सुपर स्पेशियलिटी की सुविधाओं में अब भी पीछे है पटना एम्स, जानें क्या है कमियां

Updated at : 24 Sep 2020 10:20 PM (IST)
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सुपर स्पेशियलिटी की सुविधाओं में अब भी पीछे है पटना एम्स, जानें क्या है कमियां

पटना : आज पटना एम्स की नौवीं वर्षगांठ है. 25 सितंबर 2012 को पटना एम्स की स्थापना की गयी थी. इन आठ वर्षों में यह राज्य में बेहतर चिकित्सा का एक प्रमुख सेंटर बन कर उभरा है. राज्य के कोने कोने से और पड़ोसी राज्यों से मरीज यहां इलाज करवाने के लिए आते हैं.

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साकिब. पटना : आज पटना एम्स की नौवीं वर्षगांठ है. 25 सितंबर 2012 को पटना एम्स की स्थापना की गयी थी. इन आठ वर्षों में यह राज्य में बेहतर चिकित्सा का एक प्रमुख सेंटर बन कर उभरा है. राज्य के कोने कोने से और पड़ोसी राज्यों से मरीज यहां इलाज करवाने के लिए आते हैं. इसके बनने के बाद से पटना के अन्य मेडिकल काॅलेज एवं अस्पताल से मरीजों का बोझ काफी हद तक कम हुआ है, लेकिन अभी भी यहां ढ़ेरों कमियां हैं. जिसके कारण बिहारियों को अपने ही राज्य में दिल्ली एम्स जैसा इलाज मिलने का सपना सच नहीं हो पाया है.

कोविड-19 के दौर में पटना एम्स बना सहारा

राज्य में एम्स होने का फायदा कोविड-19 के दौर हो रहा है. राज्य की बदहाल चिकित्सा व्यवस्था और मेडिकल काॅलेज एवं अस्पतालों में आधारभूत संरचना की भारी कमी के कारण कोरोना से निबटना एक बड़ी चुनौती बन गयी थी. ऐसे में पटना एम्स आगे आया और इसने खुद को कोविड-19 के लिए डेडिकेटेड अस्पताल के रूप में बदला. आज यहां कोविड के लिए 500 बेड तक की क्षमता है. यहां राज्य भर से आने वाले कोविड के गंभीर मरीजों का इलाज होता रहा है और अब भी हो रहा है. साफ-सफाई, बेहतर आधारभूत संरचना और अच्छे डाॅक्टरों की मौजूदगी के कारण इसने राज्य के लोगों का विश्वास जीतने में कामयाबी पायी है. आज यहां 80 बेडों का आइसीयू और सभी 80 बेडों पर वेंटिलेटर की सुविधा उपलब्ध है.

कोरोना वैक्सिीन पर रिसर्च से बढ़ा गौरव

पटना एम्स को केंद्र सरकार ने देश के उन चुनिंदा चिकित्सा संस्थानों में चुना जहां कोरोना को लेकर बनायी जा रही वैक्सिीन का ट्रायल चल रहा है. पहले चरण का ट्रायल पूरा हो चुका है. इसमें बड़ी संख्या में पटना और बिहार के युवाओं ने स्वेच्छा से खुद पर ट्रायल करवाया है. अब दूसरे चरण का ट्रायल चल रहा है. बिहार का यह इकलौता मेडिकल काॅलेज एवं अस्पताल है जहां इस वैक्सीन का ट्रायल हुआ.

राज्य में पहली बार प्लाज्मा थेरेपी की हुई शुरुआत

पटना एम्स राज्य का पहला ऐसा अस्पताल और देश का चुनिंदा अस्पताल रहा जहां कोविड मरीजों के इलाज में प्लाज्मा थेरेपी की शुरुआत हुई. यहां अबतक दर्जनों मरीजों को प्लाज्मा थेरेपी दी जा चुकी है. इसमें से ज्यादातर की जान बचाने में डाॅक्टरों को कामयाबी मिली. पटना एम्स के ब्लड बैंक के पास इसके लिए सभी जरूरी अत्याधुनिक मशीनें और प्रशिक्षित डाॅक्टरों की टीम है. इसके डाॅक्टरों ने राज्य के दूसरे अस्पतालों के डाॅक्टरों को प्लाज्मा थेरेपी की ट्रेनिंग भी दी है.

रोजाना ओपीडी में आते थे तीन-साढ़े तीन हजार मरीज

पटना एम्स की ओपीडी में मरीजों की भारी भीड़ रहती है. यहां कोरोना के आने से पहले ओपीडी में रोजाना तीन से साढ़े तीन हजार मरीज रोजाना इलाज कराने थे. इसमें अभी सभी वार्डों को मिलाकर कुल 950 बेड का अस्पताल है. एम्स में फिलहाल 39 विभाग चल रहे हैं. इसकी इमरजेंसी में 100 बेड है जिसमें ट्रामा सेंटर भी है. इसका ट्रामा सेंटर रोड एक्सीडेंट में जान बचाने के लिए पटना के दूसरे अस्पतालों से कहीं बेहतर माना जाता है.

डाॅक्टरों की कमी के कारण कई विभाग हो गये बंद

पटना एम्स इन दिनों डाॅक्टरों की भारी कमी से जूझ रहा है. हाल यह है कि इसके ज्यादातर विभागों में एक से लेकर चार स्थायी फैकल्टी ही है. उदाहरण के लिए यूरोलाॅजी में दो, मेडिकल अंकोलाॅजी एंड हेमेटोलाॅजी में एक, गैस्ट्रोएंट्रेलाॅजी में दो, न्यूरो सर्जरी में चार, प्लमोनरी में तीन, पेडियाट्रिक्स सर्जरी में दो, आर्थोपेडिक्स में चार, बर्न एंड प्लास्टिक सर्जरी में तीन, आप्थेलमोलाॅजी में तीन, इएनटी में दो, सर्जिकल गैस्ट्रोएंट्रेलाॅजी में दो, सीटीवीएस में एक, फाॅरेंसिंक मेडिसिन एंव टाॅक्सीलाॅजी में तीन ही स्थायी फैक्लटी हैं. वहीं कार्डियोलाॅजी और न्यूरोलाॅजी में एक भी स्थायी फैकल्टी नहीं है. इसके कारण ये दोनों विभाग बंद है.

सुपर स्पेशियलिटी सेंटर नहीं बन पाया एम्स

पटना एम्स की स्थापना इस सोच के साथ की गयी थी कि यह बिहार में सुपर स्पेशियलिटी इलाज का सेंटर बनेगा. लेकिन आज यहां सुपर स्पेशियिलिटी डाॅक्टरों की भारी कमी के कारण मरीजों को वह इलाज नहीं मिल रहा है जिसके लिए उन्हें बड़े निजी अस्पतालों या दूसरे राज्यों में जाना पड़ता है. बिहार कार्डियोलाॅजी, नेफ्रोलाॅजी, न्यूरोलाॅजी, न्यूरोसर्जरी, यूरोलाॅजी, कैंसर, प्लास्टिक सर्जरी आदि सुपर स्पेशियलिटी वाले इलाज की भारी डिमांड है. इसके डाॅक्टरों की भी काफी कमी है. निजी अस्पतालों में इलाज करवाने पर लाखों खर्च आ सकता है. ऐसे में बिहार के लोगों को उम्मीद थी कि पटना एम्स में इसका बेहतर इलाज मिल पायेगा, लेकिन इस मामले में यह उम्मीद पर खरा नहीं उतर सका. यहां लिवर, किडनी, नेत्र, हार्ट, आइवीफ आदि के ट्रांसप्लांट की भी सुविधा मरीजों को नहीं मिल पा रही है.

posted by ashish jha

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