2021 की जनगणना में सिर्फ OBC को गिने जाने के सरकार के फैसले से मैं सहमत नहीं : शरद यादव

By Prabhat Khabar Digital Desk
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पटना :जदयूकेपूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव ने कहाहैकि 2021 की जनगणना मेंसिर्फ ओबीसी को गिने जाने के सरकार के फैसले से मैं सहमत नहीं हूं. हालांकि, सरकार का दावा है कि एससी/एसटी से संबंधित आबादी की गिनती एक नियमित प्रक्रिया है. मैं सरकार द्वारा जारी एससी/एसटी जनसंख्या के आंकड़ों का भी समर्थन नहीं करता हूं. अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या सरकार द्वारा दिये गये आंकड़ों से कहीं अधिक है. इसलिए हमारे देश में एससी/एसटी से संबंधित आबादी के वास्तविक आंकड़े प्राप्त करने की अत्यधिक आवश्यकता है. उन्होंने कहा, मेरा मानना है कि सरकार को 2021 की जनगणना में सभी जातियों को शामिल करना चाहिए चाहे वह उच्च श्रेणी हो अथवा आरक्षण श्रेणी के लोग हों.

शरद यादव ने कहा, इस देश के लोगों को पता होना चाहिए कि यहां किस जाति के कितने प्रतिशत लोग रहे हैं. उच्च जाति तथा अन्य गैर-आरक्षित श्रेणी के लोगों का प्रतिशत भी अस्पष्ट हैं. इससे ऊंची जातियों का देश में धन तथा शक्ति पर प्रभुत्व की सीमा का आंकलन करना मुश्किल हो जाता है. जाति की गणना से सरकार को आरक्षित वर्गों के लिए अपनी योजनाओं और नीतियों का निर्णय लेने में मदद मिलेगी साथ ही कुछ जातियों की बढ़ती संख्या के दावों का सच भी सामने आयेगा जो अक्सर अपने लिए आरक्षण का दावा कर रहे हैं. हालांकि मैं बाबा साहेब अंबेडकर द्वारा देश में जाति व्यवस्था के उन्मूलन के विचार का पूर्ण समर्थक हूं. लेकिन, यह भी एक सार्वभौमिक सत्य है कि लोग आज भी इस देश में जाति व्यवस्था से चिपके हुए हैं.

जदयू के बागी नेता शरद यादव ने कहा, मंडल की रिपोर्ट के मुताबिक पिछड़ी जातियों, गैर-हिंदू जातियों को मिलाकर और एससी तथा एसटी को छोड़कर भारत की आबादी का 52 प्रतिशत हिस्सा है. आयोग ने 52 प्रतिशत आबादी के लिए नौकरियों तथा शैक्षणिक सुविधाओं में 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की थी. ओबीसी ब्लॉक का मानना ​​है कि 27 प्रतिशत आरक्षण इसकी जनसंख्या आंकड़े की तुलना में अपर्याप्त है जिसे मंडल आयोग ने 1931 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर 52 प्रतिशत किया था. इसमें कोई संदेह नहीं है कि खुद को ओबीसी बताने वाले व्यक्तियों का अनुपात बीते कई वर्षों से लगातार बढ़ रहा है.

शरद यादव ने कहा, नेशनल सैंपल सर्वे के कार्यालय के आंकड़े बताते हैं कि 1999 से 2000 के बीच आबादी के लगभग 36 प्रतिशत लोग ओबीसी श्रेणी में आये और 2011-12 तक यह अनुपात 44 फीसदी बढ़ा. यदि अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के 9 प्रतिशत और अनुसूचित जातियों (एससी) के 20 प्रतिशत को मिलाकर देखा जाये तो भारत की आबादी में 73 प्रतिशत लोग आरक्षण के योग्य है.

जनगणना में केवल ओबीसी की गणना आबादी को बांटने का सरकार का एक शातिराना कदम प्रतीत होता है. मैं मांग करता हूं कि सरकार को इस जनगणना में विभिन्न जाति और धर्म के सभी समूहों जिसमें अगड़ी जातियों, पिछड़ी जातियों और अनुसूचित तथा अनुसूचित जनजाति के बारे में व्यापक आंकड़े को सुनश्चिति करना चाहिए. 90 वर्ष बीत चुके हैं जब ब्रिटिश शासन द्वारा 1931 में भारत में जनगणना की गयी थी जो कि अब पूरी तरह से बदल चुके हैं और इसलिए आबादी के लिए प्राथमिकता नीतियों का नर्णिय लेने के लिए हमारे पास भरोसेमंद संपूर्ण आंकड़े होने आवश्यक है.

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