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सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उड़ी बिहार के 142 दागी नेताओं की नींद, जानें किस पार्टी में कितने !

Updated at : 14 Dec 2017 3:52 PM (IST)
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सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उड़ी बिहार के 142 दागी नेताओं की नींद, जानें किस पार्टी में कितने !

पटना : सुप्रीम कोर्ट ने आज अपने एक अहम फैसले में राजनीतिक हलकों में खलबली मचा दी है. जी हां, इस फैसले से जहां देशभर के दागी नेताओं , विधायकों और सांसदों की नींद उड़ गयी है, वहीं दूसरी ओर इसका असर बिहार जैसे राजनीतिक रूप से जागरूक प्रदेश पर भी पड़ने वाला है. सुप्रीम […]

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पटना : सुप्रीम कोर्ट ने आज अपने एक अहम फैसले में राजनीतिक हलकों में खलबली मचा दी है. जी हां, इस फैसले से जहां देशभर के दागी नेताओं , विधायकों और सांसदों की नींद उड़ गयी है, वहीं दूसरी ओर इसका असर बिहार जैसे राजनीतिक रूप से जागरूक प्रदेश पर भी पड़ने वाला है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में केंद्र को उन राज्यों को अनुपात में 7.8 करोड रुपये आवंटित करने का आदेश दिया जहां सांसदों एवं विधायकों के खिलाफ मामलों की सुनवाई के लिए 12 विशेष अदालतें स्थापित की जायेंगी. राज्य सरकारें उच्च न्यायालयों की सलाह से फास्ट ट्रैक अदालतें स्थापित करें और सुनिश्चित करें कि वे एक मार्च 2018 से काम करना शुरू कर दें.

बिहार में हैं दागी नेता

इसआदेश के तहत सुप्रीमकोर्ट ने समूचे देश में सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित मामलों का आंकडा इकट्ठा करने और उसके मिलान के लिए केंद्र को दो महीने का वक्त दिया है. इसका बड़ा असर बिहार की राजनीति और यहां के दागी सांसदों और विधायकों पर पड़ेगा. एक अध्ययन के मुताबिक, बिहार के नवनिर्वाचित 243 विधायकों में से 142 यानी 58 फीसदी पर आपराधिक मामले दर्ज हैं. एडीआर यानी बिहार इलेक्शन वाच और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स के अध्ययन के मुताबिक, आपराधिक पृष्ठभूमि वाले कुल विधायकों में से 90 यानी 40 फीसदी पर हत्या, हत्या के प्रयास, सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने, अपहरण, महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे संगीन मामले दर्ज हैं, जिसमें 70 विधायकों पर आरोप तय किये जा चुके हैं.

संगीन मामले हैं दर्ज

एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक अपने खिलाफ चुनाव के दौरान हलफनामें में आपराधिक मामला बताने वाले 142 विधायकों में से 70 ने बताया है कि कोर्ट ने उनके खिलाफ पहले ही आरोप तय कर दिया है. इनमें से 11 विधायकों पर हत्या के प्रयास का मामला दर्ज है. आंकड़ों के मुताबिक राष्ट्रीय जनता दल के वर्तमान 80 विधायकों में से 46 विधायक आपराधिक छवि के हैं. वहीं जदयू के 71 विधायकों में से 34 पर मामला दर्ज है. भाजपा के भी 53 विधायकों में से 34 विधायक आपराधिक छवि के हैं. जबकि कांग्रेस के 27 में से 16 विधायकों पर आपराधिक मामला दर्ज है. लोजपा के एक और निर्दलीय एक विधायक आपराधिक छवि के हैं. बिहार के सांसदों की बात करें, तो 40 सांसदों में से 28 ऐसे हैं, जिनके खिलाफ कोई न कोई मामला दर्ज है. सबसे ज्यादा खराब स्थिति विधायकों की है, जिन पर संगीन अपराध के मामले भी दर्ज हैं.

हलफनामे में है विस्तृत जानकारी

विधायकों द्वारा चुनाव आयोग को दिये गये हलफनामे के आधार पर बात करें, तो इन विधायकों पर अपहरण, हत्या, महिलाओं के साथ दुष्कर्म और सांप्रदायिकता फैलाने का मामला भी दर्ज है. बिहारशरीफ जेल में बंद नवादा के राजद विधायक राजवल्लभ यादव पर नाबालिग के साथ दुष्कर्म का मामला दर्ज है. इसी तरह मधुबनी के झंझारपुर से राजद विधायक गुलाब यादव के खिलाफ एक महिला के साथ दुष्कर्म का मामला दर्ज है. मोकामा से निर्दलीय विधायक अनंत सिंह पर भी अपहरण और हत्या जैसे गंभीर आरोप हैं, हाल में अनंत सिंह को हाइकोर्ट से जमानत मिली हुई है.

बनेगा विशेष कोर्ट

मामले को गंभीरता से लेते हुएपहलेभी अदालत ने कहा था कि किसी राज्य में अदालतों का गठन आमतौर पर राज्य सरकार करती है. लेकिन इस मामले में देरी से बचने के लिए केंद्र सरकार एक योजना बना कर विशेष कोर्ट का गठन करे. सरकार ने बताया था कि वह लोकसभा सांसदों के मुकदमों के फास्ट ट्रैक निबटारे के लिए 2 कोर्ट बनाना चाहती है. जिन राज्यों में लंबित आपराधिक मामलों वाले विधायकों की संख्या ज्यादा है, वहां भी 1-1 कोर्ट का गठन किया जायेगा. फिलहाल इस तरह के 12 विशेष कोर्ट का गठन किया जायेगा. सरकार ने कोर्ट के गठन के लिए चुनाव आयोग के आंकड़ों को ही आधार बनाया है.

फास्ट ट्रैक का होगा गठन

पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने दागी सांसद और विधायकों के खिलाफ लंबित मुकदमों को एक वर्ष के भीतर निपटाने को देश हित में बताते हुए केंद्र सरकार को विशेष अदालतों का गठन करने के लिए कहा था. कोर्ट ने इन विशेष अदालतों का गठन फास्ट ट्रैक कोर्ट की तर्ज करने को कहा था ताकि सांसद और विधायकों के खिलाफ लंबित मामलों का जल्द निबटारा किया जा सके. सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की इस बात का समर्थन किया था और कहा था कि सरकार विशेष अदालतें गठित करने और नेताओं के लंबित मुकदमों के तेजी से निबटारे के खिलाफ नहीं है.

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