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गांधी की वजह से दलितों को मिला आरक्षण : सुशील मोदी

Updated at : 02 Oct 2018 7:27 PM (IST)
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गांधी की वजह से दलितों को मिला आरक्षण : सुशील मोदी

पटना : राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती पर बापू सभागार में आयोजित राजकीय समारोह को संबोधित करते हुए उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा कि अगर गांधी नहीं होते तो लोकसभा-विधानसभा में आज दलितों को आरक्षण नहीं मिला होता. गांधी ने देश को आजादी दिलाने के साथ दलितोद्धार, खादी-चरखा, ग्रामोद्योग, स्वच्छता, गो रक्षा, […]

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पटना : राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती पर बापू सभागार में आयोजित राजकीय समारोह को संबोधित करते हुए उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा कि अगर गांधी नहीं होते तो लोकसभा-विधानसभा में आज दलितों को आरक्षण नहीं मिला होता. गांधी ने देश को आजादी दिलाने के साथ दलितोद्धार, खादी-चरखा, ग्रामोद्योग, स्वच्छता, गो रक्षा, हिंदी प्रचार, कुष्ठ रोगियों की सेवा, हिंदू-मुस्लिम एकता जैसे अनेक रचनात्मक अभियान भी चलाया.

मोदी ने कहा कि 1932 में अंग्रेजों ने ‘फूट डालो राज करो’ की नीति के तहत दलितों के लिए पृथक निर्वाचन की घोषणा कर दी जिसके अंतर्गत दलित उम्मीदवार को दलित ही वोट दे सकता था जिसका यरवदा जेल में बंद गांधी ने तीव्र विरोध किया और आमरण अनशन पर बैठ गये. बाद में अम्बेडकर के साथ पूणा समझौता हुआ जिसमें तय हुआ कि दलित चुनाव में खड़े होंगे और समाज के सभी लोग उन्हें वोट देंगे. अंग्रेजों ने प्रांतीय विधान सभाओं में 71 सीट दलितों को दिया था जिसे पूणा समझौता के बाद बढ़ा कर 151 और केंद्रीय असेंबली में 19 प्रतिशत सीटें आरक्षित किया गया.

यरवदा जेल से निकलने के बाद गांधी ने छुआछूत के खिलाफ 21 दिन का उपवास किया. 1933-34 में 12500 मील की यात्रा कर दलितों के लिए मंदिरों के द्वार खोलने का अभियान चलाया और दलितोद्धार के लिए 8 लाख रुपये संग्रहित किया. ‘हरिजन’ पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया और साबरमती आश्रम को दलितोद्धार का केंद्र बना दिया.

गांधी जब बिहार के आरा में आये तो उन पर पत्थर फेंके गये और लाठियां चलायी गयी. हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए भी गांधी हमेशा संघर्ष करते रहे. देश को जब आजादी मिली तो गांधी दिल्ली में नहीं बल्कि कलकत्ता के नोआखली में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच घूम-घूम कर शांति का संदेश दे रहे थे और दंगा रोकवाने के लिए आमरण अनशन कर रहे थे. गांधी के बताये मार्गों पर चल कर ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सकती है. चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष में बिहार में जितना काम हुआ है शायद ही देश के किसी अन्य राज्य में हुआ हो.

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