108 वर्ष पुराना किऊल पुल हो रहा जर्जर, जोखिम में ट्रेनों के यात्रियों की जान
Updated at : 10 Jul 2018 7:15 AM (IST)
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लखीसराय से प्रमोद झा/राजीव हावड़ा-दिल्ली मुख्य रेल मार्ग में लखीसराय व किऊल के बीच किऊल नदी पर बना रेल पुल 108 साल पुराना हो गया है. 2010 में ही इस पुल से होनेवाले परिचालन पर रोक लगानी थी और इसके पहले फरवरी 2017 तक नये पुल का निर्माण हो जाना था. हालांकि रेलवे व ठेकेदारों […]
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लखीसराय से प्रमोद झा/राजीव
हावड़ा-दिल्ली मुख्य रेल मार्ग में लखीसराय व किऊल के बीच किऊल नदी पर बना रेल पुल 108 साल पुराना हो गया है. 2010 में ही इस पुल से होनेवाले परिचालन पर रोक लगानी थी और इसके पहले फरवरी 2017 तक नये पुल का निर्माण हो जाना था.
हालांकि रेलवे व ठेकेदारों की सुस्ती व लापरवाही के कारण इस पुल के निर्माण का प्रोजेक्ट डेढ़ साल पीछे हो गया. अब इसके निर्माण की अवधि दिसंबर 2018 तय की गयी है.
इन सबके बीच अपनी मजबूती से अधिकतम समय तक सेवा दे चुके पुराने पुल की स्थिति यह है कि रेलवे के इंजीनियर इसकी मरम्मत कर एक-एक दिन का जीवन बढ़ा रहे हैं. हालांकि अब इसके मजबूत पाये जवाब दे चुके हैं.
हावड़ा -दिल्ली मुख्य रेल मार्ग होने से लगभग साढ़े चार साै मीटर लंबे डबल लेन पुल से लगभग सौ से अधिक यात्री ट्रेनें व मालगाड़ी गुजरती है. ऐसे में हर दिन इस पुल से होकर गुजरनेवाली ट्रेनों के लिए जोखिम बढ़ता ही जा रहा है और यात्रियों की सुरक्षा का बगैर परवाह किये पुराने पुल पर परिचालन जारी है.
कॉशन के सहारे चल रही हैं ट्रेनें : पुराने पुल का खतरा बढ़ता जा रहा है और नये पुल के निर्माण की नजदीक में कोई संभावना नहीं दिख रहा है. समय बढ़ने के बावजूद यह कोई दावा नहीं कर रहा है कि निर्धारित अवधि में काम पूरा होकर ट्रेनों का परिचालन शुरू हो पायेगा.
पुराने पुल पर रेल ट्रैक के नीचे लोहे की कई पट्टियां जंग खा चुकी हैं. रंगाई-पुताई कर पुल के जर्जर हिस्सों को छिपाने की कोशिश की जा रही है. ट्रेनों के परिचालन को बाधा रहित बनाने के लिए पिछले दो सालों से रेलवे का प्रयास चल रहा है. पुल की जर्जर हालत को लेकर ही कॉशन के सहारे ट्रेनों का परिचालन हो रहा है.
वर्ष 1910 में बना था पुल
किऊल नदी पर एक सौ आठ साल पहले बड़ी रेल लाइन का पुल निर्माण हुआ था. इससे पहले 1864 में छोटी लाइन के लिए सिंगल लेन पुल का निर्माण हुआ था. जो हावड़ा से साहेबगंज, भागलपुर, जमालपुर, किऊल जंक्शन व पटना होते हुए मुगलसराय तक थी. बाद में हावड़ा-मुगलसराय मुख्य रेल मार्ग होने से उसकी जगह बड़ी लाइन व डबल लेन पुल का 1910 में निर्माण हुआ.
पूमरे के मुख्य जनसंपर्क पदाधिकारी राजेश कुमार ने बताया कि पुल की आयु पूरी होने का यह मतलब नहीं होता है कि पुल सुरक्षित नहीं है. रेल पुल का मेंटेनेंस लगातार होता है. सुरक्षा के मानकों का परीक्षण के बाद ही रेल परिचालन की अनुमति मिलती है. किऊल रेल पुल दुरुस्त है
पुल पर सामान्य गति से ट्रेनों का परिचालन जारी है.क्षतिग्रस्त हो रहे पिलर के प्लेटफॉर्म
पिलर की सुरक्षा के लिए प्लेटफॉर्म का निर्माण पानी की तेज धार से बचाव के लिए किया गया है. लेकिन पुल के आठ पिलरों में से किसी का प्लेटफाॅर्म व्यवस्थित नहीं है. स्थानीय लोगों ने बताया कि बालू जमा रहने से पहले पिलर के प्लेटफॉर्म का केवल ऊपरी हिस्सा दिखता था.
अवैध रूप से बालू का खनन इतना कर लिया गया कि आसपास की जमीन खाली होने से प्लेटफॉर्म दरकने लगा है. इतना ही नहीं सभी पिलरों पर पौधे उग आये हैं. साफ है कि प्रशासन का ध्यान नहीं है. किऊल नदी में पानी का बहाव तीन से चार पिलर के बीच है.
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