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IPTA‍@75 : शीतल साठे ने कहा- स्त्री मुक्ति से ही मानव मुक्ति का द्वारा खुलेगा

Updated at : 30 Oct 2018 9:11 PM (IST)
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IPTA‍@75 : शीतल साठे ने कहा- स्त्री मुक्ति से ही मानव मुक्ति का द्वारा खुलेगा

पटना : इप्टा राष्ट्रीय प्लैटिनम जुबली समारोह के चौथे दिन आज दिनांक 30 अक्तूबर 2018 को “जन सांस्कृतिक आंदोलन और महिलाएं” विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी-1 में बोलते हुए सामाजिक कार्यकर्ता और जन-गायिका शीतल साठे ने कहा कि महात्मा ज्योतिबा फुले ने बरसों पहले यह बात कह दी थी कि स्त्री मुक्ति से ही मानव मुक्ति […]

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पटना : इप्टा राष्ट्रीय प्लैटिनम जुबली समारोह के चौथे दिन आज दिनांक 30 अक्तूबर 2018 को “जन सांस्कृतिक आंदोलन और महिलाएं” विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी-1 में बोलते हुए सामाजिक कार्यकर्ता और जन-गायिका शीतल साठे ने कहा कि महात्मा ज्योतिबा फुले ने बरसों पहले यह बात कह दी थी कि स्त्री मुक्ति से ही मानव मुक्ति का द्वार खुलेगा. शीतल साठे ने आगे बोलते हुए कहा कि पूरी लड़ाई ब्रह्माणी व्यवस्था और अ-ब्रह्माणी व्यवस्था के बीच की है. क्योंकि ब्राह्मणी व्यवस्था पुरुषों की व्यवस्था है.

रजिया सज्जाद जहीर की याद में यह संगोष्ठी भारतीय नृत्य कला मंदिर बहुद्देशीय सांस्कृतिक परिसर के एक सभागार में आयोजित हुआ जिसका नाम दीना पाठक-रेखा जैन सभागार रखा गया था. अपनी मां और लेखिका रजिया सज्जाद जहीर के संघर्षों को याद करते हुए रंगकर्मी नादिरा जहीर बब्बर ने बताया कि उनके परिवार की जड़ों में सियासत है और जब उनके पिता सज्जाद जहीर स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जेल जाया करते थे और परिवार की आर्थिक हालत अच्छी नहीं थी तो उनकी मां रजिया सज्जाद जहीर ट्यूशन पढ़ा-पढ़ा कर घर चलाती थीं. उनके घर में लड़के-लड़कियों के बीच कोई भेद नहीं था. आज उन्होंने कई नाटक ऐसे लिखे हैं जो महिला विषयों पर केंद्रित हैं.

जनजागरण शक्ति संगठन की सामाजिक कार्यकर्ता कामायनी ने इस विषय पर बोलते हुए कहा कि हम औरतों ने अपनी गृहस्थी में क्या-क्या नहीं खो दिया है. अपनी पढ़ाई-लिखाई सब कुछ. अपने काम के दौरान के अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि हालात बदल रहे हैं और हम औरतें बदलेंगी जरूर, लेकिन इसमें पुरुषों को भी साथ देना होगा अगर वे ईमानदारी से चाहते हैं कि हालात बदलें. उन्होंने एक घटना का जिक्र किया जब उनके साथ काम करने वाली एक मजदूर महिला को माइक पर बोलने को कहा गया तो वह बोल ही नहीं पाई. उनका कहना है कि कभी जमाना था जब महिलाओं को बोलने का अवसर भी नहीं मिलता था और जब अवसर मिला तो बोल ही नहीं पाई, हमें ऐसी औरतों को हौसला देना होगा बोलने के लिए.

इस बात को आगे बढ़ाते हुए रजिया सज्जाद जहीर की छोटी बेटी और रंगकर्मी नूर जहीर ने कहा कि हमें सोचना होगा कि महिलाएं कैसे माईक पर बोलें. इसके लिए जरूरी है कि हम सोचें कि कैसे हर क्षेत्र में महिलाएं भागीदारी निभाएं. जिस तरह आज महिलाओं का “मी-टू” आंदोलन चल रहा है, जरूरत है कि दलित और आदिवासी महिलाएं भी “मी-टू” आंदोलन करें. एक प्रश्न के जवाब में उन्होंने कहा कि महिलाएं हमेशा से पुरुषों सेज्यादा काम करती रही हैं.खास कर महिला मजदूर. वे सुबह उठ कर घर का सारा काम करके मजदूरी करने जाती हैं और वापस लौट कर भी फिर से घर का काम करती हैं. असल में हमें धर्म और संस्कृति को चुनौती देना होगा अगर हम चाहते हैं कि महिलाएं मैदान में उतरें.

शीतल साठे ने कहा कि हम औरतों को अब सिर्फ भागीदारी नहीं चाहिए, हमें लीडरशिप भी चाहिए. उन्होंने कहा कि महिलाएं सम्मति का शोषण की शिकार हैं, यानी उनमें आजादी की चेतना नहीं है. महिलाओं को आजादी पुरुष नहीं देगा, उन्हें खुद इसके लिए संघर्ष करना होगा.

संगोष्ठी के अंत में राष्ट्रीय इप्टा के महासचिव राकेश ने कहा कि इप्टा का अगला आयोजन महिला महोत्सव होगा. जिस पर वरिष्ठ पत्रकार निवेदिता ने कहा कि महिला महोत्सव के पहले अपने अन्य कार्यक्रमों में इप्टा को महिलाओं की भागीदारी बढ़ानी चाहिए. संगोष्ठी का संचालन राष्ट्रीय सचिव ऊषा आठले ने किया.

एक घंटे की इस संगोष्ठी के बाद उसी स्थान पर दूसरी संगोष्ठी का विषय था “कृषि संकट का सांस्कृतिक और आर्थिक परिदृश्य” जिस पर बोलते हुए डॉक्टर जया मेहता ने दिनों-दिन बढ़ते किसानों की आत्महत्या पर चिंता व्यक्त करते हुए एक ऐसे किसान की कविताओं की कुछ पंक्तियां सुनायीं जिसने आत्महत्या कर ली, उसका नाम श्रीकृष्ण कदम था.

हम सब गाय के बछड़े हैं.
हमारे मुंह में जबान नहीं है.
हम उगाते हैं मोती.
फिर भी हम गरीब हैं.

आगे बोलते हुए उन्होंने कहा कि किसानों को इतिहास में जगह चाहिए. 40 प्रतिशत किसान भूमिहीन हैं. खेती भी साल भर नहीं होती जिसकी वजह से गांव से पलायन होता है. गांव में अब सिर्फ बूढ़े लोग बचे हैं. खेती का संकट सिर्फ किसानों का संकट नहीं है, बल्कि यह पूरे देश की अर्थव्यवस्था का संकट है. खेती से इतर किसानों को छोटे-छोटे रोजगार में लगाना होगा. छोटे-छोटे रोजगार पर भी कॉरर्पोरेट का कब्जा होता जा रहा है. शहरों में भी रोजगार कम होता जा रहा है. इसलिए हमें खेती पर बात करते हुए उत्पादन पर भी बात करनी चाहिए और देश की अर्थव्यवस्था पर भी.

केरल कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व मंत्री विनय विश्वम ने कहा कि इप्टा ने यहां किसानों पर बातचीत रखी यह गर्व की बात है. आगे बोलते हुए उन्होंने कहा कि लोग यहां भूख से मर रहे हैं और दूसरी तरफ तीन हजार करोड़ की मूर्तियां बनायी जा रही हैं. इस पर एक सच्चा कलाकार ही आवाज उठा सकता है.

इस संगोष्ठी का संचालन कर रहे हैं विनीत ने संगोष्ठी का समापन करते हुए कॉरर्पोरेट और सरकार की मिली भगत को रेखांकित करते हुए कहा कि जहां एक तरफ सरकार किसानों को पैसे दे कर उनकी जमीन खरीद लेती तो दूसरी तरफ कॉरर्पोरेट वहां मॉल बना कर वही पैसा उससे छीन लेता है. इन दोनों संगोष्ठियों में देश भर के इप्टा प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया और अलग-अलग इप्टा इकाईयों ने कई जनगीत भी गाये.

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