हैं. उनका जल, जंगल, जमीन पर से हक छीन लिए जाता है.

लोक सभा चुनाव के संदर्भ में एडीआर के आंकड़ों को चर्चा करते हुए प्रो. सुंदर ने कहा कि वर्ष 2017-2019 के बीच देश की राजनीतिक पार्टियों को लगभग 1000 करोड़ का चंदा मिला और इसमें भाजपा की 90 प्रतिशत से ज्यादा मिला. इलेक्टोरल बोंड जारी हुए और 2022 करोड़ आएं. लेकिन, भारत सरकार के अटारनी जरनल कहते हैं कि यह पैसा किसने और क्यों लगाया यह भारत की जनता को नहीं बता सकते हैं. इलेक्टोरल बॉन्ड की कीमत न्यूनतम 10 लाख और 1 करोड़ की थी. यह समझने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि यह पैसा कॉरपोरेट ने क्यों लगाया है. लोक सभा चुनाव पैसा पर खरीदा गया चुनाव था. जो कॉरपोरेट और सरकारी पैसे के बल पर लड़ा गया और जीता भी गया.

आज एक एक कर संस्थाओं को कमजोर और अक्षम बनाया जा रहा है. आरबीआई की साख मिटा दी गयी है. नोटेबंदी का फायदा सरकार भी नहीं बता पा रही है. इसी प्रकार सारे विश्वविद्यालय चौपट किये जा चुके हैं. देश में पुलिस, सीआरपीएफ, सेना में जाने की नौकरी तो मिल रही है, लेकिन प्रोफेसर, शिक्षक बनने के मौके नहीं है. यह हमें समझना चाहिए कि यह देश की आवाम को सैन्य करण का सोचा समझा प्रयास है.

वर्तमान संदर्भ में देश की स्थिति पर चर्चा करते हुए प्रो. सुंदर ने कहा कि इंदिरा गांधी के आपातकाल के दौर में राज सत्ता शासन चला रहा था, लेकिन आज एक संगठन जो खुद को सत्ता के इतर मानता है वह शासन नियंत्रित कर रहा है. इंदिरा गांधी का आपात काल लघु अवधि के एजेंडे का था, लेकिन आज का हिंदू राष्ट्र बनाने के 1924 के एजेंडे का हिस्सा है. आज सरकार की आलोचना करने वाला देशद्रोही है और भीड़ को कानून तोड़ने की खुली छूट है.

देश में फासीवाद के लक्षण की चर्चा करते हुए प्रो. सुंदर ने आगाह किया और जर्मनी के एक शोध को रेखांकित करते हुए कहा है कि उस समय यह समझा गया कि हिटलर के नाजीवाद और उनके क्रूर कृत्य को जनता जानती थी. फिर भी वह कुछ ना कर सकी.

ईस्ट एंड वेस्ट एजुकेशनल सोसायटी और भारतीय जननाट्य संघ (इप्टा) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम की संबोधित करते हुए नंदिनी सुंदर ने सवाल किया कि क्या हमारे बच्चे जब देश का इतिहास पढ़ेंगे तो क्या यह पढ़ेंगे की देश में फासीवाद बढ़ रहा था और हम खामोश थे. हमारी चुप्पी उन्हें बल दे रही थी. तो हमें तय करना चाहिए कि हम आज का इतिहास कैसा लिखवाना चाहते हैं? रास्ता केवल राजनीतिक की है, लेकिन यह चुनाव तक ही सीमित नहीं है बल्कि जनता के बीच जाने और नरेशन चलने तक फैला है. अपने बच्चों को बचाने के लिए जरूर बोलना चाहिए.

व्याख्यान की शुरुआत में रंगकर्मी और प्राध्यापक जावेद अख्तरखां ने विनय कुमार कंठ के जीवन पर प्रकाश डाला. धन्यवाद ज्ञापन डेजी नारायण ने किया. व्याख्यान के सह आयोजक वॉलंटरी फोरम फॉर एजुकेशन, बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ, आल इंडिया सेकंडरी टीचर असोसिएशन को कोशिश सह आयोजक थे.

इस अवसर पर डेजी नारायण, फनिश सिंह, डॉ. सत्यजीत, डीके दिवाकर, पीके पोद्दार, जैस्मीन कंठ, नंदिनी मेहता, नवल किशोर चौधरी, तनवीर अख्तर, निवेदिता झा, फीरोज अशरफखां सहित लगभग 200 की संख्या में सामाजिक कार्यकर्ता, चिंतक आदि उपस्थित थे.

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