पटना : बच्चों पर फीस वसूली का दबाव न बनाएं उन्हें परेशान किया तो कसेगा शिकंजा

Updated at : 07 Aug 2018 8:43 AM (IST)
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पटना : बच्चों पर फीस वसूली का दबाव न बनाएं उन्हें परेशान किया तो कसेगा शिकंजा

एनसीपीसीआर ने तैयार किया मॉडल फीस रेगुलरिटी फ्रेमवर्क पटना : समय पर स्कूल फीस जमा नहीं होने के चलते बच्चों का शारीरिक, मानसिक या भावनात्मक उत्पीड़न और हर साल मनमानी फीस वृद्धि करना अब प्राइवेट अनएडेड स्कूलों को महंगा पड़ सकता है. पटना समेत देश के विभिन्न हिस्सों में ऐसी शिकायतें प्रकाश में आती रही […]

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एनसीपीसीआर ने तैयार किया मॉडल फीस रेगुलरिटी फ्रेमवर्क

पटना : समय पर स्कूल फीस जमा नहीं होने के चलते बच्चों का शारीरिक, मानसिक या भावनात्मक उत्पीड़न और हर साल मनमानी फीस वृद्धि करना अब प्राइवेट अनएडेड स्कूलों को महंगा पड़ सकता है. पटना समेत देश के विभिन्न हिस्सों में ऐसी शिकायतें प्रकाश में आती रही हैं. इसे गंभीरता से लेते हुए राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने मॉडल फीस रेगुलरिटी फ्रेमवर्क तैयार किया है.

फ्रेमवर्क में कहा गया है कि फीस का मामला स्कूल व अभिभावकों के बीच का है. इसमें बच्चे कहीं शामिल नहीं हैं. वे किसी व्यवसाय में होने वाले नफा नुकसान के लिए जवाबदेह भी नहीं ठहराये जा सकते हैं. लिहाजा स्कूलों को फीस वसूली के लिए बच्चों पर दबाव बनाने से बाज आना चाहिए. अन्यथा उन पर सख्त कानूनी गाज गिरनी तय है. एनसीपीसीआर फ्रेमवर्क को प्रभावी करने के लिए तैयारी कर चुका है.

फीस के मुद्दे पर स्कूल और अभिभावकों के बीच पारस्परिक विवाद के परिणामस्वरूप स्कूलों में बच्चों पर शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक उत्पीड़न के खिलाफ निवारक रणनीति प्रदान करना फ्रेमवर्क का उद्देश्य है. फीस को लेकर बच्चे को दंडित या उत्पीड़न नहीं किया जा सकता. ऐसा कोई स्कूल करता है तो उसको अर्थदंड की सजा और पीड़ित को उसका लाभ मिलना चाहिए. प्राइवेट अनऐडेड स्कूल में फीस बढ़ोतरी पिछली फीस से 10 प्रतिशत से अधिक नहीं की जा सकेगी.

बच्चों का उत्पीड़न व भेदभाव चिंता का विषय

जानकारी के अनुसार हाल ही में आयोग की ओर से राज्यों को एक निर्देश जारी किया गया है, जिसमें कहा गया था कि प्राइवेट स्कूलों में फीस जमा न करने पर बच्चों का उत्पीड़न और स्कूल के कर्मचारियों द्वारा बच्चों के साथ भेदभावपूर्ण बर्ताव चिंता का विषय है. साथ ही यह जेजे ऐक्ट के सेक्शन 75 में उल्लेखित बाल अधिकारों का उल्लंघन है. इसकी मॉनेटरिंग अथॉरिटी एनसीपीसीआर है. स्कूल की फीस अभिभावक और स्कूल के बीच का वित्तीय मामला है. माता-पिता या अभिभावकों के साथ ही बात करनी चाहिए.

दरअसल 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे को किसी कर्ज के लिए जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता. किसी व्यवसाय में भी नफा-नुकसान के लिए भी वह जवाबदेह नहीं होता. यह कानून है. ऐसे में फीस को लेकर स्कूल में किसी बच्चे का उत्पीड़न बिल्कुल ही गलत है. ऐसे में स्कूल के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए.

जयप्रकाश सिंह, पूर्व लोक अभियोजक, पटना सिविल कोर्ट

– केस-1 : राजधानी के एक नामी स्कूल में पढ़नेवाले दो बच्चों को फीस जमा नहीं हो पाने के कारण टीसी दे दी गयी थी. बच्चों के अभिभावक संजीव कुमार पाठक ने बताया कि स्कूल द्वारा बेतहाशा फीस वृद्धि कर दी गयी थी. इस कारण उन्होंने स्कूल प्रबंधन के समक्ष विरोध दर्ज कराया था. फीस वृद्धि पर पुनर्विचार करने को कहा था. उसके बाद स्कूल द्वारा दोनों बच्चों को जबरन टीसी दे दी गयी. उन्होंने कहा कि स्कूल से निकाले जाने के कारण बच्चे कई दिनों तक हतोत्साह की स्थिति में रहे.

फ्रेमवर्क के अनुसार शिक्षा का अधिकार के नियम के तहत सरकारी स्कूलों की ही तर्ज पर प्राइवेट अनएडेड स्कूलों में भी स्कूल मैनेजमेंट कमेटी व शिक्षक-अभिभावक संघ होंगे. फ्रेमवर्क लागू होने के बाद शिक्षक-अभिभावक संघ (पीटीए) की जिम्मेदारी बढ़ जायेगी. यहां तक कि स्कूल की फीस बढ़ाये जाने संबंधी निर्णय में पीटीए की राय महत्वपूर्ण होगी. फ्रेमवर्क के अनुसार सभी राज्यों में डिस्ट्रिक्ट फीस रेगुलेटरी कमेटी (डीएफआरसी) का गठन किया किया जाना है, जिसमें डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर या डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट अध्यक्ष होंगे. सभी स्कूल में एकपीटीए होना चाहिए.

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