बिहटा : नहीं शुरू हुई खरीद, खुले में पड़ा है धान, किसान निराश
Updated at : 29 Dec 2018 2:28 AM (IST)
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बिहटा : रोहण नक्षत्र की शुरुआत होते ही खरीफ सीजन की प्रमुख फसल धान की रोपाई को लेकर किसान खेतों में जुट जाते हैं. सरकार पैक्स (प्राथमिक कृषि साख सहयोग समिति) के माध्यम से प्रत्येक पंचायत में न्यूनतम समर्थन मूल्य जो की साधारण धान के लिए 1750 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से धान खरीद […]
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बिहटा : रोहण नक्षत्र की शुरुआत होते ही खरीफ सीजन की प्रमुख फसल धान की रोपाई को लेकर किसान खेतों में जुट जाते हैं. सरकार पैक्स (प्राथमिक कृषि साख सहयोग समिति) के माध्यम से प्रत्येक पंचायत में न्यूनतम समर्थन मूल्य जो की साधारण धान के लिए 1750 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से धान खरीद करने की बात करती है.
सरकारी आंकड़े में 15 नवंबर से किसानों से पहले 17 और अब 19 प्रतिशत तक नमी वाले धान को लेने का निर्देश है, लेकिन जमीनी हकीकत ये है की अभी तक बिहटा प्रखंड में किसी भी पैक्स ने धान की खरीद प्रारंभ नहीं की है.
इस कारण किसान खुले में अपने धान की उपज रखने को विवश हैं. पूछने पर कंचनपुर के किसान अमरेश कुमार, सच्चिदानंद सिंह, राधारमण सिंह, अमहरा के किसान देव शंकर सिंह, सुधीर सिंह, बृजमोहन सिंह, मीठापुर के बिपिन बिहारी, धर्मेंद्र कुमार आदि का कहना है कि पैक्सों द्वारा धान की खरीद शुरू नहीं होने से खुले में धान पड़ा है.
धान खरीद प्रारंभ करने के संबंध में पूछने पर कंचनपुर पैक्स अध्यक्ष अरबिंद कुमार पप्पू का कहना था कि सरकार के द्वारा मनमाने तरीके से धान खरीद का लक्ष्य निर्धारित कर दिया गया है. हमारे पैक्स के किसानों की औसत फसल उत्पादकता 29 क्विंटल प्रति एकड़ है, जबकि सरकार ने मात्र 16 क्विंटल प्रति एकड़ किसानों से धान खरीद का लक्ष्य निर्धारित किया है.
ऐसी स्थिति में पैक्स में बेचने के बाद अपनी शेष बची उपज को किसान कहां ले जायेंगे. प्रखंड के अन्य पैक्स अध्यक्षों का कहना है कि सरकार उत्पादकता के अनुसार खरीद का लक्ष्य निर्धारित करे. पिछले साल की तुलना में इस वर्ष न्यूनतम समर्थन मूल्य में 200रुपये प्रति क्विंटल के दर से बढ़ोतरी की गयी है, जबकि पैक्सों केसीसी लिमिट में कोई बढ़ोतरी अभी तक नहीं हुई है.
प्रखंड सहकारिता पदाधिकारी खुर्शीद अंसारी ने कहा कि फसल में नमी की मात्रा अधिक होने एवं उत्पादकता व खरीद के लक्ष्य में अंतर के कारण धान की खरीद अभी प्रारंभ नहीं हो पायी है. सरकार के आंकड़ेबाजी से त्रस्त किसान रबी फसल की बुआई के लिए औने-पौने दामो में अपनी फसल बेचने को विवश हो रहे हैं.
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