जिला न्यायाधीशों के निदेशन वाली निगरानी समिति से ही अतिक्रमण मुक्ति

सुरेंद्र किशोर राजनीतिक विश्लेषक गया से लेकर दरभंगा तक प्रशासन ने शहर से अतिक्रमण मुक्ति अभियान चला रखा है. यह पटना हाईकोर्ट की पहल का सुपरिणाम है जिसके आदेश से पटना की सड़कों पर अब परिवर्तन नजर आ रहा है. पर इस अतिक्रमण विरोधी अभियान को लेकर मुख्यतः दो सवाल लोगों के दिल-ओ-दिमाग में उठ […]
सुरेंद्र किशोर
राजनीतिक विश्लेषक
गया से लेकर दरभंगा तक प्रशासन ने शहर से अतिक्रमण मुक्ति अभियान चला रखा है. यह पटना हाईकोर्ट की पहल का सुपरिणाम है जिसके आदेश से पटना की सड़कों पर अब परिवर्तन नजर आ रहा है. पर इस अतिक्रमण विरोधी अभियान को लेकर मुख्यतः दो सवाल लोगों के दिल-ओ-दिमाग में उठ रहे हैं.
एक यह कि क्या पहले की तरह अतिक्रमणकारी दोबारा अतिक्रमण नहीं कर लेंगे? दूसरा सवाल यह है कि क्या पटना की तरह ही राज्य के अन्य शहरों के लोगों को भी अतिक्रमण मुक्त माहौल में जीने का अवसर मिल सकेगा? इस समस्या को लेकर एक पिछला उदाहरण मौजूं होगा.
पटना हाईकोर्ट ने 1996 में बिहार बोर्ड की परीक्षा से कदाचार समाप्त करने का ठोस उपाय किया था. हाईकोर्ट ने जिलों में कदाचारमुक्त परीक्षा सुनिश्चित कराने के लिए जिला न्यायाधीशों को जिम्मेदारी सौंपी थी. उसका चमत्कारिक असर हुआ था. उस साल की परीक्षा से कदाचार गायब था. क्योंकि डीएम और एसपी जिला जज की सतर्कता के कारण कर्तव्यनिष्ठ बन जाने को मजबूर थे.
उन्होंने कदाचार नहीं होने दिया. नतीजतन उस साल मैट्रिक बोर्ड परीक्षा में सिर्फ 12 दशमलव 61 प्रतिशत परीक्षार्थी ही पास हो सके थे. इंटर परीक्षा का रिजल्ट भी 20 प्रतिशत से कम ही हुआ था. यह और बात है कि स्वार्थी नेताओं और शिक्षा माफियाओं ने मिलकर अगले ही साल से दोबारा कदाचार शुरू करवा दिया. नतीजतन 2001 में मैट्रिक में 76 दशमलव 59 प्रतिशत परीक्षार्थी पास हो गये. उस अनुभव से लाभ उठाकर अतिक्रमण से लोगों को मुक्ति दिलायी जा सकती है.
यदि जिला जज की सदारत या निदेशन में हर जिले में निगरानी समिति बनाने का हाईकोर्ट आदेश दे और उसे स्थायी रूप दिया जा सके तो अतिक्रमण मुक्ति का सुख स्थायी हो सकता है. इसके लिए हाईकोर्ट से ऐसा करने की गुहार की जा सकती है.
पटना के विस्तार में अब होगी सुविधा : जिस सड़क के निर्माण के लिए कम से कम 70 प्रतिशत जमीन का भी अधिग्रहण हो चुका है, उस सड़क के निर्माण का काम अब शुरू हो सकेगा. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पहल पर संबंधित केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने इस पर अपनी सहमति दे दी है. इससे पहले 90 प्रतिशत अधिग्रहण की बाध्यता थी.
अब इस कारण बिहार में कई रुकी हुई एनएच पर काम शुरू हो सकेगा. उन सड़कों में पटना-कोइलवर एनएच महत्वपूर्ण है. यह पटना जिले में पड़ता है. इसके लिए जमीन अधिग्रहण की समस्या थी. पर, अब इस पर काम शुरू हो सकेगा. इस राष्ट्रीय राजमार्ग का निर्माण हो जाने के बाद इसके किनारे उपनगर व उद्योग विकसित हो सकेंगे. इससे पटना को महानगर बनाने के काम में तेजी आयेगी.
अतिक्रमण हटाओ अभियान की तारीफ : पटना में अतिक्रमण हटाओ अभियान चल रहा है. लोगबाग इससे खुश हैं. पर अभी एक कमी देखी जा रही है. पटना के कमिश्नर ने गत 18 अगस्त को ही एक खास आदेश दिया था.
उनका आदेश था कि जहां से अतिक्रमण हटा दिये गये हैं, वहां दोबारा अतिक्रमण नहीं हो, इसके लिए ठोस उपाय किये जाएं. यानी एक टीम गठित हो जो शाम पांच बजे से रात दस बजे तक पूरे शहर में घूम कर इस बात की निगरानी करे कि जहां से अतिक्रमण हटा दिये गये हैं, वहां दोबारा अतिक्रमण न हो. पर ऐसा कोई ‘धावा दल’ अभी नजर नहीं आ रहा है.
नतीजतन इन पंक्तियों के लेखक ने देखा कि कई जगह दोबारा अतिक्रमण हो रहे हैं. हालांकि, वहां इक्के-दुक्के दुकानदार ही दोबारा अतिक्रमण कर रहे हैं. पर इक्के-दुक्के अतिक्रमण भी क्यों हो?
ऐसे दी जाती है श्रद्धांजलि : बुधवार को बिहार वाणिज्य व उद्योग मंडल के परिसर में पूर्व अध्यक्ष युगेश्वर पांडेय की याद में श्रद्धांजलि सभा हुई. वाणिज्य व उद्योग जगत के अनेक गणमान्य लोगों ने दिवंगत पांडेय जी को भावभीनी श्रद्धांजलि दी.
उनके गुणों और उपलब्धियों को याद किया. यह भी कि किस तरह वे व्यक्तिगत व्यवहार में शालीन व स्नेहिल थे. वे वाणिज्य-उद्योग के विकास के लिए चिंतित रहते थे. किसी पर कोई संकट आ जाये तो आधी रात में भी वे मदद के लिए पहुंच जाते थे. और उन्होंने क्या-क्या किये. इस तरह की बातों से नयी पीढ़ी को भी कुछ अच्छा करने की प्रेरणा मिल सकती है.
अब जरा कल्पना कीजिए कि कहीं किसी दिवंगत राजनीतिक नेता को उनके जन्मदिन या पुण्यतिथि पर याद किया जा रहा हो. उस सभा में आज के अधिकतर मौजूदा नेता क्या-क्या बोलेंगे? उस अवसर का इस्तेमाल वे अपना जातीय वोट बैंक बढ़ाने के लिए करेंगे.
वे जरूर बतायेंगे कि आज उनकी जाति के लोगों को मान-सम्मान नहीं मिल रहा है. ऐसा कह कर वे उस जाति के लोगों की सहानुभूति हासिल करने की कोशिश करेंगे. इतना ही नहीं, यदि जयंती डाॅ राजेंद्र प्रसाद की मनाई जा रही हो, तो खुद खैनी यानी तम्बाकू खाने वाला कोई नेता यह कह देगा कि ‘राजेंद्र बाबू भी खैनी खाते थे.’
शायद ही यह कहेगा कि परीक्षार्थी राजेंद्र बाबू के बारे में उनके परीक्षक ने लिखा था कि ‘परीक्षार्थी परीक्षक से अधिक जानता है.’ किस तरह उन्होंने आजादी की लड़ाई में शामिल होने के लिए अपना अच्छा-खासा कैरियर छोड़ दिया. खैनी खाने का मामला एक बार उठा भी था. बाद में राजेंद्र बाबू की पोती ने कहा कि राजेंद्र बाबू ने जीवन में कभी खैनी को छुआ भी नहीं.
भूली-बिसरी याद : सत्तर के दशक की बात है. केंद्र और बिहार में जनता पार्टी की सरकारें थीं. पटना में भोजपुरी सम्मेलन हो रहा था. केंद्रीय मंत्री जगजीवन राम और बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर मंच पर थे. जगजीवन बाबू भोजपुरी में भी बहुत अच्छा भाषण करते थे.
उनके पास भोजपुरी शब्दों का अपार खजाना था. जगजीवन बाबू भोजपुरी भाषी जिले से आते थे. उस अवसर पर जगजीवन बाबू ने भोजपुरी इलाके की बोली में मर्दानगी और मिजाज में बहादुरी की विस्तार से चर्चा की. साथ ही उन्होंने बिहार की कुछ अन्य बोलियों से भोजपुरी की तुलना भी कर दी. खुद कर्पूरी ठाकुर मैथिली भाषी क्षेत्र से आते थे. मैथिली मीठी भाषा है. कर्पूरी ठाकुर को ऐसी तुलना पसंद नहीं आयी.
जब उनकी बारी आयी तो उन्होंने कहा कि ‘यदि भोजपुरी लोगों में इतना ही दमखम है तो भोजपुरी भाषी ‘बाबू जी’ दिल्ली की सरकार में अपना थोड़ा दमखम दिखा कर इस गरीब इलाके को इसका वाजिब हक क्यों नहीं दिलवाते? जगजीवन राम को ‘बाबू जी’ कहा जाता था. कर्पूरी ठाकुर मानते थे कि बिहार के प्रति केंद्र के सौतेला व्यवहार के कारण ही बिहार पिछड़ा प्रदेश रहा गया है. रेल भाड़ा समानीकरण नीति इसका सबसे बड़ा उदाहरण था.
और अंत में : 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले राजनीति के कौन मौसमी पक्षी कब कहां जायेंगे, यह कहना अभी कठिन है. क्योंकि चुनाव की हवा अभी पूरी तरह बनी नहीं है. दो-तीन महीनों में बनेगी. मौसमी पक्षी हवा का रुख तो तभी देख-पहचान सकेंगे जब हवा बने. हालांकि, लोगों में उत्सुकता अभी से बहुत है.
उस उत्सुकता को शांत करने के लिए मीडिया उन पक्षियों के बारे में कुछ न कुछ सूचना देता रहता है. पर अभी कई बार इस मामले में पूर्वानुमान गलत निकल जा रहा है. इसलिए बेहतर है कि हवा बनने का इंतजार कीजिए. पहले देखना होगा कि अगले महीनों में केंद्र सरकार के कैसे-कैसे वोट खींचू निर्णय होते हैं. साथ ही यह भी देखना होगा कि प्रतिपक्षी महागठबंधन का अगला स्वरूप कैसा बनता है. कितना मजबूत या कमजोर बनता है.
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